संसद की मर्यादा कायम रखी जाए

लोकसभा में विगत 10 दिन से बजट अधिवेशन के दौरान जिस तरह का माहौल बना हुआ है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। राष्ट्रपति के भाषण के बाद केन्द्रीय वित्त मंत्री सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट और राष्ट्रपति के धन्यवाद हेतु सरकार की ओर से पेश किए प्रस्ताव पर दोनों सदनों में चर्चा होनी थी, परन्तु राष्ट्रपति के भाषण और धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के स्थान पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के मीडिया में प्रकाशित, भारत-चीन के बीच वर्ष 2020 में हुए टकराव के संबंध में बोलना शुरू कर दिया गया। स्पीकर ओम बिरला द्वारा उन्हें इस आधार पर रोक दिया गया कि जिस किताब के संदर्भ वह दे रहे हैं वह अभी तक प्रकाशित होकर बाज़ार में नहीं आई। उन्हें राष्ट्रपति के भाषण और पेश हुए धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलना चाहिए, न कि किसी पुस्तक में प्रकाशित भारत-चीन संबंधों के विस्तार की बात करनी चाहिए। इसके बाद स्पीकर ने यह भी कह दिया कि उनकी स्वीकृति के बिना वह किसी प्रकाशित किताब या मैगज़ीन का संदर्भ देकर भी नहीं बोल सकते, जबकि लोकसभा में भाजपा के सांसद निशीकांत दुबे को कुछ किताबों के नेहरू, इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी संबंधी विवादित अंशों को पढ़ने की आज्ञा दे दी गई। इस मामले को लेकर ऐसा अवरोध पड़ा, जिस कारण पिछले 10 दिनों से लोकसभा के बजट अधिवेशन की कार्रवाई बड़ी सीमा तक ठप्प हो कर रह गई।
राहुल गांधी द्वारा पुस्तक के संदर्भ संबंधी बोलने का हठ जारी रहा। कांग्रेस के सदस्यों और विपक्ष के नेताओं ने भी उन्हें बोलने न देने संबंधी कड़ी आपत्ति जताई। पैदा हुए इस टकराव के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्पीकर के कहने पर राष्ट्रपति के भाषण पर पेश हुए धन्यवाद प्रस्ताव पर भाषण देने के लिए सदन में नहीं आए। उनके भाषण के बिना ही ज़ुबानी वोटों के आधार पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर दिया गया। बाद में प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अपना भाषण दिया। ज्यादातर विपक्षी पार्टियों ने इस पूरे समय में स्पीकर ओम बिरला पर यह आरोप भी लगाया कि वह सरकारी पक्ष की सहायता कर रहे हैं और विपक्ष के नेताओं को बोलने की इजाज़त नहीं दे रहे। राहुल गांधी ने 2 फरवरी को राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर सम्बोधित करते हुए अपना भाषण पूरा नहीं किया था। 3 फरवरी को कड़े टकराव के दृष्टिगत स्पीकर ने 8 सांसदों पर पूरे बजट अधिवेशन में शामिल होने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।
अब 100 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर वाला विपक्ष द्वारा स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का नोटिस लोकसभा को दिया गया है, जिसमें स्पीकर को हटाने की मांग की गई है और इसके कारणों में लोकसभा के कामकाज़ को पक्षपात ढंग से चलाने, कई अवसरों पर विपक्षी पार्टियों के नेताओं को बोलने की इजाज़त न देना और विपक्ष के सांसदों पर गलत आरोप लगाना आदि शामिल है। तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इसके विरुद्ध हस्ताक्षर नहीं किए। समाजवादी पार्टी भी यह चाहती है कि किसी तरह यह बड़ी रुकावट खत्म होनी चाहिए ताकि सभी सांसद अपने मूलभूत अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए बजट संबंधी अपने विचार पेश कर सकें। विपक्ष को इस बात का भी अहसास है कि संख्या के हिसाब से स्पीकर के विरुद्ध लाया गया यह अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं होगा, परन्तु ऐसा करके वह अपने कड़े विरोध का संदेश ज़रूर देना चाहते हैं।
हम सरकारी और विपक्ष की ओर से एक-दूसरे के प्रति अपनाये ऐसे व्यवहार के प्रति आपत्ति जताते हैं, क्योंकि पैदा हुआ ऐसा माहौल लोकतांत्रिक परम्पराओं के विरुद्ध है, जिसके लिए दोनों ही पक्षों को आपस में विचार-विमर्श करके इस बड़ी रुकावट को खत्म करना चाहिए। ऐसी भावना से काम करते, जहां संबंधित सदस्य अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों का पालन कर रहे होंगे, वहीं संसद की गरिमा को बहाल रखने में भी सहायक होंगे। 

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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