अमरीका ने अभी क्यों जारी की भारतीय परमाणु कार्यक्रम पर रिपोर्ट ?
नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स सम्मेलन से पहले 9 सितम्बर, 2026 को अमरीका के एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत ने कम से कम 30 अतिरिक्त परमाणु बम अपने नये निर्माणाधीन मिसाइलों के लिए जोड़े हैं, जिससे उसके ऑपरेशनल लांचर्स के लिए जो पहले से ही 160 वॉरहेड्स मौजूद हैं, उनकी संख्या बढ़कर 190 हो गई है। अमरीका के गैर-मुनाफे वाले पालिसी थिंक टैंक द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के प्रकाशन समय को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। ब्रिक्स के ज़रिये चीन, रूस व ईरान की तिगड़ी नई विश्व व्यवस्था स्थापित करने के प्रयास में है, जिसे अमरीक के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। ब्रिक्स की कोशिश है कि वह अपने सदस्यों के बीच में क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स का सिलसिला आरंभ करे, जिसमें डिजिटल पेमेंट सिस्टम्स और सेंट्रल बैंक डिजिटल करंसीज़ (सीबीडीसी) के बीच लिंक भी शामिल हो। इसलिए सम्मेलन से पहले 12-13 अगस्त, 2026 को ब्रिक्स देशों के वित्त मंत्री व सेंट्रल बैंक के प्रतिनिधि जयपुर में मिले थे, ताकि वित्तीय सहयोग, भुगतान और सदस्यों के बीच राष्ट्रीय मुद्रा में व्यापार हो सके।
अगर यह व्यवस्था हो जाती है तो विश्व व्यापार में डॉलर का महत्व कम हो जायेगा। अमरीका यही नहीं चाहता है। अभी तक नई दिल्ली का झुकाव वाशिंगटन की तरफ रहा है, इसलिए भारत ने अध्यक्ष होते हुए भी ब्रिक्स की तरफ से अमरीका व इज़रायल द्वारा 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर थोपे गये युद्ध के खिलाफ निंदा प्रस्ताव जारी नहीं किया था। लेकिन हाल ही में बिश्केक (किर्गिस्तान) में आयोजित एससीओ सम्मेलन के हाशिये पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन व ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से मुलाकात करके अमरीका को स्पष्ट संदेश दिया कि भारत के पास नई विश्व व्यवस्था में शामिल होने का विकल्प खुला हुआ है।
दरअसल, वाशिंगटन को नई विश्व व्यवस्था की ओर नई दिल्ली का झुकना पसंद नहीं है। अमरीकी रिपोर्ट और उसके जारी करने के समय को इसी पृष्ठभूमि में समझने की आवश्यकता है, विशेषकर इसलिए भी कि अमरीका ने ईरान पर हमला यह कहते हुए किया था कि वह तेहरान को परमाणु बम नहीं बनाने देगा, जबकि अब यह बेमतलब व बेमकसद का युद्ध तेल व्यापार पर नियंत्रण में बदल गया है, जिससे कच्चे तेल की कीमत एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई। बहरहाल, ‘भारत के परमाणु हथियार- 2026’ रिपोर्ट 9 सितम्बर, 2026 को प्रकाशित की गई। इसमें कहा गया है, ‘भारत अपने परमाणु शस्त्रागार के आधुनिकीकरण को जारी रखे हुए है कि उसने हाल के वर्षों में अनेक नये हथियार सिस्टम्स फील्ड किये हैं और अन्य अनेक विकसित किये जा रहे हैं ताकि मज़बूती प्रदान की जा सके या जो परमाणु-सक्षम एयरक्राफ्ट, भूमि-आधारित डिलीवरी सिस्टम्स व समुद्र-आधारित सिस्टम्स मौजूद हैं, उन्हें बदला जा सके। हमारा अनुमान है कि भारत ने 140 से 225 वॉरहेड्स के लिए पर्याप्त मात्रा में सैन्य प्लूटोनियम का उत्पादन कर लिया है और उसने 190 तक वॉरहेड्स असेम्बल कर लिए हैं। चूंकि अधिक हथियार सिस्टम्स विकसित किये जा रहे हैं, इसलिए भारत के वॉरहेड भंडार में अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है।’
इस परमाणु नोटबुक का शोध व लेखन फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स न्यूक्लिर इनफार्मेशन प्रोजेक्ट के स्टाफ ने किया है, जिसने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ‘हमारा अनुमान है कि भारत वर्तमान में 9 अलग-अलग परमाणु-सक्षम सिस्टम्स ऑपरेट करता है—दो एयरक्राफ्ट, छह भूमि-आधारित बैलिस्टिक मिसाइलें और एक समुद्र-आधारित बैलिस्टिक मिसाइल। कम से कम दो अतिरिक्त सिस्टम्स विकसित किये जा रहे हैं, जो पूर्ण होने की कगार पर हैं और उन्हें एक या कुछ वर्षों के भीतर सशस्त्र बलों के साथ तैनात किया जायेगा।’ गौरतलब है कि भारत अपने परमाणु हथियारों के भंडार की संख्या प्रकाशित नहीं करता है। रिपोर्ट में जो समीक्षा की गई है वह अनुमान के आधार पर है यानी वह खुले स्रोतों के मिश्रण पर आधारित है।
भारत उन चंद देशों में शामिल है जिनके बारे में माना जाता है कि वह दोनों अति संवर्धित यूरेनियम व हथियार ग्रेड के प्लूटोनियम का उत्पादन कर रहा है। अनुमान यह है कि संवर्धित यूरेनियम उत्पादन का अधिकतर फोकस ईंधन बनाने के लिए है। ऐसा रिपोर्ट में कहा गया है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ‘भारत जो हथियार ग्रेड का प्लूटोनियम बना रहा है, उसका स्रोत पुराना हो चुका 100-मेगावाट ध्रुव प्लूटोनियम प्रोडक्शन रिएक्टर है, जोकि भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर कॉम्प्लेक्स में है, मुम्बई के निकट, जबकि 2010 तक इसी लोकेशन पर स्थित सीआईआरयूएस रिएक्टर में यह काम हो रहा था। एक दशक से भी अधिक देरी के बाद कलपक्कम के निकट इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च में भारत के नये 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने अप्रैल 2026 में अपनी पहली क्रिटिकैलिटी हासिल की। नया रिएक्टर यूरेनियम या थोरियम का विकिरण करता है। प्लूटोनियम-239 व यूरेनियम-233 का उत्पादन करने के लिए और इसके लिए ईंधन उस भंडार से मिलता है, जिसे भारत के फर्स्ट-जनरेशन पॉवर रिएक्टर्स के रिएक्टर-ग्रेड प्लूटोनियम से अलग किया गया है।’ रिपोर्ट का दावा है कि अनेक अतिरिक्त फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स बनाने की योजना है, जिनमें से दो एफबीआर-1 व एफबीआर-2 पहले से बनी योजना के स्तर पर हैं और वह प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर, कलपक्कम के बराबर में स्थापित किये जायेंगे। अगर इनका सफलतापूर्वक संचालन कर लिया गया तो यह भारत के परमाणु वॉरहेड भंडार के लिए उपलब्ध प्लूटोनियम की मात्रा में ज़बरदस्त वृद्धि कर देंगे।
यह सही है कि ‘फैडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स’ परमाणु कार्यक्रम की वैश्विक स्थिति पर अपनी अप-डेट की गई रिपोर्ट नियमित प्रकाशित करता है, लेकिन यह रिपोर्ट इस समय इसलिए जारी की गई है क्योंकि संसार के क्षेत्रीय समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं। भारत के पड़ोस में दो परमाणु शक्तियां हैं—चीन व पाकिस्तान। उनको मद्देनज़र रखते हुए भारत को अपनी परमाणु क्षमताओं में विस्तार करने की आवश्यकता है, जो वह कर भी रहा है। लेकिन भारत अपने परमाणु भंडार का ढिंढोरा नहीं पीटता, क्योंकि इन बातों का गोपनीय रहना ही बेहतर होता है। इसके बावजूद स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट और अन्य सामरिक संस्थाओं के बाद अमरीकी थिंक टैंक ने भी इस बात पर बल दिया है कि भारत के परमाणु बमों की संख्या बढ़कर 190 हो गई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अमरीका व अन्य पश्चिमी देश यह प्रचारित करना चाहते हैं कि भारत परमाणु हथियारों की दौड़ में है (जबकि ऐसा नहीं है क्योंकि भारत का पामाणु कार्यक्रम अपनी ऊर्जा पूर्ति व आत्मरक्षा के लिए है)। इसके अतिरिक्त नई दिल्ली पर नई विश्व व्यवस्था में शामिल न होने के लिए दबाव बनाने का भी प्रयास है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



