पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी ईरान युद्ध की कीमत
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया क्षेत्र में ऊर्जा (गैस व तेल) ठिकानों पर की जा रही बमबारी की कड़े शब्दों में निंदा की है और डी-एस्केलेशन (आक्रामक या हिंसक स्थिति को बिना बल प्रयोग के, बातचीत के द्वारा कम करने और उसे अधिक बिगड़ने से रोकने) का आग्रह किया है। इस संदर्भ में उन्होंने ओमान, जॉर्डन, फ्रांस व मलेशिया के नेताओं से बात की है और तुरंत वार्ता व कूटनीति की आवश्यकता पर बल दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी विश्व के नेताओं को एक मंच पर लाना चाहते हैं ताकि युद्ध कर रहे देशों पर युद्ध विराम का दबाव बनाया जा सके।
बहरहाल, मोदी की कोशिशों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि अमरीका व इज़रायल द्वारा ईरान पर जबरन थोपा गया युद्ध अब ऐसे मोड़ पर आ गया है, जब उसकी शिद्दत पूरी दुनिया महसूस कर रही है, क्योंकि ब्रेंट क्रूड के दाम बढ़कर प्रति बैरल 118 डॉलर हो गये हैं और गैस के दामों में 17 से 30 फीसदी का इजाफा हुआ है। जब तेल व गैस के दाम बढ़ते हैं, तो हर चीज़ महंगी हो जाती है और पिसता बेचारा आम आदमी है। तेल के दाम बढ़ने (और रुपये के कमज़ोर होने) से दलाल स्ट्रीट के निवेशक भी डर गये हैं। बैंक के शेयरों में 5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ गई। इस सबका प्रभाव यह हुआ कि 19 मार्च, 2026 को सेंसेक्स में लगभग 2,500 आंकों की गिरावट आयी, जोकि एक दिन में आज तक की छठी सबसे बड़ी गिरावट है। निवेशकों के लिए अप्रैल 2025 के बाद यह सबसे खराब दिन रहा जब तकरीबन 13 लाख करोड़ रूपये स्वाहा हो गये।
इसके बावजूद जंग पर विराम लगने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। ईरान, जिसके पास अब खोने को कुछ नहीं है, क्योंकि उसके शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दिया गया है, ने युद्ध विराम करने से साफ इंकार कर दिया है और उसका कहना है। दूसरी ओर पेंटागन ने इस युद्ध को फंड करने के लिए 200 बिलियन डॉलर की मांग की है। जितना पैसा इस युद्ध में धुआं-धुआं होता जा रहा है, उसका दुनिया पर उतना ही भयानक असर पड़ेगा। कुल मिलाकर अनुमान यह है कि दुनिया मंदी व महंगाई की चपेट में आती हुई नज़र आ रही है और तीसरे विश्व युद्ध का खतरा भी मंडरा रहा है। फिलहाल इस संकट के लिए केवल इज़रायल ज़िम्मेदार है, जिसने ईरान के साउथ पारस फॉसिल गैस फील्ड पर हमला किया। अंतर्राष्ट्रीय नियमों के तहत तेल, गैस आदि आवश्यक इन्फ्रास्टक्चर पर हमला करने की मनाही है।
चूंकि ईरान पहले ही कह चुका है कि अगर उसके तेल व गैस फील्ड्स पर हमला होगा तो वह भी उसी स्वर में जवाब देगा, इसलिए उसने इज़रायल, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, जॉर्डन, यूएई, ओमान और बहरीन के ऐसे ही ठिकानों पर अपनी मिसाइलें बरसायीं। सबसे बड़ा हमला कतर की एनर्जी एलएनजी फैसिलिटी पर किया गया, जिससे रास लाफ्फान में गैस-टू-लिक्विड प्लांट पर काम बंद हो गया है और अनुमान यह है कि दुनिया भर में गैस की ज़बरदस्त कमी आ जायेगी। अब ट्रम्प का कहना यह है कि ईरान के गैस फील्ड पर इज़रायली हमले की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी, जबकि इज़रायल के तीन अधिकारियों ने दावा किया है कि यह हमला वाशिंगटन के सहयोग से किया गया। हालांकि एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने माना है कि यह हमला उनकी अपनी सोच थी और अमरीका ने उससे आगे इस तरह के हमले न करने के लिए है, जिसे इज़रायल मानेगा।
इसके साथ ही अब ट्रम्प का यह भी कहना है कि कतर स्ट्राइक में शामिल नहीं था, इसलिए ईरान को उस पर हमला नहीं करना चाहिए था। लेकिन असल मुद्दा तो यही है कि अरब मुल्कों में अमरीका के सैन्य बेस हैं, जिनका इस्तेमाल ईरान पर हमले करने के लिए किया जा रहा है। ईरान इस मामले में एकदम स्पष्ट है कि जहां से उस पर हमले होंगे, वह वहां जवाबी कार्रवाई करेगा। अरब मुल्कों को चाहिए कि वह अपने यहां के अमरीकी बेसों को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल न होने दें, क्योंकि यह युद्ध उनका नहीं है, लेकिन अरब मुल्क अमरीका के सामने नतमस्तक हैं और चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते। यही वजह है कि गाज़ा नरसंहार के दौरान भी वह मूकदर्शक बने रहे। अगर जल्द दुनिया को होश न आया तो ऊर्जा बाज़ार व सप्लाई बर्बाद न भी हुए तो भी बर्बादी के कगार पर पहुंच जायेंगे। दरअसल, 19 मार्च, 2026 संसार के लिए युद्ध का सबसे खराब दिन था। इज़रायल व ईरान ने जिन जगहों पर हमले किये वे मामूली लक्ष्य नहीं थे। ग्लोबल एलएनजी सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा रास लाफ्फान से आता है और साउथ पारस दुनिया का सबसे बड़ा गैस फील्ड है, जिसके संयुक्त मालिक ईरान व कतर हैं।
इसलिए हम सिर्फ युद्ध की बढ़ती तीव्रता नहीं देख रहे हैं बल्कि वैश्विक ऊर्जा ढांचे को हथियार बनता हुआ देख रहे हैं। बात सिर्फ तेल के दाम बढ़ने, सप्लाई चिंताओं में वृद्धि की ही नहीं है, अपितु वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का केन्द्र फारस की खाड़ी सक्रिय युद्ध का मैदान बनती जा रही है। यही वजह है कि ट्रम्प को जल्द ही अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने कहा कि वाशिंगटन को तेलअवीव के इरादे के बारे में मालूम नहीं था।
अब वह बमों से तेल व गैस फील्ड्स को अलग रखना चाहते हैं। लेकिन क्या इज़रायल उनकी बात सुनेगा, यह मुश्किल प्रतीत होता है। इज़रायल-ईरान का अंत चाहता है, जबकि व्यापारी ट्रम्प तेहरान में ऐसी शासन व्यवस्था जो उनके साथ कारोबार करे, उन्हें आर्थिक लाभ पहुंचाये। इरादों का यह अंतर अब अमरीका की घरेलू राजनीति में भी दिखायी देने लगा है। ट्रम्प के अपने मागा समर्थक सवाल कर रहे हैं कि अमरीका उस युद्ध में क्यों कूदा, जो उसका नहीं है। बहरहाल, स्थिति अब यह हो गई है कि तार्किक संयम की उम्मीद किसी भी पक्ष से नहीं की जा सकती। हां, अमरीका इस स्थिति में अवश्य है कि युद्ध पर विराम लगाये या उसे अतिरिक्त तीव्र होने दे। अगर वाशिंगटन इज़रायल का समर्थन जारी रखता है, तो यह जंग पूर्णत: ऊर्जा युद्ध में बदल जायेगी और संकट के बादल पूरी दुनिया पर छा जायेंगे। ध्यान रहे कि अगर खाड़ी जलती रहेगी तो कीमत दुनिया को चुकानी पड़ेगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



