यूरिया खाद हेतु नई राष्ट्रीय नीति
केन्द्रीय मंत्रिमंडल की ओर से यूरिया खाद-2026 के लिए राष्ट्रीय निवेश नीति को मंजूरी दे दिये जाने से जहां एक ओर देश में यूरिया खाद की प्रचुरता में उपलब्धता संभव हो सकेगी, वहीं विदेशी खाद हेतु किसान एजेंसियों और खाद आयातकों को दी जाने वाली अरबों रुपये की सब्सिडी के बोझ से छुटकारा मिलने की सम्भावनाएं भी उजागर होंगी। इसके साथ ही देश भर में इस संबंधी घोषित करोड़ों रुपये की अनेक अन्य परियोजनाओं के पूर्ण होने की आशाएं भी बंधते दिखाई देती हैं। यह फैसला विगत दिवस सम्पन्न हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की उस बैठक में पारित किया गया जिसमें 2 लाख 19 हज़ार करोड़ रुपये की सात अन्य बड़ी परियोजनाओं को भी एक साथ मंजूरी दी गई। इस बैठक के अन्तर्गत राष्ट्रीय धरातल पर एक बड़े अहम फैसले के दौरान कृषि खाद विभाग के एक प्रस्ताव को मंजूरी दी गई जिसमें गैस आधारित खाद निर्माण प्लाटों को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जाएगा। इस परियोजना के अन्तर्गत खाद प्लांटों हेतु नई निवेश योजनाओं को प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।
नि:संदेह इस फैसले के तहत एक ओर जहां कृषि कार्यों और विशेषकर खाद उत्पादन संबंधी अनेक परियोजनाओं पर कार्य शुरू हो सकेगा, वहीं खाद को लेकर देश की कृषि में आत्म-निर्भरता का एहसास बढ़ेगा। इसके अतिरिक्त देश और खासकर ग्रामीण एवं कृषि आधारित क्षेत्र में रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे। इस कारण ग्रामीण भारत में उन्नति, प्रगति और समृद्धि के एक नये युग की शुरुआत हो सकेगी। देश में यूरिया की प्रचुरता में उपलब्धता के दृष्टिगत खाद का आयात कम होने से अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी। देश में प्रत्येक वर्ष लगभग 4 करोड़ टन यूरिया की खपत होती है जिसमें से एक करोड़ टन यूरिया खाद को आयात करना पड़ता है। ताज़ा घोषणा में नई नीतियों को अधिक पारदर्शी बनाये जाने पर भी ज़ोर दिया गया है। इस पारदर्शिता के तहत पूंजी निवेश को प्राथमिकता के तौर पर इस प्रकार बढ़ाया जाएगा कि धीरे-धीरे विदेशी मुद्रा के जोखिम को यथासंभव कम किया जा सके। नई नीति से प्रत्येक यूरिया प्लांट पर लागत खर्च और आय का अनुमान इस प्रकार तय किया जाएगा कि 250 करोड़ रुपये की बचत तय की जा सके। नई नीति के तहत 6 नये यूरिया खाद प्लांट स्थापित किये जाने की योजना है। इससे पूर्व 33 यूरिया इकाइयां निरन्तर खाद का उत्पादन कर रही हैं। इनकी कुल उत्पादन क्षमता 260.90 लाख टन आंकी गई है। इस प्रकार देश के कुल यूरिया उत्पादन और कुल खपत में अभी भी बड़ा अन्तर रह जाता है। संभवत: इसी अन्तर को खत्म करने के लिए इस नई नीति की घोषणा की गई है।
देश में यूरिया खाद के निर्माण और इसकी खपत को बढ़ावा देने के लिए पहली यूरिया खाद नीति 2012 में बनाई गई थी जबकि अब 2026 में इसे बढ़ावा देने और इसके आयात को यथासंभव कम करने के उद्देश्य से नई यूरिया नीति बनाई गई है। भारत में अन्य कृषि-प्रधान देशों की अपेक्षा यूरिया पर निर्भरता अधिक पाई जाती है। देश में जैविक खादों से उत्पादित खाद्यान्न पदार्थों का रुझान भी अधिक पाया जाता है। देश में खादों का उत्पादन बढ़ाये जाने हेतु देसी प्लांटों की योजनाएं भी खूब बनी हैं, किन्तु प्राय: देश में यूरिया खाद की खपत और मांग के बीच एक बड़ा अन्तर हमेशा बना रहा है। आज भी यूरिया खाद के इस अन्तराल को भरने के लिए 26 प्रतिशत यूरिया को आयात करना पड़ता है। इस हेतु असम के कामरूप और ब्रह्मपुत्र घाटी में भी यूरिया प्लांटों को लगाये जाने की मंजूरी दी गई है।
नि:संदेह इस नई नीति की घोषणा संभवत: इसीलिए की गई है ताकि एक ओर जहां मांग और उत्पादन के इस अन्तर को पाटा जा सके, वहीं खाद का सुरक्षित भण्डार भी बनाया जा सके। इससे एक ओर जहां विदेशी मुद्रा की बचत होगी, वहीं इसके आयात हेतु दी जाने वाली सब्सिडी का अरबों रुपया बचाया जा सके। हम समझते हैं कि देसी यूरिया खाद प्लांटों के उत्पादन के उपयोग से देश के कृषि उत्पादन में भी वृद्धि होने की बड़ी सम्भावना है। तथापि, हम समझते हैं कि इस नई नीति-योजना का लाभ तभी संभव हो सकेगा, जब इस पर तत्काल रूप से क्रियान्वयन संभव हो सके। यह भी, कि इस अमल में पारदर्शिता और प्रतिबद्धता का सुमेल भी इसी तर्ज पर होना चाहिए।

