देश के लिए घातक सिद्ध होगी धार्मिक कट्टरता
सचमुच अंग्रेज़ों के दिमाग का कोई तोड़ नहीं। उन्होंने भारत पर अपना कब्ज़ा तो छोड़ दिया, लेकिन अपनी शैतानी चाल से भारत और पाकिस्तान का विभाजन करवा दिया और दोनों देशों में इतनी कट्टरता भर गए कि हम आज भी उसका नतीजा भुगत रहे हैं। कोई माने या न माने, लेकिन आज भी पूरा देश धार्मिक कट्टरता की आग में झुलस रहा है। धर्म का जुनून देश के विकास की राह पर हावी हो रहा है। धर्म के लिए जान कुर्बान करने वालों की संख्या देश के लिए जान कुर्बान करने वालों से कहीं ज़्यादा हो गई है। देश की सांप्रदायिक राजनीति के कारण नेताओं की ख्वाहिशें अपने आप पूरी हो रही हैं। धर्म के नाम पर दिया गया ज़रा-सा तूल इतना भयानक रूप ले लेता है कि नेताओं के राजनीतिक मकसद आसानी से पूरे हो रहे हैं। नेताओं को अपनी कुर्सी बचाने के लिए अशिक्षा, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी या आर्थिक मुद्दों पर अपना ध्यान देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, बस एक धर्म के खतरे में होने का नारा लगाने से देश के लोग तुरंत दो-तीन हिस्सों में बंट जाते हैं। सोशल मीडिया पर तुरंत एक मुहिम का आरम्भ हो जाता है।
राजनीतिक पार्टियों के बनाए गए आईटी सैल कुछ ही दिनों में देश का माहौल बदल देते हैं। बड़े अफसोस की बात है कि देश की संसद में बेरोज़गारी और आर्थिक मंदी पर चर्चा करने के बजाय धार्मिक मुद्दों पर चर्चा होती रहती है। एक-दो दंगों के बाद कोई एक खास पार्टी अपने मकसद में कामयाब हो जाती है और टीवी मीडिया के ज़रिए देश बचाने का राग अलापती नज़र आती है। देश के लोगों को यही एहसास दिलाया जाता है कि देश को सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की बजाय धार्मिक स्थानों की अधिक ज़रूरत है। आज़ादी के बाद अगर नेता चाहते तो भारत विकसित देशों की कतार में खड़ा हो सकता था और देश की आबादी भी नियंत्रण में रह सकती थी। देश में कट्टर धार्मिक टास्क फोर्सों की परेडें करवा कर धार्मिक जुनून वाले लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जाता है और फिर उन्हें भर्ती करके पूरी उम्र भर जुनूनी लहरों से बाहर नहीं निकलने दिया जाता। धर्म के नाम पर बनी ये धार्मिक फोर्सें कभी किसी सीमा पर लड़ते नहीं देखी गईं।
देश में दूसरे धर्म के लोगों को अपशब्द कहने वालों को टिकटें देकर निवाजा जाना आम घटनाक्रम नहीं है, यह एक सोची-समझी साज़िश है। किसी एक समुदाय या राज्य के लोगों को निशाना बनाने वाले कई लोगों को संसद के लिए उम्मीदवार के रूप में टिकटें देना या हार जाने के बावजूद मंत्रि पद देना भी सामान्य घटनाक्रम नहीं, यह दूसरे समुदाय के लोगों को गुलामी का एहसास करवाना होता है। किसी साहसी समुदाय या कौम का हौसला पस्त करने के लिए शासन करने वाले वे ऐसे हथकंडे हमेशा अपनाते रहेंगे। लोकतंत्र को कमज़ोर करना, राजाओं की तरह देश में अपनी मनमानी करना, देश की अरबों-खरबों की संपत्ति अपने ही लोगों को कौडियों के भाव देकर चुनाव के समय उनके पैसे का अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करना देश के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। अब देश की ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियों का उद्देश्य सिर्फ सत्ता हासिल करना ही रह गया है। साम-दाम-दंड-भेद वाली बातों का भी खुलेआम प्रचार किया जाता है। लोगों का स्वभाव सब कुछ बर्दाश्त करने का बना दिया गया है। भारत के लोग स्वाभिमानी थे, लेकिन अब सब कुछ देख कर भी खामोश रहते हैं।
राजनीतिक चरित्र का स्तर इतना गिर गया है कि दुष्कर्म और हत्या के आरोपियों का राजनीतिक नेता ऐसे स्वागत करते मीडिया में देखे जा सकते हैं, जैसे वे देश के लिए कोई जंग जीत कर आए हों। देश में किसी भी बुराई या अन्याय के खिलाफ होने वाले शांतिपूर्ण आंदोलनों को कुचलने के लिए सरकारें ऐसे हथकंडे अपनाती हैं जो लोकतांत्रिक नैतिक-मूल्यों का उल्लंघन करते हैं।
-मो. 98551-65696



