भारत-अमरीका व्यापार समझौता
पिछले समय में भारत ने अनेक देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं। उनसे आमतौर पर यह प्रभाव मिलता है कि इन समझौतों के साथ जहां भारत में अनेक अलग-अलग तरह के उत्पादनों को उत्साह मिलेगा, वहीं इसकी आर्थिकता भी मज़बूत होगी। इस समय देश की मुख्य ज़रूरत अलग-अलग क्षेत्रों में अधिक-से-अधिक नौकरियां पैदा करने की है। अधिक जनसंख्या वाला देश होने के कारण प्रत्येक वर्ष बेरोज़गारों की संख्या बढ़ती जाती है। यही बढ़ा कारण है कि देश भर में से नौजवान रोज़ी-रोटी की तलाश में जायज़-नाजायज़ तरीके से विदेशों को जाने को प्राथमिकता देते हैं। परन्तु वहां जाने के लिए वित्तीय साधनों के अलावा अनेकों-अनेक अन्य प्रकार की समस्याओं और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यह अमल किसी भी पक्ष से सुखद और आसान नहीं होते। दूसरी तरफ दुनिया में भारत की पहले से बदली हुई स्थिति के कारण आज यह बात गर्व के साथ कही जा सकती है कि दुनियाभर के बड़े देश भारत के साथ प्राथमिकता के तौर पर सहयोग और आदान-प्रदान करना चाहते हैं।
साल भर पहले अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा दुनियाभर से अपने देश को होने वाले आयात पर अधिक से अधिक कर (टैरिफ) लगाने के किए गए ऐलान ने हड़कंप मचा दिया था। यह भी एक बड़ा कारण था कि दर्जनों ही विकसित देशों को भी अमरीकी राष्ट्रपति की आर्थिक नीतियों को देखते हुए अपनी-अपनी नीतियां बनानी पड़ी थीं। यह बात भारत के लिए लाभदायक ज़रूर रही है कि बहुत सारे विकासशील और विकसित देशों ने आपसी व्यापार के लिए भारत को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी है। इनमें यूनाइटेड अरब अमीरात भी आता है। इसको यू.ए.ई. कहा जाता है, जिसमें दर्जन भर देश शामिल हैं, जिन्होंने अपने तेल के भंडारों के साथ-साथ अलग-अलग ढंग तरीकों से अनेक तरह के अन्य व्पायार और कारोबार भी शुरू किए हुए हैं। अबू धाबी, यू.ए.ई. की राजधानी है, इसलिए इसकी साझी सरकार ने भारत के साथ समानता के आधार पर जो व्यापारिक समझौता किया है, उससे भारत के भविष्य के लिए बड़ी आशा पैदा हुई है। ऑस्ट्रेलिया जैसे प्राकृतिक भंडारों के साथ भरपूर और विशाल देश ने भी प्राथमिकता के आधार पर भारत के साथ व्यापारिक समझौता किया है। इसी तरह न्यूज़ीलैंड ने भी इस क्षेत्र में भारत की ओर अपना पूरा रूझान दिखाया है। चाहे ब्रिटेन पिछले लम्बे समय से भारत का व्यापारिक सहयोगी रहा है। वहां बड़ी संख्या में भारतीय लोग भी रह रहे हैं, परन्तु नये उत्पन्न हुए हालात को देखते हुए इसने भी नई शर्तों सहित भारत के साथ इस दिशा में समझौते किए हैं।
इस क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा समझौता यूरोपीय संघ के देशों से हुआ है। इस 27 देशों के संगठन ने अपने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों की सूची में भारत को सबसे ऊपर रखा है। भारत के लिए यह गर्व की बात कही जा सकती है कि यूरोप के 27 देशों ने संयुक्त रूप में यह समझौता किया है। गत वर्ष से अमरीका की टैरिफ नीतियां अलग-अलग चरणों में से गुज़रती रही हैं। अमरीकी प्रशासन ने चीन तथा रूस जैसे बड़े देशों के अमरीका को होने वाले निर्यात पर अधिक से अधिक टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। भारत के साथ भी संबंधों में ट्रम्प ने पहले-पहल ऐसी नीतियों की घोषणा की थी परन्तु उनकी इन नीतियों के आगे भारत ने किसी तरह की लचक दिखाने से इन्कार कर दिया। इसी दौरान विगत 10 माह से भारत तथा अमरीका के बीच व्यापारिक संबंधों के नवीकरण की बात भी चलती रही और ट्रम्प द्वारा भारत पर टैरिफ कम करने की घोषणा के बाद यह बातचीत अब सफल हो सकी है। नि:संदेह दोनों देशों में यह व्यापार समानता के आधार पर होने की सम्भावना है। इस संबंध में व्यापार तथा उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट रूप में यह घोषणा की है कि इस समझौते में किसान वर्ग के हितों को सुरक्षित रखा गया है और इस संबंध में किसी तरह की भी लचक नहीं दिखाई गई। चाहे कृषि से संबंधित कुछ बिन्दुओं को लेकर किन्तु-परन्तु अभी भी उठ रहे हैं, परन्तु मुख्य रूप में कृषि क्षेत्र में इस समझौते के नकारात्मक प्रभाव पड़ने की सम्भावना नहीं प्रतीत होती।
भारत ने आगामी 5 वर्षों में अमरीका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने का समझौता अवश्य किया है, परन्तु इसमें तकनीकी तथा हवाई क्षेत्रों से संबंधित अधिक वह सामान शामिल होगा, जिसकी भारत को भविष्य में ज़रूरत होगी, जबकि इस समझौते के तहत चमड़ा, कपड़ा, हैंडिक्राफ्ट, आभूषण तथा खेलों का सामान आदि क्षेत्रों में भारत को लाभ पहुंचने की बड़ी सम्भावना होगी। परन्तु रूस से तेल खरीदने पर अमरीका द्वारा धारण किए गए कड़े रुख के कारण भारत-रूस संबंध अवश्य प्रभावित हो सकते हैं। चाहे अभी तक इस समझौते का पूरा विवरण तो सामने नहीं आया, परन्तु दूसरे दर्जनों बड़े देशों की तरह इस समझौते के इसलिए सार्थक परिणाम की सम्भावना है, क्योंकि अमरीका को विश्व भर के बड़े तथा विकसित देशों के भारत के साथ हुए समझौतों के दृष्टिगत भारत के साथ अपना यह सहयोग बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जो भारत के भविष्य के लिए एक बड़ी उम्मीद पैदा करने की समर्था रखता है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

