शहीद भगत सिंह की नज़र में स्वतंत्रता सेनानी
किसी महफिल में सौ साल पहले शहीद भगत सिंह के हिन्दी में लिखे ‘होली के दिन खून के छींटे’ नामक लेख का ज़िक्र आया तो मैंने पटियाला निवसी सरबजीत सिंह विर्क की ताज़ा पुस्तक ‘कौमी शहीदां अते देश भगतां उत्ते शहीद भगत सिंह के लेख’ के पृष्ट पलटने शुरू कर दिए। इस पुस्तक में भगत सिंह की देश भक्तों के प्रति श्रद्धा को उभारा गया है। 19 वर्ष की उम्र में लिखा उनका यह लेख 27 फरवरी, 1926 की उस होली के बारे में है, जिस दिन लाहौर की केन्द्रीय जेल में बाबर अकाली विचारधारा को समर्पित छह योद्धाओं किशन सिंह गड़गज, संता सिंह, दलीप सिंह, नंद सिंह, कर्म सिंह और धर्म सिंह को फांसी दी गई थी। यह लेख कानपुर से प्रकाशित ‘प्रताप’ अखबार के 15 मार्च, 1926 के अंक में ‘एक पंजाबी युवक’ शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ था। फिलहाल मैं भगत सिंह की नज़र में अशफाक उल्लाह खान और राम प्रसाद बिस्मिल का ज़िक्र करूंगा, जो राजनीतिक जीवन व्यतीत करते हुए शायरी भी करते रहे हैं। यह बताने के लिए कि ‘सरफरोशी की तमन्ना’ लिखने वाले बिस्मल अज़ीमाबादी इन्हें गाकर लोकप्रिय करने वाले राम प्रसाद बिस्मिल से अलग व्यक्ति था। उनकी ओर से 1921 में पटना (बिहार) में रचना लिखी गई थी।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।
पेश है राम प्रसाद बिस्मिल बारे भगत सिंह की पेशकारी : श्री राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ बहुत मेधावी युवा थे। उन्हें पूरी साज़िश का नेता माना गया है। बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे न होने के बावजूद पंडित जगत नारायण जैसे सरकारी वकील को असमंजस में डाल देते। उन्होंने चीफ कोर्ट में अपनी अपील खुद लिखी थी, जिससे जजों को कहना पड़ा कि इसे लिखने में अवश्य किसी बुद्धिमान और योग्य व्यक्ति का हाथ है।
आप को 19 दिसम्बर, 1927 को फांसी दी जानी थी। 18 दिसम्बर को अपनी मां से मिलते समय आपकी आंखों से आंसू बह निकले। मां बड़ी साहसी देवी थीं। आपको कहने लगीं, ‘हरिशचंद्र, दधीची आदि बड़ों की तरह साहस के साथ धर्म और देश के लिए अपने प्राण दे दो। चिंता या पश्चाताप की कोई जरूरत नहीं है। आप हंस पड़े और कहा, ‘मां मुझे चिंता कैसी और पश्चाताप कैसा। मैंने कोई पाप नहीं किया है। मैं मृत्यु से नहीं डरता।
फांसी के फंदे की तरफ जाते हुए उन्होंने वंदे मातरम और भारत माता की जय के साथ ये शब्द आसानी से कहे :
मालक तेरी रज़ा रहे औफ तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूं, न मेरी आरज़ू रहे।
जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे,
तेरा ही ज़िक्र यार, तेरी जुस्तजू रहे।
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अब न अहले वलवले हैं,
और न अरमानों की भीत,
एक मिट जाने की हसरत,
अब दिल-ए-बिस्मिल में है।
फिर परमात्मा से प्रार्थना करने के बाद एक मंत्र पढ़ना शुरू किया और रस्सी खींची गई। आप को मैनपुरी साज़िश के नेता श्री गेंदा लाल दीक्षित जैसे शूरवीर ने खास तौर पर प्रशिक्षण देकर तैयार किया था। मैनपुरी के मुकद्दमे के समय आप नेपाल चल गए थे। अब वही पढ़ाई आपकी मौत की एक बड़ी वजह बन गई।
7 बजे आपका शव मिला और एक बहुत बड़ा जुलूस निकला। आपकी मां ने देश प्रेम में कहा, ‘मैं अपने बेटे की इस मौत से खुश हूँ, दुखी नहीं।’
जब इतर-फुलेल और फूलों की वर्षा में उनका शव ले जाया जा रहा था, दुकानदारों ने पैसे फेंके और 11 बजे उनकी लाख श्मशान घाट पहुंची और अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ।
उनके आखिरी खत का एक हिस्सा उन्हें समर्पित है :
‘मैं बहुत खुश हूं। 19 तारीख की सुबह जो होना है, उसके लिए तैयार हूँ। परमात्मता मुझे काफी शक्ति देगा। मेरा विश्वास है कि मैं लोगों की सेवा के लिए जल्द ही दोबारा जन्म लूंगा। सबको मेरा नमस्ते कहना। दया करके इतना काम और भी करना कि मेरे पंडित जगत नारायण (सरकारी वकील जिन्होंने उसे फांसी पर चढ़वाने के लिए बहुत ज़ोर लगाया था) को अपना आखिरी नमस्ते कह देना। उन्हें हमारे खून से सने रुपये से चैन की नींद आए। भगवान उन्हें बुढ़ापे में सद्बुद्धि दे।’
भगत सिंह के शब्दों में अशफाकउल्लाह खान मस्ताना योगी थे। उन्हें भी हैरान करने वाली खुशी से फांसी पर चढ़े। वह बहुत सुंदर और लंबे युवा थे। जेल में कुछ बुरा हो गया था। आप ने मुलाकात के समय बताया कि बुरा होने का कारण चिन्ता नहीं, अपितु परमात्मा की याद में मस्त रहने की खातिर रोटी बहुत खाता रहा हूं।
फांसी से एक दिन पहले आप की मुलाकात हुई। आप बहुत सजे-धजे थे और हंस कर बातें करते रहे। आपने कहा कि कल मेरी शादी होने वाली है। दूसरे दिन सुबह 6 बजे आप को फांसी दी जानी थी। कुरान शरीफ का थैला लटका कर, हाजियों की तरह वज़ीफा पढ़ते हुए साहस से चल पड़े। आगे जाकर तख्ते और रस्सी को चूमा। वहां आपने कहा, ‘मैंने कभी किसी आदमी के खून से अपने हाथ नहीं रंगे और मेरा इंसाफ ़खुदा के सामने होगा। मुझ पर लगाए गए सभी आरोप झूठे हैं।’ ़खुदा का नाम लेते हुए रस्सी खींची गई और वह चले गए। उनके रिश्तेदारों ने बहुत मिन्नतें करके उनका शव लिया और उसे शाहजहांपुर लाए।
लखनऊ स्टेशन पर मालगाड़ी के एक डिब्बे में उनका शव देखने का मौका कुछ लोगों को मिला। फांसी के 10 घंटे बाद भी उनके चेहरे पर उसी तरह रौनक थी। लग रहा था कि अभी सोए हैं। अशफाक शायर थे, उनका तखल्लस ‘हसरत’ था। मरने से पहले आपने दो शे’अर कहे :
़फना है सबके लिए, हम पै कुछ नहीं मौकूफ,
बका है एक फकत ज़ात-ए-किब्रिया के लिए।
तंग आकर हम भी उनके ज़ुल्म से,
बेदाद से,
चल दीये सूये अदम जिंदाने फैज़ाबाद से।
कुल मिलाकर बात यह है कि शहीद भगत सिंह भेदभाव के समर्थक नहीं थे। अशफाक उल्लाह, मदन लाल ढींगरा, सूफी अंबा प्रसाद और सतगुरु राम सिंह अपने-अपने तरीके के योद्धा थे। आप शाहजहांपुर के रहने वाले थे और श्री राम प्रसाद के दाहिने हाथ थे। मुसलमान होने के बावजूद आपका आर्य समाजी धर्म से बहुत प्रेम था। दोनों प्रेमी ने एक ही कार्य के लिए अपने प्राण त्याग कर अमर हो गए। ज़िन्दाबाद।



