हंगामे के कारण संसद की गरिमा पर गहराता संकट

पिछले दिनों संसद को ऐसा दिन भी देखना पड़ा जब विपक्ष की नारेबाजी और वॉकआउट के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति अभिभाषण पर जवाब दिया और उससे पहले लोकसभा में भारी शोर-शराबे के बीच उनके भाषण के बगैर ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित हो गया। यह शायद 2004 के बाद पहला मौका था। सरकार और विपक्ष के बीच यह तनातनी संसदीय लोकतंत्र की परम्पराओं और गरिमा के लिहाज से अत्यंत चिताजनक है। संसद का मौजूदा बजट सत्र टकराव और नैरेटिव गढ़ने की जंग का मैदान बन गया है। 
राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्बारा पूर्व सेना अध्यक्ष की एक अप्रकाशित पुस्तक का ज़िक्र करने पर सदन में भारी हंगामा हुआ। गतिरोध पूरे हफ्ते चलता रहा। सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अपने-अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से पूरे मुद्दे को भुनाने की कोशिश की। जब नाम के साथ गांधी सरनेम जुड़ जाता है तो माहौल अलग ही हो जाता है। हर संसद सत्र में वह एक मुद्दा दे देते हैं। वह पत्रकारों को विषय देते हैं और सरकार को भी व्यस्त रखते हैं। खबरों में बने रहने का जो इनकी नई कला है वह वामपंथ से आई है। कांग्रेस अब ‘सेंटर’ की अपनी ताकत खो चुकी है और राहुल गांधी के नेतृत्व में केवल हेडलाइंस बनाने के लिए मानो वामपंथ की वैचारिक ज़मीन पर खड़ी है।
संसद एक ऐसा मंच है जहां से पूरे देश के अंदर संदेश दे सकते हैं और राजनीति चलती ही वृत्तांत पर है। अगर कोई मुद्दा राहुल गांधी उठाते हैं तो उसे सुना तो जाना चाहिए। राहुल के मुद्दे सत्ता पक्ष को एक रक्षात्मक मैदान पर ले जाते हैं। राहुल जिस तरह की राजनीति करते हैं, वो जिस तरह के मुद्दे उठाते हैं, उस पर विवाद होते रहते हैं। जहां तक नियम का सवाल रहा, तो ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं जहां राहुल को नियमों के होते हुए भी रोक दिया जाता है। यह सही है कि राहुल को नियम के तहत ही मुद्दों को उठाना चाहिए। राहुल गांधी एक वृत्तांत बनाने की कोशिश कर रहे हैं, राहुल राजनीति के अंदर कमबैक करने की कोशिश कर रहे हैं... वह अपनी बात को सीधे-सीधे व्यक्त करने की कोशिश करते हैं जिसमें लाग-लपेट नहीं होती। संसदीय बहस में यह तय करना होगा कि बहस का स्तर क्या हो। राहुल ने अपनी तरफ  से कुछ नहीं गढ़ा। उन्होंने वही पढ़ा जो पब्लिकेशन में था। सत्ता ये सोचती है कि वह शक्तिमान है। जब सत्तारूढ़ यह मानने लगते हैं कि बह ही सही हैं, वहां समस्या आती है।
निशिकांत दुबे काउंटर करने के लिए व्यक्तिगत जीवन को लेकर आए। व्यक्तिगत आक्षेप नहीं होने चाहिए। संसद एक ऐसा फोरम है जहां सरकार की आलोचना की जा सकती है। संविधान में नियम इसीलिए बनाए हैं। राहुल गांधी ने किताब से वही तथ्य उठाए हैं, जिससे उनका यह तर्क मज़बूत हो सके कि भारत सरकार सुरक्षा के मामले में कमज़ोर है। जहां तक वास्वितक नियंत्रण रेखा की बात आती है तो 1962 के भारत-चीन युद्ध को लेकर हेंडरसन ने भी किताब लिखी थी। भारत सरकार ने आज तक उस किताब को मंजूरी नहीं दी है। रक्षा मंत्रालय ने 35 में से 34 किताबों को मंजूरी दी, लेकिन यदि एक को रोका गया तो उसके पीछे सुरक्षा का तर्क दिया गया है। राहुल अपनी बात सीधे तौर पर रखते हैं, परन्तु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंदर यह समझ है कि कब दो कदम पीछे जाना है और कब दो कदम आगे चलना है, इसलिए वह जनता के साथ सीधे सम्पर्क करते हैं। 
विपक्ष के सवाल उठाने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, अगर वे अवसर, सांविधानिक मूल्यों और संसदीय प्रक्रिया के अनुरूप हों। बेवजह के हंगामे में मूल प्रश्न तो गुम हो ही जाते हैं, सदन का कीमती समय भी बर्बाद होता है। संसद भारतीय लोकतंत्र का मंदिर है, जहां राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा और धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना दोनों सदनों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है। सही मायनों में सदनों का सही संचालन सरकार और विपक्ष, दोनों से परिपक्वता की मांग करता है। शोर-शराबा और वॉकआउट संसद को कमज़ोर करते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है और ऐसे में कोई गलत व्यवहार लोकतंत्र की छवि को धूमिल तो करता ही है, संसदीय संस्कृति के क्षरण की ओर भी इशारा करता हैं। लोकतंत्र तभी मज़बूत होता है जब सभी दल नियमों का पालन करें, एक-दूसरे का सम्मान करें और जनहित को सर्वोपरि रखें। अगर यह सब बाधित हो रहा है तो यह सरकार और विपक्ष के लिए चिंतन का विषय होना चाहिए।  (एजेंसी)

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