दक्षिण भारत के किसानों का आर्थिक सहारा है सुपारी का पेड़

सुपारी का पेड़ उन कुछ गिने-चुने पेड़ों में से है, जो हमारी कृषि, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और परंपरा चारो को एक साथ जोड़ता है। पहली नजर में लगता है कि जैसे सुपारी कोई विदेशी पेड़ हो, लेकिन भारत के सबसे प्राचीन पेड़ों जैसे आम, नारियल और कटहल जैसे पेड़ों की तरह ही सुपारी का पेड़ भी मूलत: भारतीय धरती का पेड़ है। यह एक सिर्फ फल वृक्ष भर नहीं है बल्कि देश के करोड़ों किसानों की स्थायी आय का जरिया है। हां, फर्क इतना है कि वह आमतौर पर दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में ही पाया जाता है। सुपारी के पेड़ का सामान्य नाम सुपारी है और अंग्रेजी में बीटल नट या एरेका नट कहते हैं। 
इसका वैज्ञानिक नाम एरेकाकैटेचु और यह पाम परिवार का एक सदाबहार एकल तना वाला वृक्ष है, जिसकी ऊंचाई सामान्यत: 15 से 25 मीटर होती है और जीवनकाल 40 से 70 साल तक का होता है। इसकी मूल उपज सुपारी नामक फल है जो गुच्छों में लगता है। कच्ची सुपारी हरी और पकने पर पीली या नारंगी हो जाती है। सुपारी के फल के अंदर एक कठोर बीज होता है, वास्तव में यह बीज ही व्यवसायिक सुपारी होती है। सुपारी का पेड़ मूलत: दक्षिण भारत और दक्षिण पूर्व एशिया का ही मूल वृक्ष है। भारत तो इसका प्राकृतिक और सांस्कृतिक केंद्र भी है।
भारत में सुपारी का उल्लेख वैदिक साहित्य, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता आदि में मिलता है। भारत के दक्षिण और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के अलावा अंडमान या निकोबार द्वीप समूह में इसकी खेती हजारों साल से हो रही है। हमारे यहां से ही सुपारी श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड तक पहुंची है। इसलिए सुपारी का पेड़ उन कुछ गिने-चुने पेड़ों में से है, जो मूलत: भारतीय धरती के पेड़ है। जहां तक सुपारी के लिए जलवायु और मिट्टी की अनुकूलता का सवाल है, तो उष्ण और आर्द्र जलवायु तथा 20 से 35 डिग्री तक का आदर्श तापमान और 1500 से 3000 मिलीमीटर तक की वार्षिक वर्षा की ज़रूरत होती है। सुपारी के पेड़ के लिए पाला पड़ना और सूखा पड़ना दोनो ही घातक होते हैं। जहां तक सुपारी के पेड़ के अनुकूल मिट्टी का सवाल है तो यह गहरी जलनिकास वाली दोमट मिट्टी होनी चाहिए। सुपारी के पेड़ के लिए अनुकूल मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 6.5 होना चाहिए। सुपारी इसी क्षेत्र में हो सकती है जहां जलभराव बिल्कुल न होता हो। भारत में सुपारी की सर्वाधिक खेती, कर्नाटक, केरल, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, तमिलनाडु और अंडमान निकोबार द्वीप समूह है। भारत दुनिया के शीर्ष उद्योग सुपारी उत्पादक देशों में से एक है, सबसे ज्यादा सुपारी की खेती कर्नाटक में होती है। 
जहां तक सुपारी के पेड़ में फल आने और उसकी उत्पादकता का सवाल है तो सुपारी का पेड़ रोंपे जाने के 5 से 7 सालों बाद फल देता है और उसमें पूर्ण उत्पादन 10 से 12 सालों बाद शुरु होता है। सुपारी के पेड़ में औसतन 3 से 6 किलो सूखी सुपारी हासिल होती है। अगर एक हेक्टेयर में 500 से 600 सुपारी के पेड़ लग जाते हैं तो औसतन 2 से 2.5 टन सूखी सुपारी की उपज हासिल होती है, जिसकी बाजार कीमत 7 से 12 लाख रुपये होती है।  इस तरह एक हेक्टेयर में सुपारी की खेती की जाए तो औसतन 5 से 9 लाख रुपये सालाना की इनकम होती है। क्योंकि सुपारी की खेती में प्रतिहेक्टेयर 2 से 3 रुपये की लागत आती है। सुपारी का एक पेड़ 20 से 30 साल तक लगातार उपजाऊ बना रहता है। 
सुपारी मुख्यत: अपनी सूखी सुपारी के रूप में आर्थिक रूप से उपयोगी जो कि माउथ फ्रेशनर और पान आदि में खायी जाती है और अनेक आयुर्वेदिक दवाओं में इनका उपयोग होता है। सुपारी की मांग हमेशा उत्पादन से ज्यादा होती है। इसलिए सुपारी की खेती हमेशा लाभदायक होती है। आजकल सुपारी के अनेक प्रोसेसिंग उत्पाद बाजार में आ गये हैं। मसलन लाल सुपारी, सफेद सुपारी फ्लेवर्ड सुपारी, कटिंग सुपारी आदि। सुपारी के पेड़ के जरिये अच्छी खासी साइड इनकम संभव है, पर सुपारी के बागान से भरपूर आर्थिक लाभ तभी लिया जा सकता है, जब सुपारी के पेड़ों के नीचे काली मिर्च, हल्दी, अनानास, केला या कोको जैसे अन्य फलों की भी खेती की जाए। क्योंकि सुपारी के पेड़ आमतौर पर 15 से 20 मीटर ऊंचे होते हैं। इस तरह सुपारी के बागान नीचे बिल्कुल खाली होते हैं। अगर इंटरक्रॉसिंग करके सुपारी की खेती की जाए, तो सालाना इनकम में 30 से 40 प्रतिशत की आराम से बढ़ोत्तरी हो जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि सुपारी के पेड़ का हर हिस्सा व्यवसायिक रूप से लाभदायक है। इसकी पत्तियां, इसके छिलके, इसका रेशा, सब कुछ बिकता है। सुपारी के पत्तों से इको फ्रेंडली प्लेट्स बनते हैं, इसके छिलके से कंपोस्ट तथा ईंधन बनता है और इसका रेशा भी उद्योग जगत में भारी मांग वाला होता है। 
बस सुपारी की खेती में जो चीज चुनौतीपूर्ण है वह है कम से कम इसकी खेती शुरु करने के बाद 8 से 10 सालों तक फसल का इंतजार करना। क्योंकि सुपारी के पेड़ में अमूमन सात साल से पहले फल नहीं आता, जिनमें आ जाता है, उनमें भी पूर्ण और व्यवसायिक फल 8 साल या उसके बाद ही आते हैं। साथ ही इसकी कीमत में भी उतार-चढ़ाव बना रहता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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