अभिनेत्रियों को अलग पहचान दिलाने वाले राज खोसला
निर्माता, निर्देशक व पटकथा लेखक राज खोसला ‘महिलाओं के निर्देशक’ के नाम से विख्यात थे; क्योंकि रहस्य-रोमांच शैली की फिल्में- सीआईडी, वो कौन थी, मेरा साया- बनाने के बावजूद वह अभिनेत्रियों को पर्दे पर उनके सर्वश्रेष्ठ रूप में पेश करते थे। चूंकि उन्होंने क्लासिकल संगीत की शिक्षा भी ली हुई थी, इसलिए उनकी फिल्मों में दिल में उतरने वाले गाने हुआ करते है- ‘लग जा गले ..’ को कौन भूल सकता है। बहरहाल, एक दिन राज खोसला अपने एक दोस्त के यहां डिनर पर गये हुए थे कि उन्होंने ग्रामोफोन पर फैज़ अहमद फैज़ की कालजयी नज़्म ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग’ सुनी, जिसे नूर जहां ने गाया था। इस नज़्म की एक पंक्ति- ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है’- राज खोसला के दिल में इतनी गहराई से उतर गई कि वह उसे ही कई दिन तक उठते बैठते गुनगुनाते रहे। दरअसल, इस पंक्ति को सुनकर उन्हें अपनी एक पूर्व प्रेमिका की याद आ गई थी। इस पंक्ति के प्रभाव ने अपना रंग दिखाया और राज खोसला ने फिल्म ‘चिराग’ की कहानी लिख डाली, जिसमें अख्तर मिज़र्ा, जीआर कामत, ओपी दत्ता व अख्तर-उल-ईमान ने भी सहयोग किया। फिल्म में सुनील दत्त व आशा पारिख की मुख्य भूमिकाएं थीं।
अजय सिंह (सुनील दत्त) को एक गरीब लड़की आशा छिब्बर (आशा पारिख) से प्रेम हो जाता है, जिसे वह रईस लड़की समझते थे। दोनों परिवारों की सहमति से अजय व आशा की शादी हो जाती है। आशा गर्भधारण में असमर्थ है और एक दुर्घटना में उसकी आंखों की रोशनी भी चली जाती है, जिस वजह से वह पूर्णत: अजय पर निर्भर हो जाती है। इस स्थिति से अजय की मां गायत्री देवी कुंठित हो जाती हैं और अजय जब बिज़नेस मीटिंग के लिए गया हुआ होता है, तो वह आशा को घर से निकाल देती हैं। आशा अपने भाई व भाभी के पास रहने के लिए चली जाती है। लौटने पर अजय आशा को उसके भाई के घर से लेने के लिए जाता है, जहां भाई अजय को आशा के साथ ससुराल में हुए दुर्व्यवहार के बारे में गुस्से से बताता है। इस बीच आशा घर की बालकनी से पास बहती नदी में कूद जाती है, आत्महत्या करने के इरादे से। आशा को सब लोग ‘मरा’ हुआ समझ लेते हैं, हालांकि उसकी ‘लाश’ नहीं मिली थी।
आशा को एक धोबी बचाकर अपने घर ले जाता है, जहां मालूम होता है कि वह अजय के बच्चे की मां बनने वाली है। इधर उदास अजय की कार का एक्सीडेंट हो जाता है, और वह अस्पताल में पहुंच जाता है। डिस्चार्ज होने के बाद, अजय पर गायत्री देवी पुन: विवाह करने का दबाव बनाती हैं ताकि उन्हें अपनी जायदाद का वारिस मिल जाये। आशा धोबी के घर में ही एक लड़के को जन्म देती है। धोबी आशा को समझाता है कि वह अपने पति के घर लौट जाये ताकि बच्चे की परवरिश उसके पिता के साये में हो सके। जिस दिन अजय की शादी हो रही होती है, आशा उसके घर पहुंचकर बच्चे को गायत्री देवी को सौंप देती है। गायत्री देवी को शॉक लगता है, वह अजय की शादी रुकवाने के लिए दौड़ती हैं और बताती हैं कि आशा ज़िंदा है व उसने एक बेटे को जन्म दिया है। शादी रुक जाती है और अजय व आशा का मिलन हो जाता है।
इस पूरी कहानी के केन्द्र में है गाना ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है’, जिसे अलग-अलग मुहम्मद रफी व लता मंगेशकर ने गाया है। फैज़ की यह पंक्ति राज खोसला के दिलोदिमाग पर इतनी अधिक छायी हुई थी कि वह इसको ही आधार बनाकर अपनी फिल्म में एक गीत चाहते थे। लेकिन गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी खुद इतने बड़े शायर थे कि वह किसी दूसरे शायर की पंक्ति का इस्तेमाल अपने गीत में करने को तैयार नहीं थे। लिहाज़ा उन्होंने कहा कि वह इस पंक्ति के इर्दगिर्द कुछ लिखने का प्रयास करेंगे। उन्होंने आंखों की तारीफ में अनेक मुखड़े लिखे, लेकिन राज खोसला को उनमें से एक भी पसंद नहीं आया। वह तो बस फैज़ की ही पंक्ति चाहते थे। उन्हें ज़िद चढ़ गई थी। वह ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है’ में अपनी प्रेमिका की आंखें देख रहे थे। उधर मजरूह को अपनी साख खोने का डर था और वह किसी भी सूरत में फैज़ की पंक्ति का प्रयोग अपने गीत में करने के लिए तैयार नहीं थे। दोनों तरफ ज़िद अड़ गई थी। फिल्म का काम अधर में लटकता जा रहा था।
गतिरोध को तोड़ने के लिए संगीतकार मदन मोहन ने एक रास्ता निकाला। उन्होंने सुझाव दिया कि फैज़ से उनकी पंक्ति इस्तेमाल करने की अनुमति ले ली जाये। मजरूह ने इसे इस शर्त पर माना कि अनुमति लिखित में ली जाये और संबंधित पंक्ति का क्रेडिट फैज़ को फिल्म की नंबरिंग में दिया जाये। राज खोसला इस बात को मान गये। फैज़ ने खुशी से लिखित में अनुमति दे दी और अगर आप ‘चिराग’ की नंबरिंग पर गौर करेंगे तो पंक्ति का क्रेडिट फैज़ को ही दिया गया है। इसके बाद मजरूह ने ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है’ को आधार बनाकर एक यादगार गीत लिखा और मुहम्मद रफी ने अपनी आवाज़ में ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है’ गाकर फैज़ की इस पंक्ति को हमेशा के लिए अमर कर दिया।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





