मुझे भी शिकायत है...
जो हम चाहते हैं वह न हो तो शिकायत करना स्वाभाविक है। असल में आदमी शिकायत का पुतला है। उसे हमेशा किसी न किसी बात की शिकायत होती ही रहती है। एक शिकायत दूर होती नहीं कि दर्जनों और शिकायतें पैदा हो जाती है। हमें सभी को हर मौसम से शिकायत होती है। गर्मी हो तो शिकायत, सर्दी हो तब हाय तौबा, बरसात हो तब मुसीबत, आंधी चले तब शिकायत, बादल हों या तेज धूप हो हम हमेशा शिकायत करते हैं। इतना ही नहीं, आम आदमी को आजकल खांसी जुकाम या एलर्जी से परेशानी होती रहती है जिसका कसूरवार हम बदलते मौसम को ही ठहराते हैं। कोई भी बात हो आमतौर पर लोग यही कहते हुए मिलेंगे, ‘मौसम बदल रहा है न’। हमें तो बसंत मौसम से भी कोई न कोई शिकायत रहती है।
कई लोगों को रेलगाड़ियों के समय पर न चलने की शिकायत होती है। गाड़ी अगर देर सवेर आ भी जाए उसमें ठीक सीट न मिलने की शिकायत या फिर रेल के डिब्बे में सर्दी के मौसम में खिड़की खोल रखी है तो शिकायत और किसी अगर किसी के द्वारा धूम्रपान करने से धुआं आ रहा है तो शिकायत। शिकायत तो हमें इस बात की भी रहती है कि रेल के डिब्बों में बहुत गंदगी होती है। रेल के डिब्बों में चाय, बिस्कुट वगैरह बेचने वाले न सिर्फ सवारियों को लूटते हैं बल्कि सामान भी बेकार का सप्लाई करते हैं। उस सारे के बावजूद रेल में यात्रा किये बगैर काम भी नहीं चलता। कौन परवाह करता है शिकायतों की।
हमारे में से शायद ही कोई होगा जिसे सरकार के किसी न किसी विभाग से कोई शिकायत न हो। सूचना के अधिकार के कानून के बावजूद भी अधिकांश सरकारी विभागों में समय पर काम न होने पर लोगों को शिकायत करते सुना जाता है। बहुत बार हमारा काम करने वाला बाबू या तो सीट पर नहीं होता, चाय पीने गया होता है, साहब के साथ मीटिंग कर रहा होता है, टूर पर होता है, छुट्टी पर गया होता हे या फिर ट्रांसफर हो गया होता है। अगर होता भी है तो बिना रिश्वत के हमारी फाइल आगे नहीं सरकाता। बिना पैसे लिये तो चपरासी साहब से मिलने तथा शिकायत ही करने का मौका नहीं देता। इस बात की हम सभी को शिकायत रहती है। एक अनाड़ी आदमी तो शिकायत करता-करता तंग आकर अपना सिर पकड़ कर बैठ जाता है।
आजकल हम सभी को बढ़ती कीमतों के कारण बहुत परेशानी है। इसकी शिकायत एक आम बात है। कीमतों के बढ़ने का यह दुष्प्रभाव है कि आम आदमी जीवन की आधारभूत जैसे रोटी, कपड़ा और मकान भी जुटाने में अपने आपको असमर्थ महसूस करता है। ऐसा लगता है कि सरकार भी बढ़ती कीमतों की लोगों की शिकायत का निपटारा करने में अपने आपको असहाय महसूस करने लगी है। बढ़ती कीमतों को लेकर एक अर्थशास्त्री ने तो यहां तक कह दिया है पहले हम जब बाजार जाते थे तो जेब में रुपये लेकर जाते थे और टोकरियों में समान लाते थे। आजकल कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि अब जब हम बाजार जाते हैं तो टोकरियों में रुपये लेकर जाते हैं तथा जेबों में सामान लेकर आते हैं। सोने की आसमान छूती कीमतों को देखकर इसे दहेज में देने का जमाना तो अब लद गया है। हां, प्याज, टमाटर, दालें आदि महंगी चीजों को अब मां बाप जरुर अपनी बेटियों को दहेज में देना शुरु कर देंगे। ऐसे में महंगाई के बारे में लोगों की शिकायत जायज है।
हमें अपने सांसदाें/विधायकों से भी शिकायत है। वे सदन में आमतौर पर शोर शराबा, हंगामा, माईक तथा फाइलें फेंकने का काम करते हैं, स्पीकर की अवज्ञा करते हैं, रिश्वत लेकर सवाल पूछते हैं, भ्रष्टाचार में संलिप्त होते हैं, कईयों के खिलाफ हत्या, हिंसा, बलात्कार, फिरौती, अपहरण, जातिवाद फैलाना, सरकारी जमीनों पर कब्जा करने के मुकदमें चलते रहते हैं। वे जनहित का काम भी नहीं करते। मुझे शिकायत है कि लोग ऐसे सांसदों/विधायकों का उनके चुनाव क्षेत्र में जाने पर स्वागत द्वार बनाकर या गले में मालाएं डालकर क्यों स्वागत करते हैं? मुझे शिकायत आज की युवा पीढ़ी से भी है। वे जवानी के जोश में अक्सर होश भी खो बैठते हैं। वे अपने माता-पिता के त्याग तथा सेवा को आमतौर पर भूल जाते हैं तथा उनकी देखभाल नहीं करते और न ही उन्हें गुजारा खर्च देते हैं। उनमें हिंसा, जिद, तनाव, मादक पदार्थों का सेवन करना, काम वासना में ज़रुरत से ज्यादा लिप्त होना, बड़ों के प्रति अनादर, ज्यादा खर्च करना, अपने काम के प्रति ईमानदार न होना, देशभक्ति का अहसास न होना। हर काम में जल्दी करना आदि बातें आम देखने को मिलती हैं। किसी देश के युवक ही उसका भविष्य होते हैं। युवा पीढ़ी का ऐसा हाल देखकर उनके बारे में शिकायत उचित ही है।
यूं तो हर विभाग के प्रवेश द्वार पर शिकायत/सुझाव बॉक्स रखा होता है और हर ज़िले में शिकायत निवारण समितियां भी होती हैं। लेकिन मुझे तो इनके काम करने के तरीके के बारे में शिकायत। (सुमन सागर)



