तेल-गैस को लेकर विदेशी निर्भरता कम करेगा ‘समुद्र मंथन’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने ‘समुद्र मंथन’ नाम की एक बड़ी योजना को मंजूरी दे दी। पूरा नाम है—नेशनल ऑफ  शोर एक्सप्लोरेशन स्कीम। इसके लिए सरकार ने 84,084 करोड़ रुपये का बजट रखा है जो 2030-31 तक खर्च होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी समुद्री तेल-गैस खोज मिशन बताया है। जानकारों के अनुसार इसकी नींव करीब साल भर पहले पड़ी थी, जब प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त, 2025 को लाल किला से इसी तरह के एक आधुनिक समुद्र मंथन का ज़िक्र किया था। तब से लेकर अब तक सरकार लगातार नीतियों में बदलाव करती रही, ताकि जब असली योजना आए तो ज़मीन पहले से तैयार मिले। हर साल भारत लगभग 13 लाख करोड़ सिर्फ  तेल के आयात पर खर्च करता है। यह पैसा हर साल बाहर चला जाता है जबकि अगर देश के भीतर ही तेल और गैस निकल आए तो यही पैसा देश के विकास में लग सकता है।
पेट्रोलियम मंत्रालय की विज्ञप्ति के अनुसार हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि अपनी ऊर्जा की व्यवस्था खुद अपने हाथ में रखना कितना जरूरी है। समुद्र से जुड़ी जो तेल-गैस खोजें होती हैं, उनमें एक अड़चन आती है, वह है समय। किसी भी समुद्री ब्लॉक को खोजने से लेकर वहां से तेल गैस निकलना शुरू होने तक 5 से 10 साल तक का वक्त लग जाता है। इसके अलावा जो पुराने तेल गैस के कुएं पहले से चल रहे हैं, उनका उत्पादन भी हर साल करीब 6 से 7 प्रतिशत घटता जाता है। यानी अगर नई खोज न हो तो देश का उत्पादन धीरे-धीरे कम ही होता जाएगा। इसी वजह से सरकार ने अब खोज को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बना दिया है। जानकारी के अनुसार 2014 के बाद से मोदी सरकार ने कई ऐसे बदलाव किए जिन्होंने इस बड़ी योजना का रास्ता खोला। सबसे पहला बदलाव था—नो गो एरिया को हटाना। पहले भारत के समुद्री क्षेत्र यानी एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन का बड़ा हिस्सा खोज के लिए बंद था। अब उसमें से 99 प्रतिशत से ज्यादा इलाका खोल दिया गया है, जिससे 10 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा समुद्री क्षेत्र पहली बार खोज के लिए उपलब्ध हुआ।
दूसरा बड़ा कदम था कॉन्ट्रैक्ट के तरीके को बदलना। पहले प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट का सिस्टम था, जिसमें कंपनियों को उलझन ज्यादा होती थी। अब उसकी जगह रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट लाया गयाए जो पहले से आसान और साफ -सुथरा है। इसके अलावा 2025 में ऑयल फील्ड्स रेगुलेशन एंड डिवेल्पमेंट संशोधन कानून पास हुआ, जिसने पूरे सेक्टर के कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाया। साथ ही पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस रूल्स 2025 भी लागू हुए, जिससे कारोबार करना आसान हुआ।
इसी प्रकार कार्य योजना को आगे बढ़ाने के लिए समुद्र मंथन योजना को चार मुख्य भागों में बाटा गया है। पहला मुख्य समुद्र के भीतर का डेटा जुटाना, जिस पर 28,534 करोड़ खर्च होंगे। इसमें 12,000 करोड़ 2डी सिस्मिक डेटा जुटाने पर लगेंगे, 12,534 करोड़ 3डी सिस्मिट डेटा और अन्य तकनीकों पर खर्च होंगे और 4000 करोड़ पुराने डेटा को दोबारा प्रोसेस करने और उसमें एआई टूल लगाने पर खर्च होंगे।
दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है समुद्र में खुदाई और वहां से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर जिस पर 55,200 करोड़ खर्च होंगे। इसमें 43,200 करोड़ गहरे पानी के 60 खोजी कुएं खोदने पर लगेंगे। सरकार हर कुएं की खुदाई की लागत का 50 प्रतिशत तक या फिर  675 करोड़, जो भी कम हो, वहन करेगी। 10 हज़ार करोड़ साझा समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर हब बनाने पर खर्च होंगे, ताकि खोज किए गैस और तेल को जल्दी बाज़ार तक पहुंचाया जा सके। बाकी 2000 करोड़ ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज जोन बनाने पर लगेंगे, ताकि इससे जुड़े उपकरण और सेवाएं देश में ही बनें।
तीसरा हिस्सा है मॉनिटरिंग और सपोर्ट का काम, जिसके लिए 300 करोड़ रखे गए हैं। यह पैसा डिजिटल निगरानी, ट्रेनिंग, जागरूकता कार्यक्रम और मीडिया आउटरीच में खर्च होगा। एक गहरे पानी के खोजी कुएं की लागत औसतन 1,192 से 1,430 करोड़ के बीच बैठती है यानी यह बहुत जोखिम भरा और महंगा काम है। इसीलिए सरकार ने इसमें आधे खर्च की ज़िम्मेदारी खुद उठाने का फैसला किया, ताकि निजी कंपनियां भी इसमें उतरने से न घबराएं। जानकारी के अनुसार समुद्र मंथन का पैसा भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों समुद्री तटों पर मौजूद कुछ खास नदी बेसिनों में खुदाई पर लगेगा। 
कृष्णा गोदावरी बेसिन सबसे आगे है। यह इलाका आंध्र प्रदेश के तट पर हैए जहां कृष्णा नदी और गोदावरी नदी दोनों बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। इन्हीं दोनों नदियों के नाम पर इसे केजी बेसिन कहा जाता है। यह इलाका पहले से ही भारत का सबसे बड़ा गैस उत्पादन केंद्र है। बताया जा रहा है कि अंडमान की इस सफलता के बाद ओएनजीसी ने भी अपना अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट शुरू कर दिया है। कंपनी गहरे और अति गहरे पानी में ड्रिलिंग के लिए करीब 1.5 लाख करोड़ का निवेश करने जा रही है। इसके लिए वैश्विक टेंडर निकाले जा चुके हैं और मुंबई में हुई प्री बिड मीटिंग में दुनिया की एक दर्जन बड़ी ड्रिलिंग कंपनियों ने हिस्सा लिया। इस काम में ओएनजीसी ने ब्राज़ील की पेट्रोब्रास, फ्रांस की टोटल एनर्जी और अमरीका की एक्सोनमोबिल जैसी दिग्गज कंपनियों के साथ भी तकनीकी सहयोग किया है। इस पूरे मिशन में एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। सर्वे जहाज़ समुद्र में कई किलोमीटर लंबी केबल छोड़ते हैंए जो नीचे की ओर ध्वनि तरंगें भेजती हैं। ये तरंगें समुद्र तल और उसके नीचे की चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं और जहाज़ पर लगे सेंसर उन्हें रिकॉर्ड करते हैं। इसके बाद सुपर कंप्यूटर की मदद से समुद्र के नीचे की एक साफ  तस्वीर तैयार की जाती है जिससे पता चलता है कि किस जगह तेल गैस हो सकता है।
 (अदिति फीचर्स)

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