पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत को बचाना ही भारत को बचाना है

पंजाब को सिर्फ  नक्शे पर बनी एक सीमा से नहीं समझा जा सकता। पंजाब एक ऐसी धरती है, जिसकी भाषा पंजाबी और पंजाबियत उसकी आत्मा है। इसलिए पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत की रक्षा की बात करना सिर्फ पंजाब की नहीं, बल्कि भारत की उस आत्मा की रक्षा करने की बात करना है जिसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता रही है। मैं यह बात किसी सांसद के तौर पर नहीं कह रहा और न ही यह लेख किसी राजनीतिक पार्टी के पक्ष या विरोध में लिखा गया है। मैं यह बात पंजाबियत से प्रेम करने वाले एक इन्सान के रूप में कह रहा हूं। पंजाब से मेरा यह नाता किसी राजनीतिक मंच से नहीं बना, बल्कि यह नाता 1947 के ज़ख्म लिखते हुए बना। इस किताब के लिए मैं विभाजन के दौरान बेघर हुए लोगों से मिला, उनके घरों में बैठा, उनकी यादें सुनीं और उनकी आंखों में 1947 को फिर से जीवित होते देखा। उनमें से बड़ी संख्या पंजाबियों की थी। किसी ने अपना गांव छोड़ा, किसी ने अपना घर, किसी ने अपनी ज़मीन और किसी ने अपना कोई स्दस्य गंवाया, लेकिन एक चीज़ जो वे अपने साथ लेकर आए, वह थी अपनी मिट्टी की याद।
उन लोगों से बात करते हुए मुझे समझ में आया कि 1947 सिर्फ इतिहास की एक तारीख नहीं। यह आज भी कई घरों की चुप्पी में बसता है। एक बुज़ुर्ग की कांपती आवाज़ में, किसी पुरानी तस्वीर में, एक भूले हुए गांव के नाम में। विभाजन ने पंजाब को दो हिस्सों में बांट दिया, परन्तु पंजाबियत को नहीं बांट सका। शायद इसी कारण पंजाब को समझने से पहले पंजाब का दर्द समझना पड़ता है।
पंजाब की कहानी 1947 से बहुत पहले शुरू होती है। यह वह धरती है जिसने सिंधु घाटी सभ्यता जैसी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को जन्म लेते देखा। पांच दरियाओं की यह धरती सदियों से लोगों, विचारों, व्यापारियों, यात्रियों और संस्कृतियों के आने-जाने का मार्ग रही है। पंजाब शब्द फारसी के ‘पंज’ और ‘आब’ शब्दों से बना है, अभिप्राय पांच पानी की धरती। नाम चाहे फारसी है, लेकिन इस धरती की सांस्कृतिक यात्रा इस नाम से कहीं अधिक पुरानी है। 
पंजाबी भाषा को भी इसी लम्बी यात्रा के संदर्भ में देखने की ज़रूरत है। आधुनिक पंजाबी को प्रत्यक्ष रूप में हज़ारों साल पुरानी भाषा कहना चाहे ऐतिहासिक तौर पर सही नहीं होगा, लेकिन इसकी जड़ें  उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप की बहुत पुरानी भाषाई और सांस्कृतिक परम्पराओं में गहरी हैं। सदियों के भाषाई विकास, लोक-बोलियों, संत-परम्परा और सूफी परम्पराओं ने मिलकर पंजाबी को वह रूप दिया, जिसे आज हम पंजाब की मातृभाषा के तौर पर जानते हैं। गुरु नानक देव जी से लेकर बुल्ले शाह, वारिस शाह और पंजाबी साहित्य की अनेक धाराओं तक, पंजाबी की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि इसने इन्सान को धर्म की सीमाओं से ऊपर रखा और यही पंजाबियत है।
पंजाबियत किसी एक धर्म की जायदाद नहीं। यह किसी एक जाति, पार्टी या विचारधारा की जागीर नहीं। पंजाबियत एक जीवन प्रक्रिया है, मेहनत करने का, बांट कर खाने का, दुख में साथ खड़े होने का, मेहमान को अपना बनाने का और दिल खोल कर जीने का। ‘वंड छको’ सिर्फ एक धार्मिक संदेश नहीं, यह पंजाबी जीवन-दृष्टि का भी हिस्सा है।
इस धरती ने भारत की आज़ादी के लिए भी अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। लाला लाजपत राय से लेकर शहीद भगत सिंह तक, गदरी बाबाओं से लेकर आज़ाद हिन्द फौज के सिपाहियों तक, पंजाब की मिट्टी ने बार-बार देश के लिए अपने सपूत दिए। जलियांवाला बाग का ज़ख्म भी पंजाब के दिल पर ही लगा था। 1919 में अमृतसर में हुआ कत्लेआम सिर्फ पंजाब पर गोली नहीं थी, यह भारतीय आत्म-सम्मान को कुचलने की कोशिश थी। लेकिन इस धरती की फितरत ही कुछ और है, यह ज़ख्म खाकर भी खड़ी हो जाती है।
जब 1947 आया, एक लकीर खींची गई। नक्शा बदल गया। घर बदल गए। गांव बदल गए। लोग उजड़ गए, लेकिन यादें नहीं बदलीं।
‘1947 के ज़ख्म’ लिखते समय मैंने महसूस किया कि जिन लोगों से उनकी ज़मीन छीन ली गई, उनसे उनकी मिट्टी नहीं छींनी जा सकी। वे अपने गांव अपने साथ ले आए। वे गांव उनकी भाषा में थे, उनकी यादों में थे और उनकी कहानियों में आज तक जीवित हैं।
लेकिन आज सवाल यह है कि क्या हम उस पंजाबियत को अगली पीढ़ियों तक उसी तरह पहुंचा पाएंगे? पंजाब आज कई संकटों में से गुज़र रहा है जैसे युवाओं का विदेश जाना, बेरोज़गारी, नशे की समस्या, कृषि संकट और राजनीतिक बेचैनी, लेकिन इनके अलावा एक और खामोश चिन्ता भी है, पंजाब की अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर।
भारत में आज पहचान की राजनीति तेज़ हो रही है। यह चिन्ता किसी धर्म के खिलाफ  नहीं हो सकती। हिन्दू धर्म भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का अटूट हिस्सा है, लेकिन चिन्ता उस सोच से है जो भारत की सभी पहचानों को एक ही सांचे में ढाल देना चाहती है।
अगर धर्म को राजनीतिक पहचान का एकमात्र पैमाना बना दिया गया तो पंजाब की वह साझी आत्मा कहां जाएगी जिसमें गुरबाणी भी है और सूफी कलाम भी, वारिस शाह भी है और लोक-गीत भी, खेत भी हैं और मेले भी, लंगर भी हैं और साझी रोटी भी। मैं मानता हूं कि पंजाब को किसी एक धार्मिक दायरे में नहीं बांधा जा सकता। यह बात किसी धर्म के खिलाफ  नहीं, यह पंजाबियत के पक्ष में है। खतरा धर्म से नहीं, बल्कि धर्म को एक ही राजनीतिक पहचान बना देने से है, क्योंकि अगर भारत को एक ही रंग में रंगने की कोशिश हुई, तो सबसे पहले वे रंग मद्धम पड़ जाएंगे, जो अपनी अलग पहचान के कारण ही भारत की तस्वीर को सुंदर बनाते हैं। पंजाब भी इस खतरे से बाहर नहीं है।
पंजाबियत की खूबसूरती यही है कि इसे अपना होने के लिए किसी और को गैर बनाने की ज़रूरत नहीं। पंजाबियत ने सदियों से अपने भीतर अलग-अलग धाराओं को जगह दी है। यह किसी के खिलाफ खड़ी पहचान नहीं, यह अपने भीतर समाने वाली पहचान है। इसलिए पंजाब को बदलने की नहीं, पंजाब को समझने की ज़रूरत है। पंजाब को यह बताने की नहीं कि उसकी पहचान क्या हो, उसे अपनी पहचान अपने तरीके से जीने की आज़ादी देने की ज़रूरत है, क्योंकि यदि पंजाबियत को किसी बड़ी राजनीतिक या धार्मिक पहचान के नीचे धीरे-धीरे दबा दिया गया, तो हो सकता है नक्शे पर पंजाब वही रहे, लेकिन उसकी आत्मा बदल जाएगी और यही बात सबसे ज़्यादा चिन्ता की बात है।
भारत की ताकत एक जैसा होने में नहीं, इकट्ठे अलग होने में है। यहां तमिल अपने तमिलपन से भारतीय है, बंगाली अपने बंगालीपन से भारतीय है और पंजाबी अपनी पंजाबियत से भारतीय है। भारतीयता इन पहचानों को मिटा कर नहीं, इन्हें अपने साथ लेकर बनती है। इसलिए पंजाबी को बचाना सिर्फ एक भाषा को बचाना नहीं। पंजाबी साहित्य, लोक-गीत, टप्पे, बोलियां, गिद्दा, भांगड़ा, सूफी परम्परा, गुरबाणी, पंजाब का लोक-संगीत और इसका साझा लंगर, ये सब भारत की साझी विरासत हैं।
यह बात मैं उस अनुभव से कह रहा हूं जो मुझे ‘1947 के ज़ख्म’ किताब लिखते समय मिला। जिन लोगों ने विभाजन का दर्द अपने सीने में रखा, उनसे मैंने एक बात सीखी है कि आप मिट्टी बांट सकते हैं, यादें नहीं, सरहद खींच सकते हैं, आत्मा नहीं। पंजाब से प्यार करने के लिए पंजाब में जन्म लेना ज़रूरी नहीं। पंजाबियत को समझने के लिए पंजाबी होना भी ज़रूरी नहीं है। पंजाबियत का दरवाज़ा हर उस इन्सान के लिए खुला है, जो दूसरे को अपना मानने की सामर्थ्य रखता है, इसलिए पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत की रक्षा किसी एक राज्य की रक्षा नहीं, यह भारत के एक रंग की रक्षा है, और भारत के सभी रंग बचे रहेंगे, तभी भारत की पूरी तस्वीर बचेगी, क्योंकि पंजाब सिर्फ पांच दरियाओं की धरती नहीं है, पंजाब वह दरिया है जो सदियों से भारत की सांस्कृतिक धारा में बहता आ रहा है।

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