प्रस्तावित अमरीकी टैरिफ : भारत को समय रहते एहतियाती कदम उठाने चाहिएं
अमरीकी सीनेट द्वारा पारित नए ‘रूस प्रतिबंध विधेयक’ ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में खलबली मचा दी है क्योंकि यह विधेयक रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का आयात करने वाले शीर्ष देशों, जिनमें भारत और चीन शामिल हैं, पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रविधान करता है। यही वजह है कि अमरीका के सीनेट के इस कदम ने भारत-अमरीका के भावी रिश्तों को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
इसलिए सवाल उठता है कि अमरीकी सीनेट द्वारा पारित नए ‘रूस प्रतिबंध विधेयक’ क्या हैं? इससे कौन-कौन देश प्रभावित होंगे और इससे भारतीय गुटनिरपेक्ष नीति का क्या होगा? तो इसका जवाब होगा कि यह विधेयक भारत के लिए केवल रूस पर अमरीकी प्रतिबंधों का मामला नहीं है, इसका बड़ा प्रश्न यह है कि क्या अमरीका अब तीसरे देशों की विदेश एवं ऊर्जा नीति को भी अपने प्रतिबंधों के ज़रिए प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है? हालांकि अभी एक महत्वपूर्ण शेष तथ्य यह है कि अमरीकी सीनेट ने गत 7 अगस्त, 2026 को रूस प्रतिबंध विधेयक 86-11 से पारित किया है, लेकिन यह अभी कानून नहीं बना है। इसे प्रतिनिधि सभा से पारित होकर राष्ट्रपति की मंजूरी भी चाहिए।
अब जानते हैं कि यह नया रूस प्रतिबंध विधेयक क्या है? तो यह जान लीजिए कि इस नए विधेयक का नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंशनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ है, जिसके मुख्य प्रावधान हैं—एक, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और रूसी नेतृत्व पर अतिरिक्त प्रतिबंध। दो, रूसी वित्तीय संस्थानों, ऊर्जा परियोजनाओं और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले ‘शैडो फ्लीट’ पर कार्रवाई। तीन, रूस की तेल-गैस आय को कम करने के लिए उसके बड़े खरीदारों पर दबाव।
चार, सबसे विवादास्पद प्रावधान यह कि राष्ट्रपति को रूस के तेल व गैस के शीर्ष पांच खरीदार देशों से अमरीका आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार सौंप दिया गया है। पांचवां, ध्यान देने वाली बात यह है कि पुराने प्रारूप में 500 प्रतिशत तक टैरिफ की चर्चा थी। लेकिन जुलाई में संशोधित संस्करण में इसे 100 प्रतिशत किया गया और राष्ट्रपति को अधिक विवेकाधिकार दिया गया।
सवाल है कि इसमें भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है? तो जवाब होगा कि भारत सीधे रूस के खिलाफ अमरीकी प्रतिबंधों का लक्ष्य नहीं है, लेकिन रूस का बड़ा तेल खरीदार होने के कारण भारत सैकेंडरी सैंशन्स के निशाने पर आ सकता है। पहले के संशोधित विधेयक में संभावित शीर्ष पांच देशों में चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान का उल्लेख विश्लेषणों में आया था। लेकिन अंतिम कानून में देशों की कोई स्थायी सूची नहीं लिखी गई है। कौन-से देश उस समय शीर्ष पांच में आते हैं, यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
इसलिए यह कहना कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लग ही गया, अभी गलत होगा। सही बात यह है कि भारत पर 100 प्रतिशत तक अमरीकी टैरिफ लगाने का रास्ता खोला गया है और वह भी तभी जब विधेयक आगे जाकर कानून बनता है तथा अमरीकी राष्ट्रपति उस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं। यदि कानून बन जाता है तो सबसे ज्यादा जोखिम चीन को उठाना पड़ेगा क्योंकि वह रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा ग्राहक और अमरीका का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। ऐसा होने के कारण ही चीन प्रमुख निशाने पर है। जहां तक भारत की बात है तो भारत के लिए जोखिम सबसे गंभीर है, क्योंकि रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना भारतीय ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई प्रबंधन का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है।
जहां तक तुर्किये की बात है तो रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार होने के कारण तुर्किये भी संभावित प्रभाव में आ सकता है। जहां तक कुछ यूरोपीय देशों की बात है तो विशेषकर वे देश जो अभी भी रूसी ऊर्जा पर निर्भर हैं। हालांकि यूरोप में रूस से ऊर्जा निर्भरता काफी कम हुई है। जहां तक जापान तथा अन्य बड़े खरीदार देशों की बात है तो कानून का स्वरूप ऐसा है कि ‘शीर्ष पांच’ की स्थिति समय के साथ बदल सकती है। इस नए विधेयक के पीछे असली अमरीकी रणनीति क्या है, तो यहां मामला दिलचस्प हो जाता है। अमरीका अब केवल यह नहीं कह रहा कि रूस से तेल मत खरीदो, बल्कि संदेश लगभग यह है कि अगर आप रूस से तेल खरीदते हैं तो आपके अमरीकी बाज़ार तक पहुंच को महंगा कर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि अमरीकी प्रतिबंधों की पहुंच रूस की सीमा से बाहर जाकर भारत, चीन, तुर्किये और दूसरे संप्रभु देशों की व्यापारिक पसंद तक पहुंच सकती है और यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक पहलू है।
इससे भारत की गुटनिरपेक्षता नीति खत्म नहीं होगी, लेकिन उसका पुराना रूप निश्चित रूप से बदल चुका है। आज भारत की विदेश नीति को ‘गुटनिरपेक्षता’ से ज्यादा सही शब्द रणनीतिक स्वायत्तता है। शीतयुद्ध के दौर में भारत का संदेश था—न अमेरिका का गुट, न सोवियत गुट किंतु आज भारत का संदेश है कि अमरीका के साथ भी साझेदारी, रूस के साथ भी संबंध, यूरोप से भी सहयोग, पश्चिम एशिया से भी सम्पर्क और ग्लोबल साउथ में स्वतंत्र भूमिका के साथ बने रहेंगे। यही कारण है कि भारत एक साथ क्वाड में अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया के साथ है तथा रूस से रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखता है। ब्रिक्स में रूस-चीन के साथ है और यूरोप के साथ भी रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध बढ़ाता है।
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञ भी भारत को अमरीका पर निर्भरता कम करने को रणनीतिक कदम उठाने की ज़रूरत बताते हैं, क्योंकि ‘रूस प्रतिबंध विधेयक’ के बाद विशेषज्ञों ने भारत-अमरीका रिश्तों में बदलाव की चेतावनी दी है। अब तो विदेश नीति के विशेषज्ञों ने भी आगाह किया है कि यह केवल एक तात्कालिक तनाव नहीं, बल्कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में एक स्थायी बदलाव की शुरुआत है, जो ‘रूस प्रतिबंध विधेयक’ के कानून बनते ही तेज हो जाएगा। उन्होंने दूरदर्शिता भरा सुझाव दिया है कि भारत को अब अमरीका पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में रणनीतिक कदम उठाने चाहिए। अमरीका से बातचीत करके भारत को स्पष्ट करना चाहिए कि रूसी तेल खरीद का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय उपभोक्ता और ऊर्जा सुरक्षा है, न कि रूस की युद्ध नीति का समर्थन करना। (अदिति फीचर्स)



