23वें कॉमनवेल्थ गेम्स : इस बार बेटियों ने लिखा गोल्डन चैप्टर
23वें कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के प्रदर्शन का सबसे चमकदार पहलू केवल पदकों की संख्या नहीं रही बल्कि वह संदेश रहा, जो भारतीय बेटियों ने पूरी दुनिया को दिया। भारत ने जितने स्वर्ण पदक जीते, उनमें 61 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान बेटियों का रहा। भारत ने इन खेलों में कुल 13 गोल्ड मेडल जीते, जिनमें से 8 गोल्ड मेडल लड़कियों के खाते में रहे। ग्लासगो में 11 दिन तक चले कॉमनवेल्थ गेम्स में इस बार हम 39 मेडल जीते, जिनमें 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और 9 ब्रांज रहे। इस तरह भारत पदक तालिका में चैथे नंबर पर रहा। तीसरे नंबर पर कनाडा, दूसरे नंबर पर इंग्लैंड और पहले नंबर पर ऑस्ट्रेलिया रहा। पदकों की संख्या के लिहाज से भले भारत के खाते में सम्पूर्णता के लिहाज से यह बड़ा प्रदर्शन न हो, लेकिन तब यह बहुत ऐतिहासिक बन जाता है, जब 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 10 खेल शामिल रहे हों और वे तमाम खेल इसका हिस्सा न रहे हों, जिनमें हमारी स्थिति हमेशा बेहतर रहती है। जैसे- कुश्ती, बैडमिंटन और क्रिकेट। भारत ने चौथे स्थान पर आकर किस तरह चमकदार प्रदर्शन किया है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमारे 69 प्रतिशत मेडल कुल तीन खेलों में आये हैं- बॉक्सिंग में 10, एथलेटिक्स में 9 और वेटलिफ्टिंग में हमें 8 पदक मिले हैं।
पिछले बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में हमने 22 गोल्ड समेत कुल 61 मेडल जीते थे, लेकिन तब प्रतियोगिता में शामिल कुल खेलों की संख्या 16 थी और इस बार सिर्फ 10। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस बार हमारी सफलता कितनी खास थी। 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स शुरु होने के पहले भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों की इंटर्नल रिपोर्ट में भारत को 6 गोल्ड सहित कुल 31 मेडल मिलने का अनुमान लगाया गया था। इस तरह देखें तो भारतीय खिलाड़ियों ने अनुमान से दोगुना ज्यादा गोल्ड जीते और इस ऐतिहासिक प्रदर्शन का दरोमदार भारतीय महिला खिलाड़ी रहीं। भारत को सबसे ज्यादा उम्मीदें बॉक्सिंग और वेटलिफ्टिंग से थीं और वास्तव में इन्हीं दो खेलों ने भारत की झोली पदकों से भर दी। बॉक्सिंग तो इन खेलों में भारत का सबसे चमकदार खेल बनकर उभरा, जहां 14 मुक्केबाजों के दल में से 10 खिलाड़ी मेडल जीतकर लौटे और इसमें भी 7 गोल्ड मेडल और 3 सिल्वर मेडल रहे यानी मेडल कन्वर्जन रेट 71 प्रतिशत रहा। जबकि बर्मिंघम में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत ही था। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हमने बॉक्सिंग में जो 7 गोल्ड मेडल जीतें, उनमें 5 मेडल महिला खिलाड़ियों ने जीते।
प्रीति पवार ने 54 किलो श्रेणी में, जैस्मिन लांबोरिया 57 किलो श्रेणी में, साक्षी चौधरी 51 किलो श्रेणी में, प्रिया घंघास 60 किलो श्रेणी में और अरुंधति चौधरी ने 70 किलो श्रेणी में गोल्ड मेडल जीते। जबकि दो गोल्ड मेडल पुरुष खिलाड़ियों ने जीते, सचिन सिवाच 60 किलो श्रेणी में और अंकुश पंघाल 80 किलो श्रेणी में। इनके अलावा महिलाओं में लवलीना बोरगेहन ने 75 किलो श्रेणी में सिल्वर पदक, जबकि पुरुषों में जादूमणि सिंह ने 55 किलो श्रेणी और नरेंद्र बेरवाल ने 90 किलो से ज्यादा की कैटेगिरी में सिल्वर पदक जीते। इस मेडल टेली में चमकती भारतीय महिला खिलाड़ियों ने दुनिया को दिखा दिया है कि जैसे-जैसे भारत में सामाजिक बदलाव करवट ले रहा है, वैसे-वैसे भारत खेल के नक्शे में जो एक ताकत बनकर उभर रहा है, उसके केन्द्र में भारतीय बेटियां हैं। याद रखिए भारतीय बेटियों ने यह उपलब्धि यूं ही नहीं हासिल किया, इसके लिए उन्होंने परिवार, समाज, परिस्थितियों और संसाधनों से जबर्दस्त संघर्ष करके आगे बढ़ी हैं।
23वें कॉमनवेल्थ गेम्स में महिलाओं की यह सफलता हमें याद दिलाती है कि अगर उन्हें अवसर, संसाधन और भरोसा मिले तो वह केवल पुरुषों की बराबरी ही नहीं करती बल्कि अधिकतर बार अपेक्षाओं से कहीं आगे निकल जाती हैं। भारत में खेलों के इतिहास को देखें तो अभी डेढ़-दो दशक पहले तक हमेशा पुरुषों का वर्चस्व रहा है। हर खेल में पुरुष खिलाड़ियों का दबदबा रहा है लेकिन इसका मतलब लड़कियों में प्रतिभा का न होना नहीं था बल्कि भारतीय समाज में अवसरों के असमान वितरण के कारण ऐसा था। गांवों, कस्बों में आज भी अवसरों का असमान वितरण है। यहां आज भी प्रतिभाशाली लड़कियां केवल इसलिए खेल छोड़ देती हैं, क्योंकि परिवार उन्हें बाहर भेजने से डरता है। प्रशिक्षण केंद्र दूर हैं, महिला कोच नहीं हैं या आर्थिक स्थिति साथ नहीं देती। ऐसे माहौल में जो बेटियां राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती हैं, उनकी उपलब्धियों का ईमानदारी से आंकलन करें तो वह पुरुष खिलाड़ियों से कई गुना ज्यादा बड़ी होती हैं।
भारत के खेल परिदृश्य में महिलाओं की ध्यान आकर्षित करने वाली उपस्थिति पिछले डेढ़ दशक में बनी है, जब बैडमिंटन में सानिया नेहवाल और पीवी सिंधू, मुक्केबाजी में मैरी कॉम, कुश्ती में साक्षी मलिक और विनेश फोगाट भारत्तोलन में मीरा बाई चानू व एथलेटिक्स में कई उभरती महिला धाविकाओं ने चमकदार प्रदर्शन दिखाना शुरु किया।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स में महिलाओं की इस शानदार सफलता को सिर्फ तालियां बजाकर स्वागत भर न करें बल्कि उसे नीति निर्माण का आधार बनाएं। भारत यदि वास्तव में खेल महाशक्ति बनना चाहता है, तो महिला खिलाड़ियों को केंद्र में रखकर नई रणनीति तैयार करनी होगी। इसके लिए उन्हें सुरक्षित वातावरण और आधुनिक खेल सुविधाएं देनी होगी, उनके लिए प्रशिक्षकों और थैरेपिस्टों की संख्या बढ़ानी होगी। स्कूल स्तर पर खेल छात्रवृत्तियों में लड़कियों को विशेष प्राथमिकता देनी होगी और ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को पहचानने के लिए अलग अभियान चलाने होंगे, तभी महिलाओं की यह शानदार सफलता अपना नियमित विस्तार कर सकेगी। विश्व स्तर पर सफलता केवल मेहनत से नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रशिक्षण, खेल मनोविज्ञान, उचित पोषण और आधुनिक तकनीक के संगम से मिलती है। महिला खिलाड़ियों के लिए इन सुविधाओं की समान उपलब्धता करानी होगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



