‘जेन-ज़ी’ के लिए परीक्षा होगा दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 18 सितम्बर को होने वाला है। वैसे तो इस चुनाव पर हमेशा देश भर की नज़र रहती है, लेकिन इस बार का चुनाव खास दिलचस्पी वाला होगा। इसके दो कारण है। पहला तो यह कि पेपर लीक और परीक्षा की गड़बड़ियों को लेकर दिल्ली में हुए छात्रों के प्रदर्शन के बाद यह पहला चुनाव है। चुनाव से ठीक पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैम्पस के पास सत्य निकेतन में एक पीजी हॉस्टल की इमारत गिरने की घटना में पांच छात्रों सहित सात लोगों की मौत हुई है। इसके बाद से दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए हॉस्टल की कमी एक बड़ा मुद्दा बनी है। दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में दिलचस्पी का दूसरा कारण यह है कि जंतर-मंतर पर धरने का साझा तौर पर नेतृत्व करने वाली आईसा ने इस बार दूसरे कम्युनिस्ट छात्र संगठन एसएफ आई से हाथ मिलाया है। एसएफ आई सीपीएम का छात्र संगठन है, जबकि आईसा सीपीआई माले का संगठन है। आईसा की नेहा बोरा भी जंतर-मंतर पर 20 दिन तक भूख हड़ताल पर रही थी। वे दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनाव लड़ाएंगी। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ आने का बड़ा असर चुनाव नतीजों पर होगा। अगर ‘जेन-ज़ी’ को अपनी नाराज़गी जतानी है तो भाजपा और कांग्रेस की बजाय वे उस संगठन को चुन सकते हैं, जिसने छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया था। भाजपा को इसका अंदाज़ा है। इसीलिए चुनाव से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंचे और श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में ‘जेन-ज़ी’ को संबोधित किया।
फिर दीये जलाने का अभियान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन और उनके सत्ता भोग के 25 साला कार्यकाल को धूमधाम से मनाने की भाजपा ने लंबी-चौडी योजना बनाई है, जिसे ‘सेवा संकल्प अभियान’ का नाम दिया गया है। इसका अहम पहलू यह है कि भाजपा ने भारत सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों से प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन 17 सितम्बर को अपने घर के आगे या छत पर शाम 7 बजे दीया जलाने की अपील की है। इसे आशीर्वाद का दीया कहा जा रहा है। हालांकि यह अपील की तरह नहीं है, क्योंकि भाजपा और उसकी राज्य सरकारें योजनाओं के लाभार्थियों के घर पर दीये पहुंचा रही हैं। हो सकता है कि दीया जलाने के लिए तेल, बाती और कुछ अन्य चीजें भी पहुंचाई जाएं। वैसे तो प्रधानमंत्री के लिए भाजपा लाभार्थियों का आशीर्वाद मांग रही है, लेकिन सोशल मीडिया में इसे आभार कहा जाने लगा है। कहा जा रहा है कि सरकार चाहती है कि लाभार्थी आभार जताएं। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी के शासन का यह तीसरा मौका है, जब लोगों से दीया जलाने को कहा जा रहा है। सबसे पहले कोरोना महामारी के समय ताली-थाली बजवाने के बाद मोदी ने देशवासियों से अपने घर पर दीया जलाने को कहा था। इसके बाद अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन के समय हिंदुओं से अपील की गई कि वे अपने घर के सामने दीया जाएं। अब सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से अपील की जा रही है कि वे अपने घर के सामने दीया जलाएं और सरकारी खज़ाने से दी जा रही सुविधाओं के लिए प्रधानमंत्री का आभार माने।
शिवकुमार-सिद्धारमैया के बीच ईडी की एंट्री
कर्नाटक में कांग्रेस की राजनीति अभी गरमा ही रही थी, सिद्धारमैया सक्रिय हुए ही थे और उन्होंने अपने अहिंदा वोट आधार पर फिर से जगाना शुरू किया था कि इस बीच राज्य में ईडी की एंट्री हो गई है। यह बहुत दिलचस्प घटनाक्रम है, क्योंकि ईडी ने जिनको निशाना बनाया है वे पहले सिद्धारमैया के सबसे बड़े समर्थक थे और जबसे डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री बने हैं तब से वे उनके साथ हो गए हैं। बेलगावी इलाके में सबसे ज्यादा असर रखने वाले जरकिहोली परिवार के सतीश जरकिहोली के यहां ईडी ने छापा मारा। उनके साथ-साथ उनकी सांसद बेटी प्रियंका और कई अन्य लोगों के यहां भी ईडी की छापेमारी हुई है। यह पूरा घटनाक्रम इसलिए भी दिलचस्प है कि जिस दिन डी.के. शिवकुमार की सरकार के एक सौ दिन पूरे हुए, उससे एक दिन पहले छापेमारी हुई। यानी यह रंग में भंग डालने वाला घटनाक्रम हो गया। गौरतलब है कि सतीश जरकिहोली अनुसूचित जनजाति समाज से आते हैं और उनका परिवार बहुत प्रभावशाली है। उनके परिवार के छह सदस्य अलग-अलग पार्टियों से विधायक, विधान पार्षद या सांसद हैं। वे सिद्धारमैया के अहिंदा समीकरण के सबसे बड़े समर्थक थे और शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के विरोधी थे, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवकुमार ने उनको इस तरह से साधा कि वे उनके समर्थक बन गए। इससे सिद्धारमैया भी उनसे नाराज़ थे। कांग्रेस के अंदर चल रही इस खींचतान के बीच ईडी ने जरकिहोली के यहां छापा मार कर एक नया आयाम खोल दिया है।
मुख्य न्यायाधीश की विवादास्पद नियुक्ति
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में एक बार फिर ‘संघीय परम्परा’ की अनदेखी की गई है। पंजाब की भगवंत मान सरकार ने इस पर विरोध जताने के लिए कैबिनेट की विशेष बैठक बुलाई, जो संकेत है कि इस मुद्दे को उसने कितनी गंभीरता से लिया है। पंजाब सरकार का आरोप है कि उसकी बगैर राय लिए जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी गई। यह हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की तय प्रक्रिया का उल्लंघन है। जजों की नियुक्ति प्रक्रिया दस्तावेज़ के पैराग्राफ 6 के तहत सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की सिफारिश के बाद संबंधित राज्य सरकार की सहमति या राय लेना अनिवार्य है। इस मामले में केंद्रीय कानून मंत्रालय ने बीते 12 अगस्त को पत्र भेजा। लेकिन राज्य सरकार के जवाब का इंतज़ार किए बिना ही 6 सितम्बर को जल्दबाजी में नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी गई। फिर राज्य मंत्रिमंडल ने जस्टिस मिश्रा के शपथ ग्रहण समारोह को रोके रखने के लिए प्रस्ताव पारित किया है। दरअसल, यह विवाद किसी एक जज की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे संघीय परम्परा एवं न्यायपालिका की साख, दोनों प्रभावित होंगी।
राघव चड्ढा पंजाब से हुए बाहर
आम आदमी पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए सांसद राघव चड्ढा का नाम पंजाब की मतदाता सूची से कट गया है। पंजाब में एसआईआर का काम चल रहा है। उसमें मसौदा सूची आई तो पता चला कि चड्ढा का नाम नहीं है। वह पंजाब से राज्यसभा के सांसद है और वहां के मतदाता थे, लेकिन जब नाम कटा तो फिर पंजाब से ही मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की बजाय वह दिल्ली में मतदाता बन गए। चड्ढा और भाजपा ने राज्य सरकार पर निशाना साधा। हालांकि एसआईआर का काम चुनाव आयोग कर रहा है और अगर आयोग चाहता तो चड्ढा का नाम नहीं कटता या आसानी से जुड़ जाता, लेकिन वह दिल्ली के मतदाता बने हैं। ध्यान रहे उन्होंने राजनीति की शुरुआत दिल्ली से ही की थी। वह दिल्ली से विधायक भी रहे। सवाल है कि क्या उनकी दिल्ली की राजनीति में वापसी हो रही है? पहले कहा जा रहा था कि पंजाब के अगले चुनाव में भाजपा की ओर से उनकी बड़ी भूमिका होगी। वह भले यहां से राज्यसभा सांसद हो, अगर मतदाता नहीं होंगे तो कोई बड़ी भूमिका शायद ही बनेगी। वैसे दिल्ली में भाजपा के पास जाट, पंजाबी, सिख, वैश्य, ब्राह्मण सभी समुदायों के नेता है। ऐसे में चड्ढ़ा को दिल्ली में ज्यादा कड़ी टक्कर मिलेगी। अगर वह हर्ष मल्होत्रा की जगह दिल्ली के कोटे से मंत्री बन जाते है तो अलग बात होगी।





