चालीस साल की चुप्पी
शहर के नक्शे में इस गली कान तो कोई नाम था, न ही यह किसी पर्यटन पुस्तिका में दर्ज थी। यहां तक कि शहर के लिए हाल ही में बनें ‘स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट’ की किसी स्लाइड में भी यह गली कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखी थी। जाहिर है ऐसे में नगर निगम की किसी फाइल में इसका कोई नंबर न होना स्वाभाविक ही था। शहर की यहगली तो बस समझो एक ऐसी जगह थी, जहां शहर अपनी थकान उतारने आता था- कूड़े के ढेर, गंदी नालियां, टूटे फुटपाथ, और अधूरी ज़िंदगानियां। फिर भी यह गली सुबह बहुत जल्दी जग जाती थी, सूरज उगने से भी पहले बल्कि कहना चाहिए चाय की केतली से भाप उड़ना शुरू होने और कूड़ा उठाने वाली गाड़ी के आने से भी काफी पहले और इसका कारण यह था कि यहां रह रहा एक आदमी तब तक जाग चुका होता था। वह गली के आखिरी मोड़ पर बैठता था- पीठ दीवार से टिकाए, घुटनों को छाती से लगाए। लगभग हर समय ही उसके होंठ हिलते रहते, आवाज़ बहुत धीमी, लेकिन लगातार होती रहती, जैसे कोई नदी चट्टानों के नीचे बह रही हो, कल-कल, अविरल।
लोग कहते, ‘लो फिर शुरू हो गया पागल...’
उस आदमी का नाम किसी को नहीं पता था या शायद इसकी किसी को ज़रुरत भी नहीं थी; क्योंकि वह दिन-रात एक ऐसी अबूझ भाषा में बड़बड़ाता रहता था, जिससे हर कोई बड़ी सहजता से उसे पागल कह देता था और इससे सबका काम चल जाता था। मतलब यह कि उसके असली नाम को जानने कि किसी को कभी कोई ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई थी। एक बात यह भी थी कि शायद असल में उसका कोई नाम ही न हो या सालों से उसकी ज़रुरत न पड़ने के कारण वह खुद भी यह भूल चुका हो। लब्बोलुआब यह कि उसका कोई नाम होना या न होना कोई ईस्यू नहीं था। इसी तरह उसकी असली उम्र का अंदाज़ा भी कोई मुद्दा नहीं था। उसके बालों में सफेदी नहीं बल्कि समय की राख जमी हुई थी। आंखें गहरी थीं- इतनी गहरी कि लगता था उनमें कोई पुराना जंगल डूबा हुआ है। इस कारण वह कभी लगता साठ पार है, कभी लगता पचपन में अटका हुआ है। वैसे उसकी आंखें तो कभी भी किसी बूढ़े आदमी की सी नहीं लगती थीं। वे आंखें किसी ऐसे व्यक्ति की लगतीं, जो बहुत पहले रोना भूल चुका हो, लेकिन जिसके भीतर अब भी नमी बची हो। उसके कपड़े साफ तो नहीं होते थे, लेकिन फटे भी न होते, जैसे वह अब भी खुद को पूरी तरह छोड़े नहीं था। उसकी बुदबुदाहट भी कई-कई अर्थों वाली होती। जब वह सुबह-सुबह बुदबुदाता, तो उसमें एक ताल होती, दोपहर को लगता शायद किसी से कोई शिकायत कर रहा हो और शाम को लगता मानो किसी से माफी मांग रहा हो। रात को तो वह सिर्फ फुसफुसाता था, जैसे किसी सोते बच्चे से बात कर रहा हो लेकिन ये सारे अनुमान स्वर के आरोह-अवरोह के ही होते। असल में कोई नहीं जानता था कि उसकी बुदबुदाहट के शब्द क्या थे? उसकी भाषा क्या थी? क्योंकि वह जिस भाषा में बड़बड़ाता या बोलता था, शहर के कानों के लिए वह भाषा एक शोर से ज्यादा कुछ नहीं थी। उसे दिन-रात तमाशे की तरह देखने वालों में कोई भी दूर-दूर तक उस भाषा को नहीं जानता था।
यह हिंदी नहीं थी।
यह उर्दू नहीं थी।
यह किसी अखबार, स्कूल या अदालत की भी भाषा नहीं थी। यह उस भाषा की तरह थी, जो निर्जन पहाड़ों और घने जंगलों के भीतर जन्म लेती है, जिसमें शब्द कम होते हैं, लेकिन भाव सीधे दिल से निकलते हैं, जिसमें शब्दों से ज्यादा ठहराव होता है और उन्हें बोलने से पहले सांस ली जाती है। क्योंकि हर शब्द का किसी पेड़, किसी चट्टान या किसी घटना से रिश्ता जुड़ा होता है। इस भाषा में ‘अकेलापन’ के लिए कोई अलग से शब्द नहीं था, शायद इसलिए कि वहां कोई अकेला होता ही नहीं था, साथ ही इस भाषा में ‘घर’ और ‘मां’ के लिए अलग-अलग शब्द नहीं थे, दोनों के लिए एक ही हैं।
बहुत साल पहले जब उसके बाल पूरी तरह से काले और पीठ बिल्कुल सीधी थी- वह असम के जोरहट ज़िले के बोर्खम्यांग इलाके के एक गांव पोखोई में रहता था, जो अब शायद नक्शे में भी नहीं होगा। क्योंकि तब से अब तक इस जनजातीय इलाके का कई बार पुनर्गठन हो चुका है-तब वहां सड़कें नहीं थीं, लेकिन रास्ते थे। बिजली नहीं थी, लेकिन उजाला था। यह एक जनजातीय इलाका था, घने जंगलों के बीच बसा हुआ। जहां सुबह पक्षियों की आवाज़ से होती थी और रात झींगुरों की संगत में कटती थी। गांव में जब उसकी मां उसे बुलाती थी, तो उसका नाम नहीं लेती थी। एक ध्वनि निकालती थी- आधी सीटी, आधा स्वर, जिसे सुनते ही वह समझ जाता था कि मां उसे याद कर रही है। लेकिन इस शहर में उसकी इस भाषा का कोई अनुवाद नहीं था।
उसने अभी जवानी में कदम रखा ही था कि रोज़ी-रोटी की तलाश में शहर निकलना पड़ा। क्योंकि गांव में सूखा पड़ा था, जंगल कट चुके थे और शहर के एक दलाल ने कहा था, ‘वहां काम ही काम है, बस दो साल में वापस लौट आना।’ यह सच है शहर ने उसे काम दिया, लेकिन समय नहीं। काम के बाद थकान दी, लेकिन अपनापन नहीं। एजेंट ने कहा था, बस दो साल काम करना फिर वापस आ जाना, लेकिन चालीस साल बाद भी उसका गांव जाने का संयोग नहीं बना। उसकी मां जब उसे गांव से शहर विदा कर रही थी, तो उसने कोई लंबा उपदेश नहीं दिया था। उसका हाथ पकड़कर अपनी भाषा में एक वाक्य कहा था, ‘चाहे जहां भी रहना, अपनी मां बोली मत भूलना’ (क्रमश:)



