ज्ञानी ज़ैल सिंह और एम.एस. रंधावा का मेल-मिलाप

इसी वर्ष जुलाई में जब एम.एस. रंधावा द्वारा चंडीगढ़ के रोज़ गार्डन में  स्थापित की गई पंजाब आर्ट्स कौंसिल की पृष्ठभूमि में बनाए गए ओपन एयर थिएटर की मरम्मत करवा कर उसमें रतन सिंह जग्गी मेमोरियल फाउंडेशन द्वारा जग्गी साहब की प्रतिमा सजा रहा था, तो मुझे एंग्लो सिख वॉर से संबंधित फिरोज़पुर के संग्रहालय के उद्घाटन की दिसम्बर 1974 की एक तस्वीर मिली। इसमें संजय गांधी के साथ पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर एम.एस. रंधावा, पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी ज़ैल सिंह, उनके मीडिया सलाहकार तरलोचन सिंह और प्रसिद्ध चित्रकार कृपाल सिंह भी दिखाई दे रहे हैं। यह तस्वीर मेरे मित्र तरलोचन सिंह से मिली थी, जब मैं नई दिल्ली में रहता था, जो उस समय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन थे। इस तस्वीर ने मुझे एम.एस. रंधावा के साथ बिताए पल याद करवा दिए और ज्ञानी जी की राजनीतिक सक्रिया और मिलनसारिता भी। वे जिससे भी मिलते थे, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, उसे गले लगा लेते थे। तुरंत फैसले लेने वालों में एम.एस. रंधावा भी जवाब नहीं था, लेकिन ज्ञानी जी का क्या कहना था।
मैं अपनी बात की पुष्टि के लिए सिर्फ ज्ञानी जी का उदहरण देता हूं, जो देश के राष्टपति भी बने। पहली बात तो यह है कि जब लोहे की लठ के तौर पर जानी जाती श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या उनके अंगरक्षकों ने कर दी तो ज्ञानी जी ने भारत का राष्ट्रपति होने के नाते तुरंत प्रधानमंत्री की कुर्सी उनके बेटे राजीव गांधी को सौंप दी। दूसरी बात का संबंध मेरी निजता से है। राष्ट्रपति का पद छोड़ने समय उन्होंने देश के प्रसिद्ध पत्रकारों को अपनी संगत में आए साथियों को राष्ट्रपति भवन में भोज के लिए न्योता दिया।
यह न्योता जहां ट्रिब्यून प्रकाशन समूह के मुख्य सम्पादक वी.एन. नारायणन को था तो पंजाबी ट्रिब्यून का सम्पादक होने के नाते मुझे भी था। मैं और नारायणन अपनी पत्नियों के साथ इकट्ठे राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो ज्ञानी जी दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने मुझे गले लगाया और बोले, ‘बीबी नहीं आई?’ बीबी से उनका मतलब मेरी पत्नी से था, जो नारायणन की पत्नी का साथ देती  दो कदम पीछे थी। ज्ञानी जी ने हमारा स्वागत किया और मेहमानों से मिलाने लगे। मंच पर जाने से पहले अगली कतार में बैठे सभी गणमान्यों को दाहिने हाथ से हाथ मिले लेकिन बाएं हाथ से मेरा हाथ नहीं छोड़ा, जैसे मैं उनका कोई खास आदमी हूं। यह बात 25 जुलाई, 1987 की है। मेरे मित्र तरलोचन सिंह मेरे हमउम्र जैसे हैं। पंजाब आर्ट्स कौंसिल का उभार आज भी कायम है।
वंदे मातरम् के अंतरों की जांच-पड़ताल
इन दिनों लंबे समय से गाए जा रहे राष्ट्र गीत की जांच-पड़ताल शुरू हो गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित भाजपा इसके पूरे छह अंतरे गाने की वकालत कर रही है। यहां तक कि 1950 में भारतीय गणराज्य द्वारा स्वीकार दो अंतरों वाले राष्ट्र गीत को असंवैधानिक और निंदनीय बताने में भी नहीं संकोच नहीं कर रही। इसके विपरीत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और सीपीआई (मार्क्सवादी)का तर्क है कि इसे राजनीतिक रंग देने के बजाय भावनात्मक साझ के प्रतीक तक ही सीमित रखना सही है। उनका तर्क है कि यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस थी, जिसने आज़ादी की लड़ाई में बड़ी कुर्बानियां दीं, जिसने इसके पहले दो अंतरों को राष्ट्र गीत का मूल मंत्र बताया। वैसे भी इसे मान्यता देने वाली कमेटी में उस समय के बड़े नेता मौलाना आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, अचार्य देव और रबींद्रनाथ टैगोर आदि शामिल थे।
राष्ट्र गीत के लिए सभी अंतरों का इस्तेमाल के लिए डटने वाले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के नावल ‘आनंद मठ’ का हवाला देते हैं, जिसमें लिखा है कि इसे मान्यता देने वाली कमेटी के सदस्य रबींद्रनाथ टैगोर इस फैसले से सहमत नहीं थे। वे भूल जाते हैं कि टैगोर एक महान साहित्कार होने के साथ-साथ  इन्सानी दिल भी रखते थे। मुमकिन है कि उनका मन चाहता हो कि राष्ट्र गीत उनसे लिखवाया जाए। आज वह पार्टी टैगोर की आत्मा की शरण ले रही है, जिसके प्रधानमंत्री ने कुछ दिन पहले वर्तमान भारत की समूची तरक्की के बारे में दावा किया था कि उनकी सरकार ने सात साल में वह कुछ कर दिखाया है, जो पिछले 70 सालों में नहीं हुआ। वह भी एक इन्सान हैं और उनका मन उनसे यह कुछ कहलवा चुका है।
हमारा विचार है कि अहंकार गम्भीर बीमारी है और इसका शिकार होने से कोई नहीं बचता। जहां तक बड़े धर्मों से संबंधित पार्टी प्रबंधक है, वे अपने धार्मिक ग्रंथों का पाठ भी करते हैं और अखंड पाठ भी, लेकिन दैनिक कार्यों के लिए अपने मूल मंत्र या गायत्री मंत्र पर भरोसा करते हैं।
हमारा मानना है कि भाजपा की मौजूदा सोच देश की एकता को भंग करने वाली है। वैसे भी संवैधानिक रूप से स्वीकार की गई किसी भी धारणा का सम्मान करना बनता है। यह आज़ाद भारत की सोच को आगे बढ़ाती है, जो समूचे देशवासियों को एकजुट होकर चलने का आह्वान करती है। भाजपा की मौजूदा सोच से स्पष्ट है कि आज उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक रही है और एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी भावना पर पहरा देने वाले पक्षों से खौफ खा रही है।
अंतिका
हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा,
इन्सान की औलाद है, इन्सान बनेगा।

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