कश्मीर में धर्म पूछ कर किया गया लक्षित आतंकी हमला

जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में ईंट-भट्टे पर काम करने वाले दो हिंदू मजदूरों की आतंकियों ने नाम व धर्म पूछ कर हत्या की। इस हमले से 15 माह पहले पहलगाम में धर्म पूछकर 26 पर्यटकों की हत्याओं की गई थी। गया। कुलगाम में मारे गए दोनों प्रवासी श्रमिक छत्तीसगढ़ के थे। इनके नाम भूपेंद्र भैना और दीपक रात्रे थे। ये बीते नौ माह से यहां काम कर रहे थे। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर के मुखौटा संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) ने ली है। साथ ही आगे और भी हमलों की धमकी देकर बर्बर हत्यारे नो दो ग्यारह हो गए। सुरक्षाबल इनकी तलाश में लगे हुए हैं। इस हमले ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि तमाम कोशिशों के बावजूद आतंकवाद बेलगाम क्यों दिखता है? जबकि पहलगाम में हुए हमले के बाद सेना ने ऑपरेशन सिंदूर अभियान चलाकर पाकिस्तान को करारा सबक सिखाया था। यहां तक कि पाकिस्तान ने शरणागत की मुद्रा में आकर भारत के समक्ष घुटने टेक दिए थे लेकिन उसका आतंकी जहर अभी उतरा नहीं है। 
पाकिस्तान धर्म की घुट्टी पिलाकर 35 साल से भारत पर आतंकी हमले करता रहा है उसे सबसे मुकम्मल उत्तर ऑपरेशन सिंदूर के जरिए दिया गया था लेकिन कुत्ते की पूंछ की तरह पाक की पूंछ टेढ़ी ही बनी हुई है। गैर-कश्मीरियों और हिंदुओं की हत्या के लिए उसकी क्रूरता समाप्त नहीं हो रही है। जाहिर है, पाकिस्तान भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर रूपी बदले को भूल गया है। उसे एक बार फिर करारा जवाब देना होगा। दरअसल इस समय पाकिस्तान अपने कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में चल रहे आज़ादी के आंदोलन से भी जूझ रहा है। वहां भी उसने निर्ममता बरतते हुए 40 प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भूनने का काम हाल ही में किया है। पाक की ये हरकतें इसलिए भी बरकरार हैं, क्योंकि ईरान हमले में उलझा अमरीका उसकी पीठ थपथपाने में लगा है। ऐसे में भारत को अनेक कूटनीतिक कदम उठाकर पाकिस्तान को विवश करना होगा अन्यथा वह आतंकियों को कश्मीर की धरती पर भेजकर हिंसा की इबारतें लिखता रहेगा। कुलगाम की घटना यह भी इंगित कर रही है कि घाटी में आतंकियों को पनाह एवं सूचनाएं स्थानीय लोगों से मिल रही हैं। अतएव आतंकियों को शरण देने वाले कश्मीर वासियों की खबर लेने की भी ज़रूरत है अन्यथा मजहब के आधार पर हिंदुओं की हत्या का सिलसिला बना रहेगा।  
याद रहे पहलगाम हमले की जिम्मेदारी भी टीआरएफ ने ली थी। यह लश्कर-ए-तैयबा का ही एक मुखौटा संगठन है, जो लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों की आतंकी हरकतों को ही अंजाम देता है। भारतीय सेना ने कोटली अब्बास में जिन आतंकी शिविरों को तबाह किया किया था, इनमें 1500 आतंकियों को प्रशिक्षण दिया गया था। मुरीदके में जिस मरकज तैयबा को ध्वस्त किया गया था, यहां लश्कर का मुख्यालय माना जाता है। यहीं से मुंबई हमले का प्रमुख आतंकी अजमल कसाब ने प्रशिक्षण लिया था। इस जवाबी कार्यवाही के बाद भारत की कूटनीति अत्यंत सफल दिखाई दी थी, क्योंकि भारत का तत्काल अमरीका, रूस और जापान ने खुलकर समर्थन किया था। यह समर्थन मोदी ने वैश्विक आतंकवाद से लड़ने के लिए से जो मुहिम चलाई हुई है, उसका परिणाम था। अतएव इसमें कोई दो राय नहीं कि सीमापार स्थित ठिकानों से आतंकी गतिविधियां संचालित करने वाले संगठनों के खिलाफ सेना और सुरक्षाबलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह स्थिति बनी रहे, इस हेतु सेना लगातार अपनी रणनीति में गोपनीय परिवर्तन करते हुए आतंक के विरुद्ध मोर्चा संभाले हुए है। इसी का नतीजा है कि आतंकी हमलों में लगातार कमी आई है। बावजूद पहलगाम और कुलगाम जैसे लक्षित हमले किए जा रहे हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान इस आतंक के छद्म युद्ध के बहाने अपनी क्रूरता जताता रहता है। कश्मीर में आतंक बने रहने का एक कारण यह भी है कि आतंकियों को मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम होने के कारण संरक्षण आसानी से मिल जाता है। यही कारण है कि रुक-रुककर आतंकी बिना किसी शोर-शराबे के मुस्लिम आबादी के बीच घुसपैठ करके हिंदुओं के विरुद्ध लक्षित हिंसा को परिणाम में बदलने में सफल हो जाते है। ऐसे हमलों में निर्दोष लोग ही मारे जाते हैं। 
अनुच्छेद-370 हटने के बाद भी हालातों में सुधार नहीं हो पा रहा है, तो इसका एक बड़ा कारण मजहबी कट्टरता पर चोट नहीं कर पाना है। साफ है कि यह समस्या अब राजनीतिक व संवैधानिक नहीं रह गई है, बल्कि अब धार्मिक चरमपंथ के रूप में सामने आ रही है। इस हिंसक उन्माद की सोच पाकिस्तान से निर्यात आतंकवाद तो है ही, घाटी में कुकुरमुत्तों की तरह फैला, वह शिक्षा का तंत्र भी है, जो आतंक की फसल बोने और उगाने का काम करता है। यही वजह है कि जितने भी इस्लामिक देश हैं, उनमें न तो अल्पसंख्यकों का जनसंख्यात्मक घनत्व बढ़ रहा है और न ही उन्हें नागरिक समानता के अधिकार मिल रहे हैं। कश्मीर में भी जिहादी चाहते हैं कि गैर-मुस्लिम या तो इस्लाम स्वीकार करें या फिर घाटी छोड़ जाएं। मुस्लिमों की इस दोषपूर्ण मंशा को संविधान निर्माण के समय ही डॉ. भीमराव अंबेडकर ने समझ लिया था। शेख अब्दुल्ला ने जब जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की मांग की तो अंबेडकर ने सख्त लहजे में कहा था कि ‘आप चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, कश्मीरियों की आर्थिक सुरक्षा करे, कश्मीरियों को संपूर्ण भारत में समानता का अधिकार मिले, लेकिन भारत और अन्य भारतीयों को आप कश्मीर में कोई अधिकार देना नहीं चाहते? मैं देश का कानून मंत्री हूं और मैं अपने देश के साथ कोई अन्याय या विश्वासघात किसी भी हालत में नहीं कर सकता हूं।’ विडंबना देखिए कि मुस्लिम समाज देश में हर जगह बृहद हिंदू समाज के बीच अपने को सुरक्षित पाता है, किन्तु जहां कहीं भी हिंदू अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच रह रहे हैं, उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। 

#कश्मीर में धर्म पूछ कर किया गया लक्षित आतंकी हमला