स्वास्थ्य बजट में वृद्धि से मुकम्मल इलाज या महज़ मरहम-पट्टी ?

बजट में स्वास्थ्य के मद में आवंटन का एक लाख करोड़ रुपये से पार जाना अत्यंत सुखद है, साथ ही कई नई घोषणाएं भी उम्मीद जगाने वाली हैं। लेकिन क्या इसके प्रावधान, प्रस्ताव इस साल स्वास्थ्य क्षेत्र पर इतना असर डालेंगे कि देश की सेहत सुधरती हुई लगे?
इस घोषणा के साथ कि देश में मज़बूत, समावेशी और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली तैयार करना सरकार की प्राथमिकता है, बजट में हेल्थकेयर इकोसिस्टम को मज़बूत करने पर अभूतपूर्व ज़ोर दिया गया है। यह इस बात से भी दिखता है कि स्वास्थ्य बजट इस बार एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है, जो कि 2014-15 के 35 हज़ार करोड़ से कई गुना ज्यादा है। इस बजट में कुछ लक्षित पहलें सराहनीय हैं जैसे एम्स जैसे 3 नए आयुर्वेदिक हॉस्पिटल बनाने की सोच, 10 हजार करोड़ रुपये के बायोफार्मा शक्ति मिशन के ज़रिए घरेलू बायोफार्मा उत्पादन को बढ़ावा देने की बात, डेढ़ लाख नए केयर गिवर तैयार करने का ऐलान, 5 क्षेत्रीय मेडिकल टूरिज़्म हब स्थापित करने हेतु राज्यों को सहायता देने का प्रस्ताव, प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना विकास, ज़िला अस्पतालों में इमरजेंसी और ट्रॉमा केयर सेंटरों का 50 फीसदी विस्तार, डिजिटल हेल्थ मिशन अथवा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने के लिए नए नेशनल लेवल के मेंटल हेल्थ इंस्टिट्यूट स्थापित करने का प्रावधान, ये लक्ष्य बताते हैं कि सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र और उसकी सेवाओं के विस्तार हेतु तर्क-संकल्प है। बेशक हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने, कैंसर की दवाओं को सस्ता करने, डायबिटीज और ऑटोइम्यून रोगों की दवाओं को देश में ही बनाने तथा आयुर्वेदिक और दूसरी पारम्परिक दवाओं के लिए क्वालिटी-एश्योरेंस इकोसिस्टम को मज़बूत करने के साथ इस क्षेत्र में कुशल लोगों की संख्या बढ़ाने की बात उम्मीद जगाने वाली है। 
मगर स्वास्थ्य मद में एक लाख करोड़ से अधिक वाले इस बजट के बजटीय प्रावधानों, प्रस्तावों उसके आवंटनों को जब हम इस कसौटी पर परखते हैं कि वे इस क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज करवा सकेंगे या मात्र सामान्य बदलावों के वाहक बनेंगे तो कई सवाल उभरते हैं, सबसे अहम बात कि क्या यह आवंटन भारत जैसे विशाल जनसंख्या और जटिल एवं बहुस्तरीय स्वास्थ्य चुनौतियों के अनुपात में पर्याप्त है? प्रावधान समस्या की जड़ों तक पहुंचते हैं अथवा फौरी समाधान भर हैं? बरसों से बीमार स्वास्थ्य तंत्र के दीर्घकालिक मज़र् के लिए ये मात्र मरहमपट्टी साबित होंगे या मुकम्मल इलाज की कोशिश? सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय एक दशक बाद जीडीपी के 1.15 से बढ़कर 2 प्रतिशत के आसपास पहुंचना बढ़िया है, परन्तु हमने 2017 में ही 2025 तक इसे 2.5 फीसदी पहुंचाने का प्रण किया था, अब तक दो के करीब ही पहुंचे जो वैश्विक मानकों से बहुत कम है। 
विश्व स्वास्थ्य संगठन 5 फीसदी के आसपास की अनुशंसा करता है तो अधिकांश विकसित देशों में यह 5 से 8 फीसदी है। एक लाख करोड़ का आंकड़ा प्रभावशाली भले दिखे पर संरचनात्मक कमी बरकरार है। सवाल यह भी है कि क्या बजट के प्रावधान आम आदमी के लिये उसका इलाज तथा दवा सुलभ और सस्ता कर स्वास्थ्य सेवाओं तक उसकी पहुंच बढ़ाने वाले हैं। प्रदूषित हवा, संदूषित पेयजल, मिलावटी खाद्य पदार्थ, कुपोषण, अस्वास्थ्यकर रहन-सहन जैसे रोगों के कारकों के रोकथाम या उन्हें दूर करने के कारण बनेंगे? क्या ये चिकित्सकों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ और अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता पर भी कहीं से प्रभाव डालेंगे? स्वास्थ्य बीमा को आसान करेंगे और ओपीडी में मरीज़ों की जांच, निदान सुविधा को बढाएंगे? सात दुर्लभ बीमारियों के अलावा कैंसर की दवाओं को सस्ता करने का फैसला सकारात्मक कदम है, रोगियों को महंगे उपचार से यह प्रत्यक्ष राहत देगा, परन्तु रोकथाम पर निवेश, नियमित स्क्रीनिंग, जीवनशैली परामर्श पर भी व्यय अधिक दीर्घकालिक और प्रभावी उपाय होता।  
बायोफार्मा शक्ति मिशन के तहत 10,000 करोड़ रुपये का निवेश बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर उत्पादन को बढ़ावा देने से स्वदेशी दवा उत्पादन बढ़ेगा, आयात निर्भरता घटेगी, दीर्घकालिक में दवा लागत कम होगी परन्तु यदि राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण सूची का दायरा नहीं बढ़ा, सार्वजनिक अस्पतालों का विस्तार नहीं हुआ तो राहत सीमित रहेगी। स्वास्थ्य बीमा में राहत का पर्याप्त प्रभाव तभी होगा जब सरकारी अस्पतालों में दवाओं की अनुपलब्धता, स्टॉक-आउट और उपकरणों की खराबी का सिलसिला खत्म होगा। जिला अस्पतालों में ट्रॉमा सेंटरों का 50 प्रतिशत  का विस्तार और 1.5 लाख केयरगिवर्स के प्रशिक्षण का लक्ष्य स्वास्थ्य कार्यबल को सुदृढ़ करने की दिशा में बढ़िया प्रयास है, इसी तरह मानसिक स्वास्थ्य के लिए नए राष्ट्रीय संस्थान स्थापित करने की घोषणा भी। भारत में कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 50 फीसदी अब भी जेब के खर्च से बाहर है। बजट जड़ समस्याओं पर सीधा आवंटन नहीं करता, केवल नयी स्कीम जोड़ता है। तीन नए आयुर्वेद एम्स संस्थान और आयुष फार्मेसियों के उन्नयन की घोषणा पारंपरिक चिकित्सा को संस्थागत समर्थन देती  तो है पर आयुर्वेद की दीर्घकालिक विश्वसनीयता केवल संस्थान खोलने से नहीं बल्कि इलाज के लिये जड़ी-बूटियों की अनुप्लब्धता न हो इसलिये उनका संरक्षण, जनता में इस पद्धति पर जागरूकता और विश्वास बढाने, वैज्ञानिक शोध और गुणवत्ता मानकों से तय होगी। 
हील इन इंडिया और मेडिकल टूरिज़्म हब भारत को वैश्विक स्वास्थ्य केंद्र बना सकते हैं, परन्तु यह प्रश्न बना रहेगा कि क्या इन निवेशों से ग्रामीण और शहरी गरीबों की प्राथमिक स्वास्थ्य ज़रूरतें समान प्राथमिकता पायेंगी?
सरकार को डिलीवरी-केंद्रित आवंटन और निजी नियमन पर फोकस करना चाहिए अन्यथा, ये प्रावधान कागज़ी ही साबित होंगे। इस बजट में दिशा है, परन्तु पैमाना और संरचनात्मक सुधार अभी अधूरे हैं। निर्णायक बदलाव के लिए अधिक संसाधन, कठोर क्रियान्वयन, सार्वजनिक स्वास्थ्य डिलीवरी सुधार और रोकथाम-आधारित दृष्टिकोण आवश्यक हैं। जब तक मेडिकल कॉलेज, ज़िला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार बड़े पैमाने पर नहीं होगा, केवल बजट वृद्धि से तस्वीर नहीं बदलेगी। ये नवीनतम मरहमपट्टी ही साबित होंगे, न कि मुकम्मल इलाज।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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