महाराजा जसवंत सिंह की प्रेयसी नैनीबाई के मंदिर-महल की भव्यता
वीरता, त्याग व बलिदान के साथ-साथ धार्मिक स्थलों के लिए भी जोधपुर शहर जाना जाता है। शहर में कई धार्मिक मंदिर ऐसे भी है जो शिल्प व स्थापत्य की उन्नत परम्परा के मनमोहक रूपाकारों से आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। एक ऐसा ही भव्य मंदिर जो पूर्णतया राजस्थानी वास्तुशैली के दर्शन कराता है, उदयमंदिर मार्ग के बीच में भव्य प्रासाद की भांति दिखाई देता है जो कि नैनीबाई के मंदिर के नाम से विख्यात है।
इस मंदिर को जोधपुर के कलाप्रेमी व रंगीन मिजाज़ के महाराजा जसवंत सिंह (द्वितीय) ने अपनी प्रेयसी नैनीबाई के लिए वि.स. 1926 में बनवाया था। यह भव्य मंदिर 17 फुट की ऊंचाई पर आयताकार चबूतरे पर निर्मित है। लाल घाटू के पत्थरों से सुघड़ स्तम्भों से बने सभामंडप और परिक्रमा परिसर के बीच मंदिर का गर्भगृह है जो सफेद मकराने के पत्थरों से बना हुआ है। लगभग 150 वर्षों के बाद आज भी इसके प्रस्तर शिल्प में लौकिक घड़ाई के तोरण, कंगूरे व शिवालय मेहराब तो मुख्य द्वार के आकर्षण हैं। मंदिर के सामने दोनों ओर बाहर की तरफ जालीदार गवाक्ष व अगवार के कोनों पर बनी कमानीदार कलात्मक छतरियां मर्मज्ञ कालाकारों के वास्तुकौशल को दर्शाती हैं।
महाराजा जसवंत सिंह ने अपनी प्रेयसी के लिए यह मंदिर क्यों बनवाया, इसकी भी रोचक दास्तां है। महाराजा के शासनकाल में कलावतों को प्रश्रय दिया जाता था, जिसमें पातरिये (वेश्या) और नर्तकियां दोनों ही थीं। इनके बारे में कहा जाता है कि ये रूपजीवा अपने पेशे को अपनाने के लिए मिट्टी के गणेश से ब्याह दी जाती थीं। इन्हें भगतण जाति के नाम से जाना जाता था। नैनीबाई भी एक ऐसी ही रूपसी थी जिसे महाराजा के मर्जीदान दीवान फैयाजुल्ला खॉन ने उन्हें खुश करने के लिए उनकी खिदमत में पेश किया था। महाराजा पहली नज़र में ही इस रूपगर्विता पर इतना मुग्ध हो गये कि वह अपनी दीन दुनिया ही भुला बैठे। नैनी नर्तन व गायन में भी निपुण थी। महाराजा ने उसे लोकलाज के भय से पासवान का दर्जा तो नहीं दिया लेकिन अपना अथाह प्रेम वैभव व राजसी ठाठ-बाठ उस पर न्यौछावर कर दिया। धीरे-धीरे नैनी ने इनके दिल पर ऐसा कब्जा किया कि वह परदायत व रानी के से अधिकार प्राप्त कर बैठी।
नैनी राजकाज व खुली महफिल में महाराजा के बाजू में कुर्सी पर आसीन होती थी। महाराजा भले ही राजसी तलवार के बगैर हों, लेकिन नैनी राज्य चिन्ह के रूप में कटार लेकर बैठती थी। नख से शिख तक सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात व कीमती वस्त्रों से लदी रहती थी। नैनी का रहन सहन इतना विलासितापूर्ण था कि वह अपने बालो को धोने के बाद गुलाब व केवड़े के जल से उन्हें सिंचवाती थी ताकि उससे कई दिनों तक खुशबू बनी रहे।
महाराजा जसवंत सिंह न केवल उसका बल्कि उसके रिश्तेदारों तक का मेहारनगढ़ दुर्ग में आदर-सत्कार करते थे। उन्होंने उसकी मां छोटी के लिए शहर के बीचोबीच घासमंडी में विशाल सुसज्जित हवेली रहने के लिए दी थी जो जवाहरखाना कहलाती थी। महाराजा राज के नियम कानून कायदे तोड़कर वक्त बेवक्त नैनी व उसकी मां से मिलने इसी हवेली में जाया करते थे।
पूरी तरह से भोग विलास में डूबे महाराजा जब मारवाड़ राज की अनदेखी करने लगे तो इनकी रानियां, महारानियां, दरबारी व सामन्त तक नाराज हो गये व इनके भाई प्रताप सिंह रूठ कर जयपुर राजघराने में चले गए थे। महाराजा जसवंत सिंह के रंगमहल से नाच गाने के बाद जब नैनी पालकी में बैठकर जाती थी तो स्वयं महाराजा पालकी को कंधा देते थे। एक बार स्वामी दयानन्द सरस्वती जब जोधपुर आए तो मेहराजगढ़ किले में महाराजा के बुलावे पर जब वह वहां गए तो महाराजा के आचरण को देखकर क्रुद्ध होकर उन्होंने कुछ अपशब्द कह दिए, पालकी में बैठी नैनी अपने प्रियतम के बारे में बोले गए शब्दों से जलभुन गई तो उसने उनके अपमान का बदला स्वामी जी के रसोइये से मिलकर दूध में पिसा हुआ कांच पिलाकर लिया, जिससे स्वामीजी की मृत्यु हो गई थी।
महाराजा नैनी के इस कृत्य से दु:खी हो उठे लेकिन वह मजबूर थे। बाद में अमीर-उमरा व प्रमुखों ने महाराजा से नैनी को अलग-थलग करने का मौका ढूंढा। महाराजा जब एक बार शिकार खेलने जोधपुर से बाहर गए तो पीछे से नैनी को महल से निकल जाने का आदेश दिया गया। तब नैनी ने अपनी मां के मरणोपरांत अपनी हवेली छोड़कर महाराजा द्वारा बनाए गए मंदिर में शरण ले ली जहां सभी सुविधाएं थीं।
महाराजा का मोह नैनी से फिर भी भंग न हुआ और वे घंटों मंदिर की सीढ़ियों पर खड़े होकर नैनी के रूप सौन्दर्य को निहारते रहते थे। वि.स. 1952 को महाराजा जसवंत सिंह के निधन के बाद नैनी इसी मंदिर में रही हालांकि उसके बुढ़ापे के दिन काफी दु:खद भरी स्थिति में रहे चूंकि राज परिवार से उसका सम्पर्क टूट चुका था। रूपगर्विता नैनी 23 अगस्त, 1909 को खूनी बवासीर से पीड़ित होकर इस संसार से विदा हो गई।
मरणोपरांत नैनीबाई के मंदिर रूपी महल से छह सौ जोड़ी कीमती हीरे पन्ने व नगीनों से जड़ित जूतियां, आठ सौ स्वर्ण कढ़ाईयुक्त घाघरे, व बेशुमार आभूषण व कीमती सामान मिला था। नि:संतान होने की वजह से राजनियम कायदे कानून के मुताबिक नैनी बाई का सारा सामान नीलाम कर शिक्षण संस्थाओं को दान स्वरूप भेंट कर दिया गया।
नैनीबाई के मंदिर में शिव पंचायत प्रतिमाएं हैं तो एक विशाल कामनंदी की प्रतिमा है जिसे स्वयं महाराजा ने विक्रमी संवत् 1942 में मंदिर को भेंट किया था। कृष्ण और राधिका को समर्पित मंदिर के सभामंडप के दोनों ओर विष्णु और गरुड़ तथा हनुमान की प्रतिमाएं हैं। नैनी के मंदिर का पूरा जिम्मा पुरातत्व विभाग के अधीन है। इस भव्य मंदिर को देखने बड़ी संख्या में देशी और विदेशी सैलानियों का तांता लगा रहता है।





