भारत-अमरीका ट्रेड डील में दोनों के हित जुड़े हैं
यह सवाल पूछने और सुनने में जितना आसान है, इसका जवाब सचमुच में उतना ही राजनीति और कूटनीति के कॉकटेल से निर्मित होने के कारण जटिल है। पिछले दिनों जब भारत और अमरीका के बीच अंतत: कई महीनों से लटकी ट्रेड डील वास्तव में सम्पन्न हो गई, तो केंद्र सरकार और विशेष करके हमारे वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार ने संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों में भारतीय किसानों की पूरी तरह से रक्षा की है। उधर कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा का कहना है, ‘अमेरिका ने 3 प्रतिशत के टैरिफ को बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया और अब घटाकर उसे 18 प्रतिशत किया, तो मोदी सरकार खुश हो रही है, जबकि उसने हमारे द्वारा रूस से तेल खरीदने पर पाबंदी लगा दी है। यही नहीं विपक्ष का यह भी कहना है कि अगले पांच सालों में हमें अमरीका से 500 अरब डॉलर का आयात करना है यानी भारत को अपना आयात तीन गुना बढ़ाना पड़ेगा। इसके लिए हमें हर साल अमरीका से 40 से 42 अरब डॉलर के आयात को बढ़ाकर 100 अरब डॉलर करना पड़ेगा। लेकिन सरकार के पास अभी इस बात की स्पष्टता नहीं है कि हर साल जो 58 से 60 अरब डॉलर का अतिरिक्त आयात होगा, वह क्या होगा?
चूंकि अमरीका का कहना है कि भारत के साथ व्यापार में उसे करीब 60 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है इसलिए भारत को आयात बढ़ाना ज़रूरी है ताकि अमरीका का व्यापार घाटा पूरा हो सके। दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान और पीयूष गोयल ने एक्स पर जारी अपने बयानों में स्पष्ट किया है कि सरकार ने कृषि और डेयरी क्षेत्र की पूरी तरह से रक्षा की है। पीयूष गोयल के मुताबिक मक्का, गेहूं, चावल, सोया, मुर्गी पालन, दूध, पनीर, एथेनॉल (ईंधन), तंबाकू, कुछ सब्जियां और मांस जैसी संवेदनशील कृषि व डेयरी उत्पादों की पूरी तरह से रक्षा की है। इसी तरह शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक सरकार ने सोयाबीन, चीनी, अनाज, केला, स्ट्रॉबेरी, चिप्स, खट्टे फल, हरी मटर, काबूली चना, मूंग, जैसे उत्पादों पर कोई टैरिफ छूट नहीं दी है यानी सरकार का कहना है कि हमारी मुख्य फसलों और डेयरी उत्पादनों के लिए, अमरीका के लिए कोई द्वार नहीं खोला गया। यही नहीं भारत से कई कृषि उत्पाद अमरीका को जीरो ड्यूटी पर दिए जाएंगे, जिनमें चाय, कॉफी, नारियल, सुपारी, काजू, एवोकाडो, केला, आम, कीवी, पपीता और अनानास शामिल हैं लेकिन सरकार यह स्पष्ट नहीं कर रही कि भारत पर हर साल जो 58 से 60 अरब डॉलर आयात बढ़ाने का प्रेशर है, उसके लिए सरकार आखिर क्या खरीदेगी?
दूसरी तरफ विपक्ष भी स्पष्ट रूप से उन उत्पादों को नहीं बता रहा, जिस पर सरकार ने पूरी तरह से सरेंडर कर दिया है लेकिन न तो सरकार के कुछ कहने का विपक्ष के लिए कोई वजन है और न ही विपक्ष के किसी आरोप से सरकार भी किसी तरह से चिंतित दिख रही। ऐसे में सवाल है आम आदमी इस डील को किस तरह समझे? सरकार ताल ठोकर करके यह कह रही है कि यह पूरी तरह से हमारे पक्ष की डील है, तो दूसरी तरफ विपक्ष जोरदार ढंग से यह कह रहा है कि सरकार ने आत्म समर्पण कर दिया है लेकिन आम आदमी इन दोनों बातों को कैसे समझे? ऐसा तो नहीं है कि विपक्ष अपना राग गाकर और सरकार उसे किसी तरह से न सुनकर राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों को बेमतलब तो नहीं बना रहे? जैसे दशकों तक पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे पर राजनीति में अपराधीकरण को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहे और आम मतदाता यह समझ ही नहीं पाया कि कौन वास्तव में राजनीति में अपराधीकरण का सचमुच में दोषी है।
अंत में आम मतदाता इस आरोप-प्रत्यारोप से इस कदर उदासीन हो गया कि अब उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ? मतदाता मान चुका है कि राजनीति बिना अपराध के हो ही नहीं सकती और इस तरह राजनीति के अपराधीकरण की स्वीकृति हो गई है।
यह वास्तव में एक ही समय दो विरोधाभासी स्थितियां हैं। अगर हम तेजी से दुनिया के बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाकर भारत की अर्थव्यवस्था को अगले कुछ सालों में दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं, तो भला हम विदेशी कंपनियों के कारोबार या विदेशों के साथ देश के कारोबार को कैसे रोक सकते हैं?
भारत और अमरीका के बीच 2023-24 में 190 बिलियन डॉलर का कारोबार हुआ, जिसमें भारत और अमरीका के बीच 65:35 का अनुपात था। ऐसे में अमरीका इस तरह तो सोचेगा ही कि उसका भी कारोबार बढ़े। भारत और अमरीका के बीच अगर 2030 तक कारोबार को बढ़ाकर 500 बिलियन तक ले जाना है, तो जाहिर है इस बढ़े कारोबार से दोनों देशों को फायदा होगा क्योंकि इस कारोबार में अभी तक जो तीन बड़ी बाधाएं थीं, उनमें ढील तो देनी ही पड़ेगी अगर कारोबार को बढ़ाना है। ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपने बाज़ार में तो अमरीका को घुसने से रोकें और खुद अमरीका के समृद्ध बाजार का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना चाहें। अगर अमरीका चाहता है और दबाव बनाता है कि भारत अपने उन क्षेत्रों को भी उसके लिए खोले, जिसे आजतक हमने बंद कर रखा है, तो हमें भी चाहिए कि हम अमरीका पर इस तरह का प्रेशर बनाएं कि वो हमें अपना रणनीतिक और तकनीकी साझेदार बनाए, जिससे हम जो अंधाधुंध पैसा इन क्षेत्रों पर खर्च कर रहे हैं, इसमें बचत हो।
इसमें कोई दो राय नहीं कि अमरीकी निवेश से भारत में हाई वैल्यू जॉब्स आएंगी। टेक, डिफेंस और एनर्जी सेक्टर में एफडीआई बढ़ेगा। एमएसएमई को वैश्विक सप्लायी चेन में प्रवेश मिलेगा, तो अगर हम ये फायदा चाहते हैं तो हमें भी अमरीका को कुछ फायदा तो देने ही होंगे। निश्चित रूप से भारत और अमरीका के बीच जो बहुस्तरीय ट्रेड डील होगी, उसमें दोनों को अपने-अपने तरह से फायदा होगा लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि हमारी एकतरफा जीत हुई है या हमें एकतरफा समर्थन करना पड़ रहा है। वैसे भी इस ट्रेड डील का असली मूल्याकंन 5-7 सालों के लगातार व्यापार को देखकर ही तय किया जा सकता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



