जारी है शिक्षा के साथ प्रयोग का खेल
भारत में नई शिक्षा नीति आए हुए 6 साल हो गए हैं, लेकिन शिक्षा और परीक्षाओं के साथ प्रयोग का दौर समाप्त नहीं हुआ है। नई शिक्षा नीति के साथ-साथ सरकार ने एक प्रयोग ‘एक देश-एक परीक्षा संस्थान’ का किया था। इसके तहत नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) का गठन किया गया। मेडिकल और इंजीनियरिंग में दाखिले से लेकर कई अन्य परीक्षाओं की ज़िम्मेदारी इसके ऊपर डाल दी गई। बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह संस्था अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करने में बहुत कामयाब नहीं रही है। बहरहाल, सरकार के प्रयोगों की बात हो रही है। इस साल नीट-यूजी की परीक्षा के पेपर लीक हुए तो दोबारा हुई परीक्षा में प्रयोग के तौर पर सेना को शामिल किया गया। अब कहा जा रहा है कि अगले साल परीक्षा छह दिन में होगी और कंप्यूटर आधारित होगी। इसी तरह सरकार ने तय किया था कि देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाखिला 12वीं के अंकों के आधार पर नहीं होगा, बल्कि सेल यूनिवर्सिटी एंट्रेस टैस्ट (सीयूईटी) देना होगा। इसमें कई तरह की गड़बड़ियां सामने आईं तो अब कहा जा रहा है कि अगले साल 50 फीसदी ‘वेटेज’ 12वीं के अंक को भी दिया जाएगा। दाखिले से लेकर नौकरी तक के लिए प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र दुविधा में रहते हैं कि पता नहीं परीक्षा से पहले या बाद में सरकार कौन-सा नया नियम लागू कर दे।
जनता के साथ धोखाधड़ी
मुफ्त की सेवाएं और जनता के खाते में नकद ट्रांसफर राजनीतिक दलों के लिए चुनाव जीतने का पक्का फार्मूला है। इसलिए चुनाव के समय पार्टियां अनेक वायदा करती हैं, लेकिन सबको पता है कि इस तरह की योजनाओं के कारण राज्यों की वित्तीय स्थिति खराब हो रही है, जिसकी वजह से राज्यों में वेतन, पेंशन देने में मुश्किल आ रही है और विकास की योजनाएं सीमित होती जा रही हैं। ऐसी स्थिति में राज्य सरकारों ने चुनाव के समय घोषित मुफ्त की योजनाओं के वित्तीय असर को कम करने का नया तरीका निकाल लिया है। चुनाव के समय की घोषित की गई योजनाओं में ऐसी शर्तें जोड़ दी जा रही हैं, जो उस समय नहीं बताई गई थीं। इन शर्तों के ज़रिये लाभार्थियों की संख्या कम की जा रही है ताकि वित्तीय बोझ कम पड़े। महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद डेढ़ साल के अंदर माझी लाड़की बहिन योजना के लाभार्थियों की संख्या 90 लाख कम कर दी गई है। महाराष्ट्र सरकार का खर्च इस योजना से 46 हज़ार करोड़ रुपये से 20 हज़ार करोड़ रुपये कम हो सकता है। मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ है। दिल्ली में तो सरकार ने यह योजना अभी शुरू ही नहीं की। अगले महीने योजना शुरू हो सकती है, लेकिन उससे पहले इतनी शर्तें लगा दी गईं कि इस योजना की लाभार्थी महिलाओं की संख्या सिर्फ 22 लाख रह जाएगी।
राम मंदिर के सीईओ का चयन
अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में करोडों रुपये की चढ़ावा चोरी के बाद चढ़ावे की गिनती और मंदिर के प्रबंधन की नई व्यवस्था बनाई जानी है। नई व्यवस्था के तहत मंदिर में एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति की जाएगी। सीईओ का चयन करने के लिए सेवामुक्त जज जस्टिस प्रमोद कोहली की अध्यक्षता में तीन लोगों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति की पहली बैठक में सीईओ की नियुक्ति के लिए कुछ नियम तय किए गए हैं। सीईओ के लिए समिति आवेदन मांगे हैं। शर्तों को पूरा करने वाला कोई भी व्यक्ति 18 जुलाई तक आवेदन कर सकता है। सीईओ के लिए शर्तें हैं—ग्रेजुएट होना चाहिए और 20 साल प्रबंधन व वित्त के क्षेत्र में काम करने का अनुभव होना चाहिए। धार्मिक संस्थाओं में काम करने का अनुभव हो तो प्राथमिकता दी जाएगी। दूसरी शर्त यह है कि प्रैक्टिसिंग वैष्णव हो, रामभक्त हो। अब सवाल है कि इस तरह के अनुभव वाले अगर हज़ारों लोगों ने आवेदन कर दिया तो क्या होगा? समिति के पास अपना कोई सिस्टम तो है नहीं कि वह आवेदन करने वाले का पृष्ठभूमि चेक कराए। फिर इस तरह से आवेदन मंगाने का क्या मतलब है? क्या यह सिर्फ दिखावा नहीं है? क्योंकि अगर हज़ारों आवेदन आए तो उनकी छंटनी और पृष्ठभूमि चेक करने में बहुत समय लगेगा। जानकारों का कहना है कि बनना तो आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के ही किसी आदमी को है, जिसकी सिफारिश उनकी ओर से की जाएगी। लेकिन उससे पहले दिखावा करना भी ज़रूरी है।
सरकार का हाथ, कंपनियों के साथ
लोकतंत्र में सरकार की प्राथमिक ज़िम्मेदारी जनता के प्रति होती है। सरकार का काम जनता की समस्याओं को दूर करना होता है, लेकिन पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण के मामले में सरकार जनता की बजाय ऑटोमोबाइल कंपनियों के साथ खड़ी दिख रही है। कंपनियां भी सरकार का खुल कर समर्थन कर रही हैं। दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों में से एक टोयोटा ने देश के प्रसिद्ध इन्फ्लूएंसर मनीष कश्यप के खिलाफ मुकद्दमा दर्ज कराया है। हैरानी की बात है कि अक्सर नागरिक कंपनियों के खिलाफ मुकद्दमा दर्ज कराते हैं, लेकिन यहां सब उलटा हो रहा है। गाड़ी के इंजन में गड़बड़ी आने की शिकायत करने पर कंपनी ने शिकायत करने वाले मनीष पर मुकद्दमा दर्ज किया है। यह भी हैरानी की बात है कि शिकायत करने वाले मनीष कश्यप ने टोयाटा की कार में गड़बड़ी नहीं बताई है। उन्होंने दावा किया है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से इंजन में पानी पहुंचने से इंजन में गड़बड़ी आ जाती है। उन्होंने कहा कि उनकी कार सिर्फ 12 हज़ार किलोमीटर चलने पर ही खराब हो गई है। वह इस गड़बड़ी का पूरा ठीकरा एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर फोड़ रहे हैं, लेकिन मुकद्दमा टोयोटा ने कराया है। सरकार कह रही है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से इंजन में कोई गड़बड़ी नहीं आ रही है। फिर भी यह मुकद्दमा तो अजीब ही है। उपभोक्ता अगर किसी उत्पाद की शिकायत कर रहा है तो उसकी जांच कराने की बजाय उसके ऊपर मुकद्दमा करना नए भारत का चलन है।
दक्षिण के मुख्यमंत्रियों का दोस्ताना
उत्तर भारत में आम तौर पर मुख्यमंत्रियों के बीच सद्भाव और दोस्ती दिखाई नहीं देती। दक्षिण भारत में इसका उलटा होता है। वहां परस्पर विरोधी पार्टी के मुख्यमंत्रियों में भी पूरा सद्भाव और भाईचारा दिखाई देता है। वे सार्वजनिक जगहों पर भी एक-दूसरे की तारीफ करते हैं। हाल ही में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के मुख्यमंत्री एक मंच पर थे। वहां तीनों ने एक-दूसरे की जम कर तारीफ की। तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की पार्टी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का घटक है। फिर भी नायडू ने रेवंत रेड्डी और डी.के. शिवकुमार दोनों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि शिवकुमार ने इतने कम समय में जो काम किया है, वह कमाल का है। उन्होंने रेवंत रेड्डी के लिए कहा कि वह अपने राज्य के लोगों के हितों से कभी समझौता नहीं करते हैं। कांग्रेस के दोनों मुख्यमंत्रियों ने भी नायडू की जम कर तारीफ की। तमिलनाडु के नए बने मुख्यमंत्री विजय के प्रति भी कांग्रेस के साथ-साथ चंद्रबाबू नायडू का रुख भी काफी सद्भाव वाला है।





