क्या हैं देश की वास्तविकताएं ?
भारत में कदाचित संसार में से सबसे अधिक धर्मस्थल होंगे। धर्म और धार्मिक मान्यताएं तथा परंपराएं भी अनगिनत हैं लेकिन अंधविश्वास, प्रपंच और आस्था की तिगड़ी का ऐसा त्रिकोण बनता है कि लोगों को अपना भावनात्मक और आर्थिक शोषण न तो दिखाई देता है और न ही कोई मायने रखता है ।
खिलवाड़
भारत लगभग साढ़े सात लाख गांवों, साढ़े छह सौ ज़िलों और आठ हज़ार शहरों का देश है, जहां तकरीबन पचास लाख मंदिर, 8 लाख मस्जिद, बारह हज़ार गुरुद्वारे और दस हज़ार से अधिक गिरिजाघर होंगे। यहां हर गली में मंदिर घंटी बजती है, हर चौराहे पर अजान होती है। यीशु की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं, पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ कानों में गूंजता है। मतलब यह कि आस्था हमारी सांसों में बसती है, श्रद्धा हमारी दिनचर्या का अंग और घोर संकट या साधारण परेशानी के लिए या बीमारी में सबसे पहले अपने आराध्य की शरण में जाते हैं और किसी से भी अधिक उस पर विश्वास करते हैं।
जो इनकी देखरेख करते हैं, वे भी सत्तर से सौ लाख तो होंगे ही, लेकिन अधिकतर कम पढ़े लिखे और कुछेक ही शिक्षित होंगे। इनका और इनकी बात का असर इतना है कि ग्रहों की चाल बताने और भविष्य का लेखा-जोखा करने में इन्हें सबसे अधिक निपुण माना जाता है। किसी अवसर या अनुष्ठान या जन्म और विवाह से लेकर अंतिम संस्कार तक इनकी ही तूती बोलती है और इनकी प्रत्येक बात अकाट्य होती है। शुभ मुहूर्त निकलवाया तो ये ज्यादातर अपनी सुविधा के हिसाब से जोड़-घटा करने के बाद ऐसा समय और तारीख़ बताते हैं कि चाहे आपकी कितनी भी व्यस्तता या मजबूरी हो, इनकी ही बात मानी जाती है। अगर आनाकानी की तो विघ्न बाधाएं और अनहोनी की आशंका से हारना ही पड़ेगा।
अब एक उदाहरण देखिए। नोएडा, जो कभी गांव था, वहां पेड़ पौधे थे। जब विकास हुआ और शहर स्थापित होने लगा तो सड़कें भी बनीं। सेक्टर 28 के पास एक पीपल का पेड़ था। सड़क जब बनी तो यह बीच में आ गया। किसी चतुर ने इसकी जड़ों के पास चबूतरा बना दिया और एक मूर्ति तथा फूल माला डाल दी। आज तक किसी अधिकारी या नेता की हिम्मत नहीं हुई कि इसे वहां से हटा सकें, चाहे कितने भी बड़े हादसे हो जाएं। ऐसे न जाने कितने मंदिर, दरगाह, मस्जिद और चर्च हैं जो यातायात व्यवस्था को झुका सकते हैं, लेकिन उन्हें हटाना टेढ़ी खीर है। छतरपुर में शनिधाम का मालिक ढोंगी बाबा कानून को धता बताकर कितनों की अस्मत और धन लूटने में कामयाब रहा क्योंक किसी भी पूजा स्थल में इस तरह की वारदात मामूली मानी जाती है। गांवों में जो एक-दो पुजारी होते हैं, उनका खर्चा चढ़ावे या कहीं से खाने-पीने की सामग्री आ जाए या बस ऐसे ही कोई दे दे, उससे चलता है। भजन करना मुख्य कार्य है। अजीब बात है कि तिरुपति में एक दिन का एक करोड़ और गांव में नाममात्र चढ़ावा चढ़ता है।
विडम्बना
अब हम इस बात पर आते हैं कि इस सब के सामने शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति क्या है और क्या हमारे विकास का संतुलन बिगड़ गया है? स्कूल लगभग 15 लाख होंगे और दो लाख स्वास्थ्य केंद्र। अस्पताल भी दो हज़ार होंगे। हर गांव में 5-6 धर्मस्थल मिल जाएंगे, पर डॉक्टर के लिए 20 गांव का चक्कर लगाना पड़ेगा। हर एक स्कूल की तुलना में 2.5 धर्मस्थल हैं। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि धर्मस्थलों का होना गलत है। कोरोना और बाढ़ में सबसे पहले लंगर, भंडारा और कंबल धर्मस्थलों से ही निकलते हैं। संकट में ये समाज की रीढ़ बनते हैं। असली समस्या ‘संतुलन’ की है। इसके अतिरिक्त धर्म के लबादे में छिपे भेड़ियों की पहचान करने की कोई व्यवस्था नहीं है। इनकी पहचान करके कानून के दायरे में लाने की ज़रूरत है।
सच का सामना यह कि ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में 30-35 हज़ार सरकारी डॉक्टर। नतीजा—बुखार आए तो पहले ओझा, झोलाछाप और फिर डॉक्टर की बारी आती है। शिक्षा का आलम यह कि शहरों में स्मार्ट क्लास और गांव में एक चौथाई स्कूलों के पास अपना भवन भी नहीं, जो खाली मकान मिले उनमें सरपंच या मुखिया ने स्कूल खोल दिया क्योंकि सरकार चाहती है कि सर्व शिक्षा अभियान कामयाब हो। अक्सर ताला लगे इन शिक्षा मंदिरों के दरवाज़े तब ही खुलते हैं जब कोई नेता वहां भाषण देने जाता है और बच्चे तब आते हैं जब मिड-डे-मील बांटना होता है।
अध्यापक कभी-कभी आते हैं और विद्यार्थी उपलब्ध नहीं होते। नतीजा यह कि 10वीं पास बच्चा नौकरी के लिए शहर भागता है। सरकारी स्कूल, अस्पताल का बजट आता है, परन्तु दवा और अध्यापक की कौन कहे, बताया पता या स्थान ही नदारद रहते हैं। परिणाम यह कि निजी स्कूल तथा ट्यूशन पढ़ाने वालों और बिना डिग्री डॉक्टरों की बल्ले-बल्ले। सरकार ने हेल्थ सेंटर और स्कूल बनाए, परन्तु स्टाफ और रख-रखाव पर ध्यान नहीं दिया।
क्या भूलें और क्या कहें?
हमने आस्था को ज़िंदा रखा, परन्तु सवाल पूछना बंद कर दिया। पूजा या इबादत के लिए जगह सबसे ज्यादा है, परन्तु शिक्षा और इलाज के लिए सबसे कम। भूल गए कि धर्मस्थल हमें स्वर्ग, जन्नत या बहिश्त का रास्ता दिखाते हैं, स्कूल दुनिया में चलना और चिकित्सालय सेहतमंद रहना सिखाते हैं। सरकारों की हालत यह कि कोई ‘गरीबी हटाने’ के नाम पर बनती है तो दूसरी ‘आओ स्कूल चलो’ के नारे से सत्ता में आती है और तीसरी मंदिर बनने की उम्मीद पर काबिज़ हो जाती है। निकम्मेपन और निठल्लेपन की हद तब होती है जब पांच साल बाद इनसे लेखा-जोखा तलब किया जाए तो यह उसकी आवाज़ खामोश करने के लिए मुफ्त की सुविधाएं (रेवड़ियां) देकर मुंह बंद करवा देते हैं। इन्हें कौन समझाए, ये जागते हुए सोने का नाटक करते हैं और अंधेरों को उजाले में बदलने की मुफ्त की सुविधाओं की रिश्वत देकर ऐसा खेल रचते हैं कि दुनिया में कोई भी इनका मुकाबला नहीं कर सकता। पीठ में छुरा घोपने को राजनीतिक सबक समझने वालों के लिए चाहे अन्ना हज़ारे व सोनम वांगजुक के अनशन या बलिदान का कोई अर्थ नहीं रह गया है। चील, कौवे और गिद्ध ताक लगाये बैठे हैं कि कब उन्हें अपने मनपसंद भोजन के लिए नीचे उतरना है। इसलिए स्वयम् सिद्ध होना होगा।



