तीन सागरों का संगम स्थल है कन्याकुमारी
भारत की मुख्य भूमि का सबसे दक्षिणी छोर कुमारी अंतरीप के नाम से पूरे संसार में प्रसिद्ध है। यह नाम वहां पर स्थित कन्याकुमारी तीर्थ के कारण है। यह स्थान एक धार्मिक स्थल के अलावा कई वजहों से महत्वपूर्ण है। तीनों ओर सागरजल से घिरा यह स्थान तीन सागरों का संगम स्थल भी है। पूरब में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण में सुदूर दक्षिणी धु्रव तक हिन्द महासागर का विशाल पारावार फैला है। अंतरीप के अग्रभाग में स्थित विवेकानन्द शिला से अरब सागर की पीले और बंगाल की खाड़ी की नीले रंग की लहरें साफ-साफ दिखाई पड़ती हैं।
सुप्रसिद्ध तीर्थ कन्याकुमारी भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में केरल की सीमा के पास सागर तट पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए सर्वाधिक सुविधाजनक पथ तिरूवनंतपुरम् से (त्रिवेन्द्रम) कन्याकुमारी की रेल लाइन है। रेलपथ द्वारा दूसरा मार्ग चेन्नई से त्रिन वेली होते हुए, मदुरै से गुजरता है।
कन्याकुमारी रेल स्टेशन दक्षिण रेलवे का अंतिम स्टेशन है जहां अच्छे प्लेटफार्म, प्रतीक्षालय तथा यात्री निवास का निर्माण किया गया है। त्रिवेन्द्रम से कन्याकुमारी की यात्रा रेल से की जाए अथवा बस से, रास्ते में हरे-भरे धान के खेत, नारियल, सुपारी, कटहल और काजू के वृक्षों की पंक्तियां देखकर मन मुदित हो उठता है। रास्ते में छोटी बड़ी कई सरितायें हैं, साथ ही पूरब और उत्तर की ओर लहराते सागर जल के दर्शन भी होते रहते हैं।
मुख्य मंदिर : कन्याकुमारी का मंदिर ऊंचे चौकोर पथरीले स्थान पर स्थित है, जिसके तीन ओर सागर की फेनिल लहरें मचलती रहती हैं। दक्षिण भारत की परम्परा के अनुसार विशाल तथा कलात्मक गोपुरम् के साथ मुख्य मंदिर के चारों ओर ऊंची दीवार है जिसमें चार दिशाओं की ओर चार द्वार हैं, जिनमें तीन द्वार ही खुले रहते हैं। सागर की ओर पूर्व दिशा का द्वार बंद कर दिया गया है।
पूरब की ओर का मुख्य द्वार बंद किए जाने के बारे में ऐसा बताया जाता है कि वहां पर समुद्र में कई चट्टानें उभरी हुई हैं जहां पर नाव चलाना संकटपूर्ण है। पुराने समय में जब यह विशाल द्वार खुला रहता था तो रात्रि में दूर से आते नाविकों को देवी के श्रृंगार और दीपों की रोशनी से भ्रम होता था और उनकी नावें चट्टानों से टकरा जाती थीं इसलिए पूर्व दिशा का दरवाजा बंद कर दिया गया है।
प्रस्तर खंडों से बने कलात्मक मंदिर के गर्भगृह में देवी कन्याकुमारी की आकर्षक सुंदर मूर्ति खड़ी है। पूर्व दिशा की ओर मुख किए कुमारी देवी के एक हाथ में माला है। कौमार्य के प्रतीक के रूप में नाक में हीरे की सीक तथा रत्नजड़ित नथ पहन रखी है। आरती के समय पूर्ण श्रृंगार के साथ इस दिव्य मूर्ति की शोभा अद्भुत होती है, विशेषकर नाक के हीरे की चमक दर्शकों को आकर्षित करती है। कन्याकुमारी के मंदिर के पास ही भद्रकाली का मंदिर है। भद्रकाली को कुमारी देवी की मुख्य सहेली कहा जाता है। इसकी गणना परंपरागत रूप में प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में की जाती है। इसी अहाते में दीवार के पास संकटमोचन हनुमान की मूर्ति है जो पूरे संकाय की सुरक्षा के लिए स्थित है।
देवी कन्याकुमारी की आराधना अत्यन्त प्राचीनकाल से होती आयी है। महाभारत तथा पुराणों में भी इस पावन तीर्थ का उल्लेख मिलता है। सीता की खोज में भटकते श्रीराम भी यहां पहुंचे थे तो देवी ने गंधमादनपर्वत (आधुनिक रामेश्वरम् धाम) की ओर जाने का संकेत दिया था।
कन्याकुमारी मंदिर के निकट ही थलभाग में दूसरा दर्शनीय स्थान है- ‘गांधी मंडप’। अंतरीप पर सागर-संगम में विसर्जित करने से पूर्व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अस्थिकलश यहां दर्शनार्थ रखा गया था। तीन मंजिल का यह मंडप वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। इसकी विशेषता है कि गांधी जयंती के दिन 2 अक्तूबर को, सूर्य की किरणें झरोखों से होकर उसी स्थान पर पड़ती हैं, जहां अस्थिकलश रखा गया था।
कुमारी अंतरीप की उल्लेखनीय नैसर्गिक विशेषता यह है कि यहां सूर्योदय और सूर्यास्त का मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है। अद्भुत दृश्य पूर्णिमा की संध्या का होता है, जब पश्चिम में रक्ताभ सूर्य डूबता रहता है और पूरब में सुनहला चंद्रोदय होता है। पिछले कुछ वर्षों में यात्रियों की बढ़ती भीड़ के कारण कन्याकुमारी तीर्थ में राज्य तथा केन्द्रीय पर्यटन विभागों के यात्री निवास के अलावा अनेक होटल तथा धर्मशालाओं का निर्माण हो चुका है। सब तरह की सुविधायें उपलब्ध हैं तथा यहां अन्य तीर्थों की तुलना में आवास और भोजन महंगा नहीं है। सर्दियों का मौसम यहां की यात्रा के लिये उत्तम है। बरसात में भी यात्रा की जा सकती है, पर गर्मी में तेज धूप और उमस रहती है। (उर्वशी)




