युद्धों को रोकने के लिए प्रभावशाली संगठन की ज़रूरत

एक ओर आइसलैंड, स्विट्ज़रलैंड और कोस्टारिका जैसे देश हैं जिन्होंने शायद ही कभी युद्ध देखा हो, कुछ ने अपनी सेना ही समाप्त कर दी। अनेक जानते ही नहीं कि किसी देश से लड़ना क्या होता है। इसके विपरीत अमरीका, रूस, चीन, ईरान, इज़रायल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे हैं जो अगर किसी से युद्ध न करें तो उनका भोजन ही हज़म नहीं होता। आकार में छोटा और वैश्विक संदर्भ में मुट्ठी भर लोगों का देश ब्रिटेन जिसके लड़ कर बनाये साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था। इसी तरह फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों का इतिहास है जो भीषण तबाही के गवाह हैं।
धर्मयुद्ध से मिसाइल और ड्रोन तक : यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि युद्ध इस कारण से नहीं लड़ा जाता कि कोई मजबूरी है, बल्कि इसलिए कि किसी भू-भाग पर कब्ज़ा कर सीमाओं का विस्तार करना है, किसी को नेस्तनाबूद करने की नीयत है या उसे काबू में रखना है अथवा एक हिंसक शिकारी की तरह किसी को दम तोड़ते देखना खुशी की बात है। बहुत-से देश किसी के साथ युद्ध करना अपना शौक समझते हैं। एक बार शुरू कर दिया तो उसे खत्म नहीं करना चाहते। युद्ध उनके लिए अन्य किसी कारोबार, उद्योग धंधे या कल-कारखाने की तरह है जिसका उत्पादन होता रहना चाहिए, रुकने का मतलब उनके लिए नुकसान का सौदा है, दूसरों की जान लेने से लेकर व्यापक नरसंहार करने जैसा है। एक जो लड़ते हैं और दूसरे वे जो निरपराध और लड़ाई में शामिल तक नहीं, लेकिन सबसे अधिक नुकसान उन्हें ही झेलना पड़ता है। त्रासदी यह है कि युद्ध थोपने वाले ही शांति की अपील करते हैं, जो असल में उनका मुखौटा है ताकि दुनिया उन्हें शांतिदूत मानने के भ्रम में पड़ जाए और वे अगली लड़ाई किससे करनी है, उसकी तैयारी में जुट जायें। यह उनकी रणनीति है जो सौदेबाजी पर आधारित है। 
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं अपना महत्व खोती जा रही हैं। जो ताकत थी, अब वही कमज़ोरी बनती जा रही है। वीटो पावर देश अपने-अपने हितों के अनुसार किसी भी कार्रवाई को रोक सकते हैं। नतीजा यह कि जब कुछ करने की ज़रूरत सब से ज़्यादा होती है तो उसमें ही सबसे अधिक गतिरोध या रुकावट पैदा कर दी जाती है। युद्ध ही एकमात्र विकल्प होने जैसा वातावरण बना दिया जाता है वरना इस बात में क्या तुक है कि ईरान अगर परमाणु सम्पन्न देशों की पंक्ति में आ गया तो वह बम फोड़ेगा ही, इसलिए इसे बर्बाद कर दो। दूसरी तरफ इज़रायल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता रहा है और ईरान उसे किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं करने देना चाहता। ईरान भी इतिहास के एक दौर में अपनी पहचान बनाने की कोशिश करता रहा और उसे अनेक संघर्षों से गुज़रना पड़ा है। अमरीकी राष्ट्रपति की बात करें तो ताकतवर होने का अर्थ यह नहीं कि सोच में किसी का विनाश करने की बात आ गई तो लाव-लश्कर के साथ उसका अंत करने निकल पड़े और वह भी इसलिए कि आप अपने को दुनिया का सबसे महान शासक समझते हैं। 
एक नई सोच की शुरुआत हो : अपील या निंदा से युद्ध नहीं रुक सकते। इसलिए किसी ऐसी संस्था का होना ज़रूरी है जो केवल सलाह नहीं बल्कि अंतिम आदेश दे सके कि युद्ध रोक देने का मतलब उसका रुकना ही है। इस संगठन में पांच नहीं, बल्कि सभी बड़े और मध्यम आकार के देशों के प्रतिनिधि शामिल हों। वीटो जैसा एकतरफा अधिकार न होकर एक ऐसा संतुलित, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित निर्णय हो जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार बाध्यकारी हो और उसके न मानने का परिणाम सभी देशों द्वारा उस देश का सामूहिक बहिष्कार हो, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली और साधन सम्पन्न क्यों न हो। इसका संवैधानिक और कानूनी स्वरूप ऐसा हो कि यदि किसी झगड़े का निर्धारण या उसका समाधान केवल युद्ध द्वारा ही किया जा सकता हो तो इस संस्था की अनुमति आवश्यक हो, जो दोनों पक्षों की निष्पक्ष दलीलों पर आधारित हो और युद्ध के अतिरिक्त कोई भी विकल्प न हो तो। यदि कोई देश बिना इस संस्था की सहमति या अनुमति के किसी देश पर आक्रमण करता है तो इस संस्था को इतने अधिकार प्राप्त हों कि यह तुरंत हस्तक्षेप कर सके और युद्ध विराम का आदेश दे सके और उसे सभी सदस्य देशों के सहयोग से लागू करवा सके। इस संस्था का फैसला दोनों पक्षों पर लागू हो और किसी के द्वारा उल्लंघन करने का आरोप सिद्ध होने पर आर्थिक या जो भी उचित हो, वह दण्ड दिए जाने का प्रावधान हो। 
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह संभव है, क्योंकि कोई भी बड़ा देश जिसके पास युद्ध के आधुनिक हथियार हैं, इस व्यवस्था के प्रति सहमत नहीं होगा। अमरीका और अन्य देश दूसरों पर प्रतिबंध या टैरिफ जैसे आर्थिक प्रतिबंध लगा देते हैं। यह संस्था इतनी सशक्त हो कि अपने वैश्विक स्वरूप, आकार और स्वतंत्र अस्तित्व के कारण जो भी निर्णय ले, वह सभी को मानना ही पड़ेगा। कह सकते हैं कि कोई शक्ति सम्पन्न देश क्यों इस व्यवस्था को अंगीकार करने के लिए तैयार होगा क्योंकि वह इस नशे में रहता है कि वह नियम बनाता है, किसी दूसरे के बनाये नियमों पर चलने का उसका स्वभाव नहीं है। इसका जवाब यह है कि यह संस्था कोई संवाद मंच नहीं, बल्कि ऐसा वैश्विक संगठन होगा जिसके निर्णय सामूहिक और बाध्यकारी हैं। इस संस्था का परिचालन सभी सदस्य देशों के आर्थिक अनुदान से होगा। इसलिए कोई एक देश इसका सर्वेसर्वा न होकर सभी सदस्य देश होंगे। आज अधिकतर वैश्विक संस्थाएं अमरीका, रूस, चीन जैसे देशों की आर्थिक सहायता पर निर्भर हैं, इसीलिए उनकी भूमिका केवल सलाह देने तक सीमित रह जाती है। यह स्थिति बदलनी होगी। 
युद्ध न करने की सोच बनेगी : इस तरह का संगठन यदि किसी भी प्रकार से संभव हो जाए तो यह एक प्रकार से वैश्विक सोच में परिवर्तन होगा। इसका प्रमुख कारण यह है कि आज कोई भी युद्ध केवल दो देशों के बीच नहीं होता बल्कि उसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ता है। इज़रायल और ईरान का युद्ध अनेक देशों में ईंधन की आपूर्ति का संकट बनकर सामने आया है। यह शक्ति बनाम शांति है जो किसी भी कीमत पर स्थापित हो तो वह सस्ती होगी। इस का उद्देश्य नवीनतम शस्त्रों की मारक क्षमता की प्रयोगशाला बनने से उन देशों को बचाना है जिनकी भूमिका किसी भी युद्ध में नहीं होती। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज युद्ध सैनिकों या सीमाओं में रहकर नहीं लड़ा जाता, बल्कि डेटा, साइबर हमले और आर्टिफिफियल इंटेलिजेंस के ज़रिए लड़ा जाता है। 
यदि ऐसी किसी संस्था की स्थापना होती है तो यह वैज्ञानिक सोच और तकनीक के अनुसार होगी। इसकी सफलता स्वयं सिद्ध होगी क्योंकि दो या अधिक देशों के मध्य किसी भी वार्ता में गतिरोध होने पर सशस्त्र संघर्ष की संभावना होते ही स्वचालित हस्तक्षेप प्रणाली या ऑटोमैटिक इंटरफेयरिंग प्रोटोकॉल लागू हो जाएगा। यहां तक भी संभव है कि यदि कोई पक्ष अड़ियल रवैया अपनाए तो उसके आधुनिकतम हथियारों का प्रक्षेपण रोका जा सकेगा। यह क्षमता एआई संचालित होने और सब कुछ डिजिटल और डेटा नियंत्रित होने से कोई भी देश कितना भी शक्तिशाली हो, हमला करने में सफल नहीं हो सकेगा। उदाहरण के लिए जब आज मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर उनकी ताकत को शून्य या निष्क्रिय किया जा सकता है तो यही प्रणाली अन्य सभी आधुनिक हथियारों पर लागू होकर उनका हमला करने की शक्ति समाप्त कर सकेगी। इसकी पहल जहां एक ओर भारत जैसे तटस्थ देशों को करनी होगी, वहीं सभी विज्ञानी सोच रखने वाले देशों को इससे जुड़ने की मानसिकता उनके नेतृत्व को बनानी होगी। 

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