प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा की उपलब्धि
विश्व भर के ज्यादातर देश इस समय भारी तनाव से गुज़र रहे हैं। अलग-अलग स्थानों पर आपसी युद्ध भयावह रूप धारण करते नज़र आ रहे हैं। पिछले 4 वर्ष से रूस और यूक्रेन में रक्तिम युद्ध चल रहा है। इसी तरह इज़रायल और गाज़ा पट्टी पर काबिज़ आतंकवादी संगठन हमास के बीच भी बड़ा रक्तिम संघर्ष छिड़ा रहा है, जिसकी चपेट में गाज़ा पट्टी में रहने वाले लाखों ही फिलिस्तीनी आए हुए हैं। इज़रायली सेना द्वारा उन्हें बुरी तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वर्ष भर पहले से इस संघर्ष में पूरा हस्तक्षेप करने का यत्न किया है परन्तु अमरीका के हमेशा इज़रायल की तरफ झुके रहने के कारण ट्रम्प द्वारा इस क्षेत्र में दिए शांति योजना सुझाव पर विश्वास किया जाना कठिन प्रतीत होता है।
नि:संदेह हमास गुरिल्लों ने इज़रायल पर हमला करके वहां सैकड़ों ही नागरिकों की हत्या कर दी थी और ज्यादातर को बंधक बनाकर वे उन्हें गाज़ा पट्टी में ले गए थे, जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप इज़रायल द्वारा किए गए हमलों में हज़ारों ही फिलिस्तीनी जान गंवा बैठे। 7 अक्तूबर, 2023 से छिड़े टकराव में अब तक 80 हज़ार फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इज़रायल में1195 नागरिक और सैनिक मारे गए हैं। हमास के 1600 गुरिल्ले भी मरने वालों में शामिल हैं। इज़रायल 1948 में अस्तित्व में आया था। उस समय से लेकर अरब देशों ने इसके अस्तित्व का विरोध किया है। ज्यादातर इस्लामिक गुरिल्ला संगठन भी इसके विरुद्ध जेहाद के लिए बनें, जो लगातार इज़रायल के विरुद्ध लड़ाई लड़ते रहे। अरब देशों और इज़रायल के बीच कई युद्ध हुए, जिनके बाद में समझौते होते रहे। आज ज्यादातर देश इज़रायल के अस्तित्व को मानने से इंकार नहीं कर रहे हैं, अपितु उन्होंने उसे मान्यता भी दे दी है, परन्तु ईरान ने हमेशा इज़रायल को यहूदियों का अस्तित्व मिटाने की धमकियां ही नहीं दीं, अपितु इसके विरुद्ध लड़ते अनेक ही छोटे-बड़े संगठनों को हथियार से लेकर प्रत्येक तरह से पूरा समर्थन भी जारी रखा है।
दूसरी तरफ मध्य पूर्व में स्थायी शांति के लिए आज विश्व के ज्यादातर देश फिलिस्तीन को एक अलग स्वतंत्र देश बनाने के समर्थक रहे हैं। ज्यादातर की यही सोच है कि ऐसा करने से ही इस लगातार बन रहे टकराव से निकलकर इस क्षेत्र में स्थायी शांति की ओर बढ़ा जा सकता है। ऐसा संघर्ष आज भी जारी है और आगामी समय में भी इसके जारी रहने से इंकार नहीं किया जा सकता। भारत ने आज़ादी के बाद निष्पक्ष रहने की नीति अपनाई और इस भावना के साथ अपने साथ कई देश भी जोड़े। उस समय विश्व दो भागों में बंटा दिखाई देता था। एक का नेतृत्व सोवियत यूनियन और दूसरे का नेतृत्व अमरीका कर रहा था, परन्तु 1991 में सोवियत यूनियन के टूटने से अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति बड़ी सीमा तक बदलती दिखाई दी। इसके साथ ही विश्व भर में इस्लामी कट्टरपंथी लहरें पैदा हुईं, जिन्होंने अपनी हिंसक गतिविधियों से विश्व भर के देशों को प्रभावित करके रखा।
इज़रायल और भारत इस हिंसक आतंकवाद का शिकार बने रहे हैं। पहले पहले भारत की विदेश नीति इज़रायल से स्वयं को दूर रखने की रही है, परन्तु धीरे-धीरे इसमें बदलाव आता गया। कश्मीर विवाद के मामले पर पाकिस्तान के अलग-अलग स्थानों से भारत विरुद्ध अपनी गतिविधियां चला रहे आतंकवादी संगठनों ने अब तक भारत के नाक में दम करके रखा है। पैदा हुए ऐसे हालात के कारण ही दोनों देश भारत और इज़रायल निकट आए हैं। पहली बार नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री होते हुए 1992 में इज़रायल को मान्यता दी गई थी परन्तु भारत पहले से ही फिलिस्तीन की स्वतंत्रता का भी समर्थक रहा है। अरब देशों में आए बदलावों और पाकिस्तान से भारत में लगातार ़गैर-कानूनी घुसपैठ के चलते भी ये दोनों देश और अधिक नज़दीक आते रहे। नरसिम्हा राव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री होते दोनों देशों के संबंधों में और भी निकटता आई। उस समय इज़रायल के तत्कालीन राष्ट्रपति एरिया शेरोन ने भारत की यात्रा की थी। यह यात्रा करने वाले वह इज़रायल के पहले राष्ट्रपति थे।
वर्ष 2015 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी इज़रायल का दौरा किया था और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भी जुलाई 2017 में इज़रायल की यात्रा की थी। मोदी ऐसी यात्रा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। इस यात्रा में भी इज़रायल के साथ कई समझौते किए गए थे। उसके बाद वर्ष 2018 में इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत की यात्रा की और उस समय पर्यटकों के साथ-साथ औद्योगिक और कृषि के क्षेत्र में बड़े समझौते किए गए। इनके साथ-साथ साइबर सुरक्षा, तेल, गैस उत्पादन आदि के क्षेत्रों में दोनों ने सांझेदारी को बढ़ाने की योजनाएं बनाईं।
विगत दिवस प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुन: इज़रायल की यात्रा की है, जिसकी बड़ी चर्चा हुई। इस दौरान ऊर्जा, शिक्षा, कृषि और अन्य क्षेत्रों में व्यापारिक समझौते किए गए हैं और दोनों देशों ने आगामी समय में मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की भी प्रतिबद्धता प्रकट की है। हम भारत के प्रधानमंत्री की इस यात्रा को मध्य-पूर्व के क्षेत्र के लिए इस कारण भी सम्भावनाओं से भरपूर समझते हैं क्योंकि भारत का ज्यादातर अरब देशों के साथ अच्छा संबंध बना हुआ है। ऐसे वातावरण में इज़रायल और फिलिस्तीन की समस्या को सुलझाने के लिए भी कोई ठोस सम्भावित कदम उठाये जाने की अच्छी उम्मीद बन सकती है। भारत को इज़रायल के साथ संबंध बनाने के साथ-साथ फिलिस्तीन की समस्या को हल करने के लिए भी इस समय अपना अधिक से अधिक प्रभाव दिखाने की ज़रूरत होगी। ऐसी पहल मध्य-पूर्व में स्थायी शांति की परिचायक बन सकती है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

