दादा-दादी और नाना-नानी से जुड़ीं बचपन की यादें
आज के लिए विशेष
बचपन वह सफेद कागज़ है जिस पर दादा-दादी और नाना-नानी अपने प्यार की स्याही से ऐसी लकीरें खींचते हैं जो जीवन भर मिटती नहीं। उनकी गोद दुनिया का सबसे सुरक्षित किला होती थी। दादी की गोद में सिर रखकर सुनी राजा-रानी की कहानियों में ऐसा जादू था कि मेरी आंखें अपने आप बंद हो जाती थीं। वो कहानियां किसी किताब में नहीं लिखी थीं, वे दादी के अनुभव और ममता से निकली थीं। हर कहानी के आखिर में सच की जीत होती थी और उस जीत के साथ नींद की आगोश में चले जाते थे। उनको स्नेह और दुलार को समर्पित प्रत्येक वर्ष 13 सितम्बर को दादा-दानी, नाना-नानी दिवस मनाया जाता है। दादा जी की उंगली पकड़कर खेतों में जाना किसी स्कूल की सैर से कम नहीं था। वह हर पौधे का नाम बताते, हर चिड़िया की भाषा समझाते। उनके खुरदुरे हाथों में एक अजीब-सी ठंडक होती थी। जब वह हमारे सिर पर हाथ फेरते तो ऐसे लगता जैसे पूरी दुनिया की बला टल गई हो। दादा जी की जेब से मिली पांच पैसी की गोली या सौंफ की कैंडी आज की महंगी चॉकलेट से कहीं ज़्यादा मीठी लगती थी। उनकी धोती के पल्लू से पोंछा गया चेहरा रेशमी रूमाल से ज़्यादा सुकून देने वाला था।
ननिहाल जाना जैसे ईद हो जाती थी। नानी के हाथ के परांठे में मां के परांठे से ज़्यादा घी और ज़्यादा प्यार होता था। वह चुपके से हमें दूध और मलाई खिलातीं और कहतीं,‘माँ को मत बताना।’ वह ‘मत बताना’ वाला राज़ ही हमारे और नानी की साझ का सबसे मीठा रिश्ता था। नानाजी हमें अपने कंधों पर बिठाकर मेला दिखाने ले जाते थे। उनके कंधे उस समय दुनिया का सबसे ऊंचे झूला प्रतीत होते थे। मेले से लाया गया मिट्टी का घोड़ा या खिलौना यदि आज भी कहीं पड़ा हो, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे नाना जी की खुशबू आ रही हो।
उनकी रसोई से आती सौफ और इलायची की महक, उनके बिस्तर पर बिछी ठंडी खादी की चादर, उनका सुबह जल्दी उठकर ‘वाहेगुरु’ कहना—ये सब हमारे बचपन का राग थी। सर्दियों की रातों में नानी के पास बैठकर आग सेंकना और उनके मुख से पुराने वक्त से किस्से सुनना, गर्मियों की दोपहर में नानी के पंखे की हवा में कहानियां सुनना, ये सुख आज ए.सी. वाले कमरों में भी नहीं मिलता। उनके पास हमारे लिए समय ही समय होता था। न कोई फोन की घंटी, न टीवी का शोर। बस हम और उनका निस्वार्थ प्यार।
आज जब हम बड़े हो गए हैं, नौकरी और कारोबार में व्यस्त हो गए हैं, तो समझ आता है कि दादा-दादी, नाना-नानी सिर्फ रिश्ते नहीं थे, वे तो हमारे संस्कारों की पहली पाठशाला थे। उन्होंने बिना किसी किताब के हमें संतोष करना सिखाया, साझ सिखाई, बड़ों का सम्मान करना सिखाया। उनके प्यार और दुलार में जो सिद्धांत थे, वे आज की मोटी-मोटी किताबों में भी नहीं मिलते। उनके जाने के बाद घर की दीवारें सूनी लगती हैं। उनका खाली बिस्तर देखकर आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन वे गए नहीं हैं।
वे हमारी बोल-चाल, हमारे व्यवहार और हमारी आदतों में जीवित हैं। जब हम अपने बच्चों को वही लोरी सुनाते हैं जो हमारी दादी सुनाया करती थीं, जब हम वही कहानी दोहराते हैं जो हमारे दादा जी सुनाया करते थे, तो ऐसा लगता है कि वे हमारे भीतर ही कहीं बैठे हैं। बचपन की वे यादें दरअसल में यादें नहीं, हमारी आत्म की पूंजी हैं। यह वह दौलत है जो शेयर मार्केट में नहीं बिकती, जो बैंक के लॉकर में नहीं रखी जाती। यह तो दिल के कोने में सम्भाली वह पोटली है, जिसे जब चाहो खोल लें, आंखें भर आती हैं और होठों पर मुस्कान आ जाती है। काश, वे दिन फिर से आ जाएं। काश, एक बार फिर उनकी गोद नसीब हो जाए।
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