भारतीय शतरंज में उभरता सितारा हैं मयंक चक्रवर्ती
यह बात उस समय की है, जब मयंक चक्रवर्ती मात्र 6 साल के थे। उनकी मां डॉ. मोनोमिता स्त्री रोग विशेषज्ञ थीं और गुवाहाटी के तोलाराम बाफना अस्पताल में नौकरी करती थीं। मयंक की देखभाल करने के लिए घर पर कोई नहीं था, इसलिए मजबूरन डॉ. मोनोमिता अपने बेटे को साथ अस्पताल ले जाया करती थीं। इस पृष्ठभूमि में मयंक के लिए शतरंज का चयन किया गया। डा. मोनोमिता जब रोगियों को अटेंड कर रही होतीं, तो उनकी एक ईएनटी स्पेशलिस्ट सहकर्मी मयंक की देखभाल करतीं। इस साथी डॉक्टर ने मयंक को अच्छी तरह से समझने के बाद एक दिन डा. मोनोमिता को सुझाव दिया, ‘आपके बेटे का दिमाग बहुत तेज़ है और जिस्म बेचैन है। आप इसे शतरंज खेलने के लिए प्रेरित करें।’
डॉ. मोनोमिता अपनी सहकर्मी से पूर्णत: सहमत नहीं थीं, फिर भी उन्होंने मयंक को एक एनजीओ में प्रवेश दिला दिया, जो एक शतरंज क्लब भी चलाता है। छह वर्ष की आयु में मयंक ने जो पहली प्रतियोगिता खेली, उसमें उसका कोई खास प्रदर्शन नहीं रहा। इसके कुछ दिन बाद मयंक शतरंज से ऊब गया और उसने अपनी मां से कहा कि वह शतरंज की बजाय बैडमिंटन खेलना चाहता है। यह उस समय की बात है जब पीवी सिंधु ने भारतीय बैडमिंटन को एक नया मोड़ दिया था, 2016 रिओ ओलंपिक में व्यक्तिगत रजत पदक जीतकर। डॉ. मोनोमिता अपने बेटे को रोज़ सुबह पास की अकादमी में बैडमिंटन की ट्रेनिंग के लिए ले जाने लगीं और कभी-कभी इस ज़िम्मेदारी को उनके पति केशब भी उठाया करते थे। अकादमी से मयंक थका हारा लौटता; क्योंकि उसे रनिंग करनी पड़ती थी। जबकि उनका नया रैकेट जिस तरह कवर में जाता वैसे ही लौट आता था। डॉ. मोनोमिता बताती हैं, ‘मयंक का वज़न अधिक था, इसलिए कोच को महसूस हुआ कि पहले उसे फिजिकली फिट करना आवश्यक है।’
मयंक को दौड़ना और शटल को दीवार पर हिट करना सज़ा सा लगता था, वह तो कोर्ट पर खेलना चाहता था और यही करने का अवसर उसे नहीं मिल रहा था। मयंक ने तय किया कि बैडमिंटन उसके लिए नहीं है। इसलिए शतरंज उसके जीवन में एक बार फिर लौट आयी। लेकिन इस बार बात कुछ अलग थी। इस साल मार्च के पहले सप्ताह में 16-वर्षीय मयंक, जो कक्षा 11 का छात्र है, ने स्टॉकहोम में भारत का 94वां ग्रैंडमास्टर बनने का श्रेय हासिल किया है। उत्तर-पूर्व भारत से वह पहला ग्रैंडमास्टर है। उसने अपना अंतिम ग्रैंडमास्टर नॉर्म होटल स्टॉकहोम में आयोजित फर्स्ट होटल्स यंग टैलेंट्स प्रतियोगिता में हासिल किया। उसने इस प्रतियोगिता को 2670 रेटिंग परफॉरमेंस से जीता और लाइव रेटिंग में 2508 एलो को स्पर्श किया। वह उत्तर-पूर्व से केवल दूसरा इंटरनेशनल मास्टर था, साहिल डे के बाद और वह भी मयंक की तरह असम से ही था। साहिल डे 2021 में इंटरनेशनल मास्टर बना था। डॉ. मोनोमिता के अनुसार, ‘मयंक का यह सपना था कि वह उत्तर-पूर्व से पहला ग्रैंडमास्टर बनें। चूंकि लक्ष्य बड़ा था, इसलिए प्रेरणा भी शायद उससे बड़ी थी। यहां तक पहुंचने के लिए परिवार के सामने भी चुनौती थी। बहरहाल, अब वह ग्रैंडमास्टर है और यह तो अभी शुरुआत ही है।’
गौरतलब है कि मयंक ने अंडर-17 राष्ट्रीय खिताब दो बार जीता और पहली बार तो मात्र 12 वर्ष की आयु में जीता था। वह 2023 में इंटरनेशनल मास्टर बना था। उत्तर-पूर्व में शतरंज का इकोसिस्टम नहीं है। डॉ. मोनोमिता को अपने खर्च पर खिलाड़ी गुवाहाटी बुलाने पड़ते थे ताकि वह मयंक के विरुद्ध खेल सकें। पहली बार खिलाड़ियों को 2018 में आमंत्रित किया गया था, जिनमें पश्चिम बंगाल से ग्रैंडमास्टर सप्तऋषि रॉय चौधरी व ओडिशा से ग्रैंडमास्टर स्वयं मिश्रा भी शामिल रहे, व्यक्तिगत कैम्पों के लिए। डॉ. मोनोमिता हंसते हुए बताती हैं, ‘मैंने पड़ोसी राज्यों के ग्रैंडमास्टर्स को इसलिए प्राथमिकता दी क्योंकि ट्रेवल खर्च कम पड़ता था और फिर खानपान की आदतें भी लगभग समान थीं। अगर मुझसे परफेक्ट डोसा या उथप्पम बनाने के लिए कहा जाता, तो शायद मेरे लिए मुश्किल हो जाता।’ उनका इशारा तमिलनाडु की तरफ था, जो एक तरह से भारत की शतरंज राजधानी है।
मयंक के पास प्रायोजक नहीं थे। ऐसे में कुछ व्यक्तियों व संगठनों की उदारता से मदद मिली- विशेषकर जालन इंडस्ट्रीज के मृत्युंजय जालन, ग्रुप ई4 और चेसबेस इंडिया के हेल्पचेस इनिशिएटिव खर्च कवर करने के लिए। हाल ही में विश्वनाथन आनंद की डब्लूएसीए ने मयंक के लिए बोरिस गेलफेंड के साथ कुछ सत्र आयोजित किये। मयंक मज़बूत आक्रमक खिलाड़ी हैं, जो अपने मोहरों को सक्रिय मोड में रखना पसंद करते हैं। वह अपने संकोच पर विजय पा चुके हैं, जैसा कि ग्रैंडमास्टर मिश्रा कहते हैं, ‘मयंक पहले मानते थे कि उनका आक्रमण उनके पोजीशनल प्ले जितना अच्छा नहीं है, लेकिन अब वह अपने ऊपर अधिक विश्वास करते हैं। उनकी मारक क्षमता गजब की है और अगर वह अपनी ताकत को बरकरार रखेंगे तो बहुत आगे तक जा सकते हैं।’ मयंक की यात्रा में डॉ. मोनोमिता की ज़बरदस्त भूमिका है। वह अपना काम छोड़कर उनके साथ यात्रा करती हैं, घंटों खामोश, ठंडे प्लेइंग हॉल्स में गुज़ारती हैं और आर्थिक मदद के लिए सरकारी खेल दफ्तरों में अनगिनत चक्कर लगाती हैं, जिसमें कम ही सफलता मिलती है। वह बताती हैं, ‘मयंक की शतरंज के लिए मैंने अपना अधिकतर फिक्स्ड डिपाजिट तो खर्च कर ही दिया है। मैं उम्मीद कर रही हूं कि अब जब वह ग्रैंडमास्टर बन गया है तो हालात में कुछ तो सुधार आयेगा।’ -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर




