ममता के सामने मुश्किल वक्त होगा
जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर बिहार में शानदार विजय हासिल की है, उससे यह साफ हो गया है कि बंगाल में ममता बनर्जी की आगे की राह आसान नहीं रहने वाली। अब ममता को अपने पूर्ण राजनीतिक कौशल के साथ एक-एक कदम आगे बढ़ाना होगा। बड़ा सवाल सामने यह है कि क्या ममता मात्र एस.आई.आर. को आधार बनाकर आगामी चुनाव में (2026) चौथी बार भी मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो पाएंगी?
कुछ ही दिन गुज़रे हैं जब दिल्ली में चुनाव आयोग के साथ हुई एक खुली बहस में टी.एम.सी. के प्रतिनिधिमंडल द्वारा पूछे गये एक तीखे प्रश्न से आभास मिल गया था कि पार्टी अपने चुनाव अभियान को कौन-सा मोड़ देने वाली है। प्रश्न यह था ‘एस.आई.आर.’ का मकसद मतदाता सूची का शुद्धिकरण करना है या बंगालियों को उससे बाहर करना है? ज़ाहिर सी बात है कि इस सवाल से टी.एम.सी. के आक्रामक रुख का पता चलता है। हाल ही में एस.आई.आर. के अकारण तनाव में दो-चार नहीं चालीस लोगों की मृत्यु का दबाव और तनाव भी शामिल है। क्योंकि आयोग झुकने को तैयार नहीं और भारतीय जनता पार्टी की सुरक्षात्मक टिप्पणियों से ममता का गुस्सा भड़का हुआ है।
भारतीय जनता पार्टी हिन्दुत्व को आधार बनाकर पहले से कहीं अधिक गतिशील हो रही है। संघ की राहुल गांधी ने इस कदम पर निंदा और आलोचना की है, जिसका लाभ व्यवहारिक स्तर पर कांग्रेस पार्टी को मिलता नज़र नहीं आया।
पश्चिम बंगाल अन्य राज्यों की अपेक्षा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय अस्मिता का जज़्बा गहराई से मतदाताओं के भीतर मौजूद है। नि:संदेह राज्य पिछले समय से आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है। अक्सर ऐसी मंदहाली जो रोजी-रोटी के मुद्दों से टकरा रही हो, विकास की धारणा को प्रभावित करती है। 2016 और 2021 में ममता ने भावनाओं के आधार पर चुनाव अभियान चला कर नरेन्द्र मोदी का सामना किया था। वह भाजपा को बाहर की पार्टी (आउटसाइडर) बताती रही। एक ऐसी पार्टी, जिसका बंगाल के इतिहास में कोई सरोकार नहीं, न ही संस्कृति के प्रति कोई सहानुभूति है। इतना ही नहीं, इसकी गहरी समझ भी नहीं। क्या भावनात्मक चुनावी नारों का इस्तेमाल लगातार करने पर उतना ही असरदार रहता है या रहेगा? क्या कई बार ऐसा व्यवहार अपनी ताकत खो नहीं देता? ममता फिर यही हथियार आजमा रही हैं। जोकि जोखिम भरा हो सकता है। क्या एस.आई.आर. का मुद्दा ममता को वही कार्यवाही करने में सफलता प्रदान कर सकता है।
ममता बनर्जी पहले ही भारतीय जनता पार्टी द्वारा एक करोड़ मतदाताओं के नाम हटाये जाने संबंधी दावे पर चिन्ता व्यक्त कर चुकी है। वह इस बात चिंतित हैं कि एस.आई.आर. का उनके राज्य की मतदाता सूची पर असर होने वाला है। उन्हें डर है कि इनमें ज्यादातर अल्पसंख्यक और गरीब वोटर होंगे, जोकि उनकी पार्टी का वोटर है। सरकारी मशीनरी अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकती है और करती ही रहेगी। लेकिन भाजपा ममता का हथियार बनती नज़र आएगी क्योंकि उनके तीखे बयान ममता को यह कहने का अवसर दे रहे हैं कि बाहरी लोगों से बांग्ला संस्कृति को खतरा है। अगर यह बात बंगाल के लोगों के मन को अपील कर जाती है तो भाजपा को नुकसान पहुंच सकता है। कितना? यह नहीं कहा जा सकता।



