ज़मानत याचिकाओं के सही समय पर निपटारे की ज़रूरत
देश की अदालतों में वादों की निरन्तर बढ़ती संख्या को देख कर यह विचार उपजना बहुत स्वाभाविक प्रतीत होता है, कि लोकतंत्र के इस एक बड़े शक्तिशाली स्तम्भ न्यायपालिका से एक आम आदमी को सुविधाजनक न्याय मिल पाना सचमुच बेहद कठिन हो गया है। यह भी, कि यदि यह न्याय वादी के प्राणांत के बाद मिल भी जाता है, तो वो किस काम का। प्राय: न्यायवादियों में यह कहा जाता है कि देर से मिला न्याय अपनी मूल भावना को खो देता है। ऐसा ही एक अन्याय देश भर की अनेकानेक छोटी-बड़ी अदालतों में उन आरोपियों अथवा दोषियों के साथ हो रहा है जो ज़मानत के हकदार हैं, किन्तु उनके ज़मानत आवेदन कई-कई वर्षों से लम्बित पड़े हैं। इस मामले की गम्भीरता का पता स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उच्च अदालतों को लिखे गये एक पत्र से चल जाता है, जिसमें उसने पूछा है कि अदालतें अपने अधीनस्थ लम्बित पड़े ज़मानत मामलों की त्वरित जानकारी दें। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर चिन्ता ज़ाहिर करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में, और इतनी देर तक अदालतों में ज़मानत-याचिकाओं का लम्बित रहना निराशाजनक और न्याय को लटकाने जैसा है।
यह एक अहम मामला तब प्रकाश में आया जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के साथ, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली पर आधारित तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष एक ऐसी याचिका पेश हुई जिसमें पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय में एक ज़मानत याचिका के बार-बार स्थगन का मुद्दा उठाया गया था। पीठ ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि एक जनवरी, 2025 के बाद, और इससे पूर्व दायर नियमित और अग्रिम ज़मानत-याचिकाओं और उनसे सम्बद्ध सुनवाई संबंधी अन्य सभी विवरण सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किए जाएं। पीठ ने इस संबंध में देश भर की उच्च अदालतों के रजिस्ट्रार जनरलों को निर्देश भी जारी किया है। पीठ की इस संबंधी चिन्ताओं को न्यायाधीशों की इस एक टिप्पणी से भी समझा जा सकता है कि सम्भव है, केस अधिक हो गये हों, किन्तु आरोपियों के लिए ज़मानत संबंधी याचिकाओं के शीघ्र निपटारे से अहम और कुछ नहीं हो सकता। पीठ ने देश के एक बड़े राज्य की उच्च अदालत में ज़मानत मामलों की सही ढंग से सुनवाई न होने पर, वहां के मामले सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आने को लेकर भी चिन्ता जताई। सर्वोच्च अदालत ने इस बात पर भी चिन्ता जताई, कि ज़मानत मामलों की अधिकता के कारण, लोगों को यह तक पता नहीं होता कि उनके मामले की वास्तविक स्थिति क्या है। लोग जेलों में पड़े रहते हैं, किन्तु वकीलों से लेकर न्यायालयों तक कोई उनकी सुधि लेने वाला नहीं होता। सर्वोच्च अदालत की इस पीठ ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में उनका यह कर्त्तव्य बन जाता है कि वे स्वयं इस स्थिति को संवारने हेतु कोई पग उठाएं।
हम समझते हैं कि नि:संदेह यह स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। बिना ज़मानत लोगों का वर्षों तक जेलों में रहना, और अदालतों में उनके मामले निरन्तर लम्बित चलते रहना उनको बिना कारण दण्डित किये जाने जैसा हो सकता है। सम्भवत: इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने देश की उच्च अदालतों के मुख्य न्यायाधीशों से कहा है कि वे अपनी सूचियों पर पुनर्विचार करें, और तत्काल ज़मानत योग्य मामलों को अगली कतार पर लायें। हम समझते हैं कि मामलों की अधिकता और न्याय-विदों की कमी भी इस समस्या का बड़ा कारण हो सकती है, किन्तु सूचियों में संशोधन कर तर्क-संगत और न्यायोचित मामलों को अलग करके कोई सर्व-स्वीकार्य समाधान निकाला जा सकता है। हम यह भी समझते हैं कि न्याय होने के साथ, न्याय होते महसूस होना भी घाव पर ठंडी मरहम के फाहे जैसा होता है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की इस टिप्पणी को अनुकरणीय उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है, कि दया भावना के बिना कानून अत्याचारी जैसा होता है, और कानून के बिना दया अराजकता बन जाती है। अत: एक अच्छे न्याय हेतु कानून और रहम, दोनों को साथ-साथ चलते दिखना चाहिए। हम समझते हैं कि इस अच्छी स्थिति हेतु न्यायिक प्रणाली, सरकार और समाज, सभी को अपनी सम्बद्ध भूमिका निष्ठा-पूर्वक अदा करनी चाहिए, और प्रतिबद्ध न्याय हेतु कानून, करुणा और प्रक्रिया के तहत दायित्व निभाने का यत्न करना चाहिए।

