बच्चें को ऑनलाइन खेलों से बचाने की चुनौती
कुछ समय पहले भोपाल की छत्रसाल कॉलोनी के एक व्यवसायी के 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले इकलौते बेटे ने ऑनलाइन खेलों में फंसकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद वैसा ही एक और मामला गाज़ियाबाद में घटित हो गया। सिलसिलेवार तरीके से इस तरीके के मामले प्रकाश में आते रहे हैं। विगत 24 महीनों में करीब 180 ऐसी घटनाएं देशभर में रिपोर्ट की गई हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों में जिस हिसाब से 5 सालों में उछाल आया है, वह निश्चित रूप से रोंगटे खड़े करता है। कौन-सी तरकीब अपनाई जाए, जिससे बच्चें फिर से गेमिंग के चुंगल से निकलकर अपने पारम्परिक देशी किस्म के खेल-कूदों की ओर लौट आएं।
दरअसलए ऐसी ज़रूरत गाज़ियाबाद में तीन बहनों द्वारा आत्महत्या करने के बाद और ज़्यादा महसूस होने लगी है। क्यों आजकल के बच्चे मैदानी खेलों को छोड़कर मोबाइल खेलों के चुंगल में फंसते जा रहे हैं। ऐसे सवालों का उत्तर बिना देर किए सामूहिक स्तर पर समाज के प्रत्येक वर्ग को खोजना चाहिए। किशोर आयु में गेमिंग की लत जानलेवा बीमारी की तरह हो गई है। कोरियन गेम खेलने वाली गाज़ियाबाद की तीन सगी नाबालिग बहनों ने गेम के एक टास्क में खुद को फंसाकर मौत को गले लगा लिया। मृतक लड़कियों ने अपने पिता के नाम चिट्ठी लिख कर मौत की वजह भी बताई। आठ पृष्ठों के सुसाइट नोट में उन्होंने अपनी अधूरी चाहत की पूरी दास्तां को विस्तार से लिखा।
घटना की शुरूआती जांच बताती है कि गेम की गिरफ्त में तीनों बहनें ऐसी जकड़ी गईं कि निकल ही नहीं पाई। अंत में तीनों ने नौवीं मंज़िल से कूद कर अपनी जीवन लीला को समाप्त करना ही मुनासिब समझा। मामला जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा हैए नई-नई अचंभित करने वाली बातें सामने आ रही हैं। कुछ ऐसी भी बातें जिन पर एकाएक विश्वास करना मुश्किल है। पुलिस की थ्योरी और पड़ोसियों की माने तो तीनें बहने चौबीसों घंटे ऑनलाईन खेल में व्यस्त रहती थीं। तीनों गेमिंग के ज़रिए कोरियन कल्चर को उन्होंने अपने दिल-दिमाग में इस कद्र बिठा लिया था कि कोरिया के बिना उनका जीवन बेकार प्रतीत होता था। उनके रवैये से परिवार भी परेशान और चिंतित था। पिता ने तीनों से उनका मोबाइल भी छीन लिया था, जिसके चलते उन्होंने लड़ना-झगड़ना भी शुरू कर दिया था। इसके अलावा लड़कियां रोज़ाना अपने परिवार पर कोरिया ले जाने का दबाव भी डालने लगी थीं।
यह बात अब सामने आ चुकी है कि ज़्यादातर खेल मनोरोगी जैसी लत परोसने लगे हैं। बच्चों को ज्यादा से ज्यादा अपनेपन का एहसास कराने की ज़रूरत है। एक बार जो इसकी गिरफ्त में फंसा, तो आसानी से छुटकारा नहीं पा सकता।
इस घटना को ध्यान में रखकर यह समझा होगा कि आखिर कोरियाई कल्चर किशोरों को क्यों लुभाने रहा है? दरअसलए कोरियाई कल्चर की कुछ खासियतें हैं। उनका आधुनिक ड्रामा और पारिवारिक भावनाएं लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। उनके अपनेपन से लोग आसानी से उनसे जुड़ जाते हैं। कोरिया की आधुनिक और पारम्परिक जीवनशैली, के-फूड, फैशन और के-ब्यूटी भी किशोरों को बेहद आकर्षित करती है। भारत में इस समय ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कोरियन फिल्मों, नाटकों, धारावाहिकों को खूब पसंद किया जाता है। इस सबसे बढ़कर किशोरों व युवाओं पर उनका गेंमिंग सेक्टर ज्यादा प्रभाव डाल रहा है।
किशोरों व नई पीढ़ी पर ऑनलाइन गेमिंग के गहरे मानसिक असर से बचाने की बड़ी चुनौती सामने खड़ी हो गई है। बदले युग की आधुनिक तस्वीर निश्चित रूप से भयावह हैं। मैदान, पार्क, खेल-कूद के सभी स्थान बच्चों के बिना सूने पड़े हैं। मैदानों में जाने की बजाय बच्चें मोबाइलों में घुसे रहते हैं। स्कूल से आते ही बच्चे मोबाइल पकड़ लेते हैं। गाज़ियावाद की दुखद घटना से समाज को सबक लेने की ज़रूरत है।
अब ऑनलाइन खेलों से अपने बच्चों को कैसे बचाना है, यह परिवार और माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। हमारे देश में ऐसा संभव नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया की भांति हमारे यहां भी 16 वर्ष तक के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लग सकती है। यह अभिभावकों के लिए खुली चुनौती और चेतावनी है। ऐसी चेतावनी बच्चों को गेमिंग की लत से बचाने का आह्वान करती है। बच्चों द्वारा मोबाइल में देखी गई सामग्री पर नज़र रखनी होगी। अगर कुछ गलत लगता है तो उसे समझना होगा। बच्चों को ऑनलाइन खेल खेलने से हर हाल में रोकना अब ज़रूरी हो गया है। (एजेंसी)



