बढ़ते प्रदूषण और वैश्विक तपिश से सिकुड़ रहे ग्लेशियर 

अषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) के पावन अवसर पर शुरू हुई विख्यात अमरनाथ यात्रा इस समय अपने चरम पर है, लेकिन यात्रा के पहले ही हफ्ते में बर्फ निर्मित पवित्र शिवलिंग के 60  प्रतिशत तक पिघल जाने के कारण श्रद्धालुओं को भारी हताशा का सामना करना पड़ रहा है। यह चिंताजनक स्थिति पहली बार तो नहीं बनी है, मगर यदि हम पीछे मुड़ कर देखें तो पवित्र शिवलिंग के नियत समय से पहले पिघलने की आवृत्ति और तीव्रता पिछले कुछ सालों में अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। वास्तव में यह संकट केवल यहां तक सीमित नहीं है, बल्कि समूचे सिंधु नदी के जल संभरण क्षेत्र में गहराई से पैर पसार चुका है। पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की अत्यधिक भीड़, भारी निर्माण कार्यों से उड़ते धूल के गुबार और लाखों की संख्या में दौड़ते वाहनों के प्रदूषण ने इस ऐतिहासिक नदी के अस्तित्व को ही गंभीर संकट में डाल दिया है।
सिंधु नदी, जिसने भारत को वैश्विक पहचान दी और सिंधु घाटी सभ्यता को जन्म दिया, आज अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर संकट में है। एशिया की यह जीवनदायिनी नदी करोड़ों लोगों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा का आधार है। जलवायु परिवर्तन, तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर, अनियंत्रित पर्यटन और प्रदूषण ने इसे विनाश की कगार पर ला खड़ा किया है। 11 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला यह बेसिन थर्ड पोल का हिस्सा है। यहां के ग्लेशियर, जो सिंधु के 50 जल प्रवाह का स्रोत हैं, तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं। इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डिवेल्पमेंट (आईसीआईएमओडी) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 के बाद इस क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की गति लगभग दोगुनी हो गई है। 1990 से 2020 के बीच इस पूरे क्षेत्र ने अपने ग्लेशियर क्षेत्रफल का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा खो दिया। विश्व मौसम संगठन और यूनेस्को ने भी चेतावनी दी है कि वर्ष 2022 से 2024 के बीच वैश्विक स्तर पर ग्लेशियरों का द्रव्यमान हृस अब तक के इतिहास में सर्वाधिक दर्ज किया गया। वाडिया इंस्टीच्यूट ऑफ  हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों का कहना है कि अब सर्दियों की भारी बर्फबारी का समय बदल रहा है। पहले जो हिमपात दिसम्बर से फरवरी के बीच होता था, उसका बड़ा हिस्सा अब मार्च और अप्रैल में हो रहा है, जिससे ग्लेशियरों का प्राकृतिक पुनर्भरण लगातार कमज़ोर हो रहा है।
सोनमर्ग से जोजिला दर्रे की ओर बढ़ते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरी सिंध घाटी धूल और धुएं की एक घनी चादर में लिपट गई हो। पर्यटकों के वाहनों की लम्बी कतारें, यात्रा की रसद में जुटे बेतहाशा ट्रक, सैन्य बलों के काफिले और मेगा सड़क तथा सुरंग निर्माण परियोजनाओं में लगे भारी अर्थ-मूविंग वाहन प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में इस अत्यंत संकरी और संवेदनशील घाटी से गुजरते हैं। इन वाहनों के पीछे उठते धूल के विशाल गुबार और डीज़ल का धुआं हवा के साथ सीधे ऊपर सदियों पुराने हिमनदों की ओर बढ़ते साफ  दिखाई देते हैं। सोनमर्ग के निकटवर्ती थजीवास, मचोई और बालटाल के ऊपरी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियरों की उजली बर्फीली सतह पर मटमैली परत नंगी आंखों से देखी जा सकती है। कदम-कदम पर होने वाले भूस्खलन वाहनों की आवाजाही के दौरान इस धूल को और बढ़ाते हैं।
विज्ञान का सीधा-सा नियम है कि स्वच्छ, सफेद बर्फ  सूर्य के विकिरण का लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है, जिसे अल्बीडो प्रभाव कहा जाता है। लेकिन जब इसी बर्फ  की सतह पर धूल, डीज़ल वाहनों की कालिख या निर्माण कार्यों से उड़ने वाला ब्लैक कार्बन जम जाता है तो बर्फ  का परावर्तन गुण तेज़ी से कम हो जाता है। गहरे रंग की यह परत सूर्य की अधिक ऊष्मा को अवशोषित करने लगती है, जिससे बर्फ  के पिघलने की गति सामान्य से 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक हो जाती है। लद्दाख जैसे शीत मरुस्थल की वहन क्षमता अत्यंत सीमित है, लेकिन वहां प्रतिवर्ष लगभग 5.5 से 6 लाख पर्यटक पहुंच रहे हैं जबकि वहां की स्थायी आबादी मात्र तीन लाख के आसपास है। पर्यटन के चरम मौसम में प्रतिदिन हज़ारों डीज़ल वाहन संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुंचते हैं, जिससे न केवल ठोस कचरे और प्लास्टिक का संकट बढ़ा है, बल्कि जल स्रोतों पर भी अभूतपूर्व दबाव पड़ रहा है।
 (अदिति फीचर्स)

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