मुफ्तिया घोषणाओं से देश के विकास पर बढ़ता बोझ
केन्द्र की भाजपा-नीत प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार में वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण की ओर से वर्ष 2026-2027 के लिए प्रस्तुत बजट के प्रारूप में मुफ्त की घोषणाओं से परहेज़ किये जाने की देश में प्राय: सभी वर्गों की ओर से प्रशंसा की जा रही है। अच्छा हुआ, इस सरकार ने साहसपूर्वक ऐसा पग उठाया। इसकी जन-साधारण की ओर से अपेक्षा भी की जा रही थी। इससे पूर्व विगत अनेक वर्षों से देश और राज्यों की सरकारों की ओर से समय-समय पर घोषित की जाती मुफ्त की योजनाओं के कारण देश के अधिकतर राज्यों में विकास और उन्नति के सभी कार्य या तो ठप्प होकर रह गये थे, अथवा लम्बित पड़ गये थे। यह स्थिति यूं तो कई वर्षों से बद से बदतर होती जा रही से देश के विकास पर किन्तु विगत एक दशक से यह चिन्तनीय स्तर पर पहुंच गई प्रतीत होने लगी थी। इस गम्भीर स्थिति की लाल रेखा को छूते राज्यों में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों के साथ पंजाब भी शुमार होता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के पूर्व-घोषित बजट अनुमान से जुड़ी एक रिपोर्ट के अनुसार इस सूची में बिहार, गुजरात, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के नाम भी ऊपरी कतार में आ जाते हैं। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य तो लाल रेखा के भीतर तक आते हैं जिनकी 93 प्रतिशत आय विकास कार्यों के अतिरिक्त कामों पर खर्च हो जाती है। इन सभी राज्यों की कुल वार्षिक वित्तीय कमायी और आय में से सब्सिडी, कर्मचारियों के वेतन, रिटायर्ड कर्मियों की पैन्शन, कज़र् और ब्याज के भुगतान आदि की अदायगी हेतु अधिकतर भाग खर्च हो जाता है। अत: विकास-कार्यों के लिए कोई बजटीय प्रावधान शेष नहीं रहता। राजस्थान, हरियाणा और पंजाब का शुमार इस मामले में अधिक निचले स्तर पर होता है जहां इन राशियों के भुगतान के बाद शेष बकाया घटाव के चरण तक पहुंच जाता है अर्थात राजस्थान माईनस 16.7 प्रतिशत और हरियाणा माइनस 30.2 प्रतिशत रह जाता है। पंजाब की स्थिति अधिक दयनीय हो जाती है जहां यह घाटा माइनस 72.7 प्रतिशत हो जाता है।
इस उपलब्ध जानकारी के अनुसार मुफ्त की योजनाओं, घोषणाओं एवं ऋण बोझ और ब्याज की किश्तों के कारण प्राय: देश के अधिकतर राज्य बेहाल और परेशान हैं। अनेक राज्यों में ऋण और ब्याज का बोझ सम्बद्ध राज्य के सम्पूर्ण शिक्षा बजट से भी अधिक हो जाता है। इन राज्यों में प. बंगाल भी शामिल है जहां की कुल आय का 21.2 प्रतिशत हिस्सा केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है। राजस्थान में कर्ज की किश्त और उसके ब्याज की अदायगी के कारण, प्रत्येक वर्ष चाह कर भी स्वास्थ्य की मद पर होने वाले खर्च को बढ़ाया नहीं जा रहा।
देश भर में राजनीति की दिशा और दशा आज यह हो गई है कि मुफ्त की योजनाएं और घोषणाएं सत्ता प्राप्त करने की एक बड़ी कारगर कुंजी बन गई हैं। इनके बिना राजनीतिक दलों के लिए सत्ता की सीढ़ी के प्रथम पायदान पर चढ़ना भी कठिन क्या, असम्भव जैसा हो जाता है। लिहाज़ा सभी राज्यों में प्राय: सभी राजनीतिक दल इस हेतु बोली लगाने की तर्ज पर मुफ्त की घोषणाएं करते जाते हैं। राज्यों की कमाई और खर्च की हालत यह हो गई है कि सब्सिडियों, वेतन, पैन्शन और ब्याज की अदायगी के बाद उनके पास केवल 20-25 प्रतिशत हिस्सा ही शेष बचता है। इसमें से राज्यों का राजनीतिक विमर्शों पर होने वाला खर्च अलग होता है। सो, कहां से और कैसे हो सकेंगा विकास के कार्य। अकेले पंजाब राज्य की बात करें, तो उसकी 93 प्रतिशत आय तो इन मुफ्त के हिस्सों पर खर्च हो जाती है। शेष बचे आवश्यक कार्यों हेतु पंजाब को अतिरिक्त कर्ज उठाना पड़ता है। स्थितियों का एक भयावह पक्ष यह भी है कि कई राज्यों को कर्ज का मूल धन चुकाने के लिए भी हज़ारों करोड़ रुपये की आवश्यकता पड़ती है। राजस्थान को इस वर्ष 1,50,000 करोड़ रुपये मूलधन चुकाना है।
हम समझते हैं कि राज्यों की यह स्थिति उनके विकास-कार्यों हेतु किये जाने वाले खर्च, उनकी आय, कमाई और व्यय के बीच के अन्तराल और आय के नये संसाधनों की खोज हेतु कोई योजनाबंदी एवं समुचित संतुलन न होने से होती है। सरकारों को सब्सिडियों की अन्धा-धुंध घोषणाओं एवं मुफ्त की सुविधाओं की अकारण घोषणाओं से संकोच करना चाहिए। राजनीतिज्ञों को यह भी सोचना चाहिए कि मुफ्त की घोषणाओं से सरकारी कोष पर तो बोझ बढ़ता है, किन्तु आमजन को लाभ की अपेक्षा उनमें अकर्मण्यता की भावना ही उपजती है। सरकारें लोगों की नाराज़गी की वजह से ऐसी सस्ती घोषणाएं तो करती हैं, किन्तु इनके देश, समाज और विकास-कार्यों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की ओर समुचित ध्यान नहीं दे पातीं। लिहाज़ा देश और राज्यों के अधिकतर विकास कार्य कागज़ों पर ही रह जाते हैं। यह अच्छा हुआ है कि केन्द्र सरकार के वर्ष 2026-27 के बजट में ऐसी फ्रीबीज़ अर्थात मुफ्त की घोषणाएं करने से संकोच किया गया है। हम समझते हैं कि केन्द्र एवं राज्यों की सरकारों को पूरी ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता के साथ ऐसी योजनाएं बनाना होंगी जिनसे राष्ट्र एवं राज्यों पर इस प्रकार की व्यर्थ की घोषणाएं एवं योजनाओं का बोझ कम हो, और विकास कार्यों में तेज़ी आ सके।



