ऊंची जाति का मीडिया बनाम निचली जातियों के आंदोलनकारी

ऐसा लग रहा है कि यूजीसी की इक्विटी कमेटी के खिलाफ ऊंची जातियों का आंदोलन कभी हुआ ही नहीं था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगने के बाद केवल छत्तीस घंटे में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को गालियां देने वाला, उनके चित्रों का घोर अपमान करने वाला, मंत्रियों में मूर्तियों के सामने खड़े होकर भाजपा को वोट न देने की कसमें खाने वाला, इक्विटी कमेटी को भाजपा की तेरहवीं करने वाला बताने वाला आंदोलन जादू के ज़ोर से गायब हो गया है। अखबारों में इस प्रकरण के बारे में एक लाइन भी नहीं देखी जा सकती। इस बात का नोटिस भी लिया जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के विरोध में आंदोलन कर रहे दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के बारे में भी कोई भी मीडिया वाला खबर नहीं दे रहा है। ऐसे में राहुल गांधी की बातें याद आना स्वाभाविक ही है। वे 2023 से ही मीडिया को अगड़ी जातियों के औजार के रूप में चित्रित करते रहे हैं। उनका यह वक्तव्य हमारे कानों में गूंज रहा है कि एक बात पूछना है भैया, इसे समझाइये कि ये जो आपके एंकर हैं, इनमें ओबीसी, ईबीसी, दलित क्यों नहीं दिखाई पड़ते हैं। ये जो बड़े-बड़े रिपोर्टर हैं, टॉक शो करते हैं, डिबेट करते हैं, इनसे पूछिये, भइया, नब्बे प्रतिशत से ज्यादा आबादी इसमें है क्यों नहीं। आज उनकी इस बात का पक्का सबूत मिल गया। इन एंकरों और संपादकों के लिए उस समय सड़कों पर आंदोलन हो रहा था जब ब्राह्मण-ठाकुरों के नेतृत्व में अगड़े ज़बरदस्त आक्रोश का प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन जैसे ही उनका स्थान पिछड़ों ने लिया, मीडिया के सभी मंच खामोश हो गए। उन्होंने पूरी तरह से इक्विटी कमेटी के पक्ष में हो रहे आंदोलन को ब्लॉक कर दिया, लेकिन यही इक्विटी कमेटी के खिलाफ हो रहे आंदोलन को बड़े उत्साह से कवर कर रहा था। 
मीडिया में छायी इस शांति के उलट असलियत कुछ और है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में कमज़ोर जातियों के आंदोलनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। वे विश्वविद्यालयों में जुलूस निकाल रहे हैं। वे हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, लेकिन मीडिया इसकी जानकारी भी देने के लिए तैयार नहीं है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हजारों पिछड़े और दलित छात्रों ने यूजीसी बिल को लागू कराने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया। भाजपा के ओबीसी/एससी/एसटी विरोधी चेहरे को उजागर करते हुए जन आंदोलन खड़ा करने की आवाज़ उठी, लेकिन मीडिया में एक भी खबर नहीं आयी। ओबीसी महासभा ने राष्ट्रव्यापी ज्ञापन-प्रदर्शन का आह्वान किया। मध्य प्रदेश के ज़िला कटनी बहोरीबंद में यूजीसी बिल के समर्थन एवं जनगणना में ओबीसी का कॉलम जोड़े जाने की मांग को लेकर ओबीसी महासभा ज़िला ग्वालियर का आक्रोश प्रदर्शन एवं ज्ञापन किया जा रहा है लेकिन मीडिया में एक भी खबर नहीं आयी। सुप्रीम कोर्ट की रोक के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर बहुजन समाज का प्रदर्शन। यूजीसी नियमों की बहाली की मांग हुई, लेकिन मीडिया ने इस खबर की उपेक्षा कर दी। सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद कई छात्र संगठनों ने इसका विरोध किया। लल्लनटॉप का रिपोर्टर इलाहाबाद के पंत छात्रावास पहुंचा। छात्रों का आरोप था कि हॉस्टल में कई बुनियादी सुविधाओं की कमी है। उनकी फंडिंग रोक दी गई है। उनका दावा है कि यहां अनुसूचित जातियों के छात्र रहते हैं, इसलिए भेदभाव हो रहा है लेकिन मीडिया में एक भी खबर नहीं है। गोरखपुर विश्वविद्यालय में ज़ोरदार प्रदर्शन शुरू हो गया। विश्वविद्यालय परिसर में बड़ी संख्या में कमज़ोर जातियों के समाज से जुड़े छात्र सड़कों पर उतर आए और अपने अधिकारों की आवाज़ बुलंद की, लेकिन मीडिया चुप्पी साधे रहा। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रदर्शन शुरू हो गया। कैम्पस में बड़ी संख्या में छात्र सड़कों पर उतर आए लेकिन मीडिया खामोश रहा। 
दरअसल, कई सर्वेक्षणों ने 2006 से ही बार-बार यह प्रमाण सहित दिखाया है कि मीडिया पर अगड़ी जातियों की इजारेदारी है। सबसे पहले 2006 का मीडिया सर्वे योगेंद्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार द्वारा किया गया था। यह भारतीय राष्ट्रीय मीडिया में जातिगत प्रतिनिधित्व पर पहला प्रमुख और व्यवस्थित सर्वे था, जो मुख्य रूप से दिल्ली स्थित मीडिया हाउसों पर केंद्रित था। इसने भारतीय मीडिया में जातिगत असमानता को स्पष्ट रूप से उजागर किया। इसके निष्कर्षों के अनुसार हिंदू ऊपरी जाति के पुरुषों का राष्ट्रीय मीडिया के प्रमुख पदों पर 71 प्रतिशत कब्ज़ा है। द्विज जातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ, खत्री आदि) ने कुल 16 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद प्रमुख निर्णयकर्ताओं की हैसियत पर 86 प्रतिशत कब्ज़़ा कर रखा है। ब्राह्मण (भूमिहार और त्यागी सहित) अकेले 49 प्रतिशत पदों पर हैं (देश की आबादी में ब्राह्मण केवल 2.3 प्रतिशत हैं, दलित और आदिवासी मीडिया में शून्य प्रतिनिधत्व की स्थिति में हैं। मीडिया के 315 प्रमुख निर्णयकर्ताओं में से एक भी दलित या आदिवासी नहीं था। ओबीसी, जो देश की आबादी का पचास प्रतिशत हैं, की नुमाइंदगी केवल 4 प्रतिशत निकली। मुसलमान केवल तीन प्रतिशत निकले। महिलाएं केवल 17 प्रतिशत। योगेंद्र यादव वाले सर्वेक्षण के बाद ओक्सफेम और न्यूज़लांड्री ने मिल कर 2 अगस्त, 2019 को एक रिपोर्ट जारी की। इसका मकसद यह दिखाना था कि मीडिया में कौन कहां बैठा है, कौन की आवाज़ सुनाई देती है, इसका न्यूज़ डिस्कोर्स पर क्या असर पड़ता है। इस रिपोर्ट ने भी अपने आंकड़ों से भारतीय मीडिया को ‘ऊपरी जातियों का किला’ बताया, जिसमें दलित-आदिवासी-ओबीसी की लगभग अनुपस्थिति है।
क्या मीडिया ने पिछड़ों के आंदोलन को ब्लॉक इसलिए किया है, क्योंकि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण है। वे अगड़ों की तरह अपने कपड़े नहीं फाड़ रहे हैं, गालियां नहीं दे रहे हैं। वे भाजपा और मोदी को वोट न देने की धमकी नहीं दे रहे हैं। अगड़ों का आंदोलन हिंसक तो नहीं था, लेकिन हिंसा के कगार पर था। क्या सरकार और मीडिया को पिछड़ों और दलितों के आंदोलन के भी हिंसा के कगार पर पहुँचने का इंतज़ार है। मुझे यकीन है कि पिछड़ों और दलितों का आंदोलन अपनी शालीनता, शिष्टता और गांधीवादी चरित्र नहीं खोयेगा। वह अपनी मांग करता रहेगा, और अपने दिमाग की डायरी में नोट कर लेगा कि सरकार की गोदी में बैठे मीडिया ने उसके साथ क्या सलूक किया है। वह इसका प्रतिकार चुनाव के मैदान में करेगा। तब देखेंगे, मीडिया चुनाव के नतीजे को कैसे ब्लाक करता है। 

लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।

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