जाम साहिब कौन थे ?
‘दीदी, मेरा एक दोस्त पिछले महीने अपने पापा के साथ पोलैंड घूमने गया था और उसने लौटने पर मुझे बताया कि वहां एक भारतीय महाराजा के नाम पर एक स्मारक है...।’
‘हां, वॉरसॉ में है, जाम साहिब की याद में।’
‘लेकिन यह जाम साहिब कौन थे?’
‘हमारे गुजरात राज्य में एक नवानगर नाम की रियासत थी, जिसे आजकल जामनगर कहते हैं। इसके शासकों को जाम साहिब यानी जाम के राजा कहा जाता था। अप्रैल 1933 से फरवरी 1948 तक महाराजा दिग्विजय सिंह जी रणजीत सिंह जी जडेजा इस रियासत पर शासन करते थे। वह अपने चचा, विख्यात क्रिकेटर रणजीत सिंह जी, जिनके नाम पर भारत में रणजी ट्राफी खेली जाती है, के उत्तराधिकारी थे। वह विशेषरूप से जाम साहिब के नाम से जाने गये।’
‘उन्होंने ऐसा क्या कारनामा किया था कि पोलैंड में उनके नाम का स्मारक बना।’
‘इसे समझने के लिए दूसरे विश्व युद्ध के इतिहास को संक्षेप में समझना होगा।’
‘जी, बताएं।’
‘एडोल़्फ हिटलर जब जर्मनी का चांसलर बना तो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उसने 1 सितम्बर 1939 को पोलैंड पर ज़बरदस्त हमला किया और उसकी फौज ने वहां घुसकर कत्लेआम मचा दिया। नाज़ी हमले से गंभीर शरणार्थी संकट खड़ा हो गया। पोलैंड के बहुत से नागरिक सोवियत संघ में घुस गये, अपनी जान बचाने के लिए। वहां उन्हें शुरू में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन जब रूस पर नाज़ी आक्रमण हुआ तो जून 1941 में उन्हें रिहा कर दिया गया। इनमें 18,000 बच्चे थे, जिनका भविष्य तय होना शेष था।’
‘फिर क्या हुआ?’
‘बच्चों की ज़िंदगी बचाने के लिए उन्हें ईरान के ज़रिये पूरब व भारत में भेजा गया। इस स्थिति में जाम साहिब ने हस्तक्षेप किया और लगभग 1,000 पोलिश बच्चों के लिए जामनगर के निकट बालचडी में रहने की विशेष व्यवस्था की। उन्हें फूड, शिक्षा, छत व मैडीकल केयर उपलब्ध कराया गया। चूंकि अधिकतर बच्चे यतीम थे, इसलिए वह जाम साहिब को ही बापू कहते थे और जाम साहिब भी उन्हें ऐसा कहने के लिए प्रोत्साहित करते थे। बच्चे युद्ध के अंत तक बालचडी में रहे और फिर पोलैंड व अन्य देशों में लौट गये।’
‘तो जाम साहिब की इस मानवीय सेवा के लिए पोलैंड ने उनका सम्मान किया।’
‘हां। जाम साहिब की मृत्यु के 50 साल बाद पोलैंड की संसद ने उनका सम्मान किया, गुड महाराजा स्क्वायर का निर्माण कराया, उनके स्मारक के साठ और वारसा में एक सड़क का नाम भी उनके नाम पर रखा।’
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

