गलत के खिलाफ आवाज़ उठाना ही देश हित में है 

आज से 84 वर्ष पहले ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ का संकल्प लिया था और ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। अंग्रेज़ को तो आखिरकार जाना ही पड़ा और हम स्वतंत्र राष्ट्र बने। तब से लेकर अब तक का आकलन और लेखा जोखा करना ज़रूरी है।
इतिहास की बात
ब्रिटिश सरकार ने बहुत-सी चालें चलीं और वे कामयाब भी हुए। धार्मिक एकता को खंड-खंड करना, नागरिकों को आपस में लड़ा कर अपना उल्लू सीधा करना और ऐसी शिक्षा नीति बनाना कि देश के प्रतिभाशाली वहां बसें और यहां उनके जाने के बाद देसी अंग्रेज़ शासन की बागडोर संभाले रहें। कच्चा माल अपने देश ले गए और हमें तथा दूसरे देशों को बेचने के लिये वहा सामान तैयार किया गया। आवागमन का इंतज़ाम किया। रेल, पुल, सड़क का निर्माण और अपनी छवि या यादगार छोड़ने के लिए भवनों, अट्टालिकाओं और देश भर में अनेक मूर्तियां की स्थापना की। यह सब तो वे अपने साथ ले जा नहीं सकते थे, लेकिन अनेक ऐसी बुराइयां और समस्याएं छोड़ गए जिनका निदान करते करते पीढ़ियां बीत गईं पर समाधान नहीं हुआ। शिक्षा नीतियां बनाते रहे, भारतीय न्याय संहिता बनाकर कानून में संशोधन किए और न्याय प्रणाली को सब के लिए सुगम और पारदर्शी बनाने के प्रयास किए। बेरोज़गारी दूर करने और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम चलाए।
 गरीबी उन्मूलन के लिए खातों में नकद रकम पहुंचाई। कोई भूखा न रहे, इसके लिए अनाज, गैस सिलेंडर मुहैया कराए। मतलब यह कि हरेक सरकार ने कुछ जनता के लिए और बहुत कुछ अपने और अपनी पार्टी को मज़बूत करने के लिए किया।
हकीकत
सबसे बड़ी बात यह कि विदेशी आक्रांताओं ने रिश्वतखोरी तथा भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी कीं कि कोई उपाय काम नहीं कर पाया। सिस्टम इतना खोखला हो गया कि पत्ता-पत्ता और बूटा-बूटा इसकी चपेट में आकर पूरे वृक्ष को सड़ाने का काम कर रहा है। उदाहरणस्वरू न्याय सुलभ होता और न्याय में देरी का अर्थ अन्याय होता तो सुप्रीम कोर्ट में 80 हज़ार, हाईकोर्ट में 60 लाख केस और निचली अदालतों में करोड़ों मुकद्दमे लंबित नहीं होते। बहुत से तो दादा से शुरू हुए और पोता तारीख भुगत रहा है। कितने बेकसूर जेल में और कितने दोषी खुले घूम रहे हैं, जगजाहिर है। सवाल है कि 77 साल में जजों की भर्ती क्यों नहीं पूरी हुई, कोर्ट डिजिटल क्यों नहीं और तारीख पर तारीख क्यों?
शिक्षा रसातल में, क्योंकि शिक्षकों के 5 में से 1 पद खाली, डेढ़ लाख स्कूलों में सिर्फ 1 शिक्षक, एक लाख में प्रिंसिपल ही नहीं। 5वीं का 50 प्रतिशत बच्चा दूसरी कक्षा का पैरा नहीं पढ़ पाता। नीलकणि टास्क फोर्स पेपर बचाएगी पर जब स्कूल में पढ़ाने वाला ही नहीं, उसका क्या? पढ़ाई लिखाई के बाद स्वास्थ्य की देखभाल की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संस्था के अनुसार दस लाख डॉक्टर और तीस लाख नर्स की कमी। एक चौथाई स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर ही नहीं। आयुष्मान है, पर पांच किलोमीटर तक न कोई केंद्र, न अस्पताल और दूरदराज़ तथा आदिवासी इलाकों में तो न्यूनतम सुविधा के भी लाले पड़े हुए हैं। 
सभी राज्य आपसी तालमेल न होने से अपनी डपली अपना राग अलाप रहे हैं। पानी का उदाहरण देखिए कावेरी, कृष्णा, सतलुज-यमुना विवाद आधी सदी से चल रहा है। न कोई ट्रिब्यूनल का फैसला मानता है और न आपस में कोई समझौता करता है। जीएसटी काउंसिल चल सकती है तो ‘शिक्षा-स्वास्थ्य-न्याय काउंसिल’ क्यों नहीं?
विदेश से तुलना
जर्मनी में पढ़ाई के साथ फैक्ट्री में ट्रेनिंग। दक्षिण कोरिया में स्टार्टअप इकोसिस्टम सरकार से फंड, चीन ने दस साल में अस्सी करोड़ लोगों को गरीबी से निकाला य गांव-गांव में फैक्टरी, ई-कॉमर्सए इंफ्रास्ट्रक्चर। सवाल है कि हम दुनिया की सबसे बड़ी कार्य-शक्ति को परीक्षा केन्द्र में सड़ा रहे हैं। डिग्री है, हुनर नहीं। फैक्टरी नहीं, सिर्फ  फॉर्म है। डेनमार्क में डिजिटल गवर्नेंस। हर फाइल ऑनलाइन, कोई भी देख सकता है। सिंगापुर में भ्रष्टाचार पर उम्र कैद और संपत्ति ज़ब्त। 10 करोड़ जुर्माना और 5 साल सज़ा वाला बिल है, परन्तु पकड़ा कौन जाएगा, माफिया या मोहरा?
यही कुछ प्रश्न हैं जो नागरिक स्वयम् से करने के बाद सत्ताधारियों से पूछें और उनसे बहस करें। चुप रहना उन्हें सशक्त बनाना है और हमारे सब चलता है, की मानसिकता को पुष्ट करता है। इससे गुलामी की आदत खत्म नहीं होती बल्कि अत्याचार और निरंकुशता को पालने-पोसने का काम होता है। क्या एक विकासशील देश ऐसे चलता है जहां हादसे के बाद सबसे तेज़ जांच होती है। कितने लोग जानते हैं कि उनके शहर की सड़क बनने में कितना खर्च और क्यों हुआ? काम की गुणवत्ता किसने जांची? अगर जनता सवाल नहीं करेगी तो उनकी पौ बारह है और ये बेधड़क और बेहिचक अपने कुत्सित काम करते रहेंगे। इसलिए जो भी गलत दिखे, ठीक न लगे और आपके साथ खिलवाड़ होता लगे तो आवाज़ उठाइए। यही देश और हमारे हित में होगा।

#गलत के खिलाफ आवाज़ उठाना ही देश हित में है