नशे के विरुद्ध निर्णायक मोड़ पर पंजाब

पंजाब का दुख अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां समाज के सामने अपने बच्चों को नशे से बचाने के साथ उन लोगों की रक्षा का प्रश्न भी खड़ा है, जो इस कारोबार के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं। मानसा में परविंदर सिंह झोटा की हत्या, गुरदासपुर में हमले के बाद बिक्रमजीत सिंह की मृत्यु और संगरूर में गुलजार सिंह की आत्महत्या से जुड़े गंभीर आरोपों ने प्रदेश की अंतरात्मा को झकझोरा है। अलग परिस्थितियों में हुई इन घटनाओं ने एक साझा चिंता सामने रखी है। यदि नशे का विरोध करने वाला नागरिक ही सुरक्षित नहीं है, तो समाज इस अभिशाप के विरुद्ध निर्भय होकर कैसे खड़ा होगा? केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा तीनों मामलों की रिपोर्ट मांगा जाना इस चिंता की गंभीरता को रेखांकित करता है।
इसी पृष्ठभूमि में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए आगे आना महत्वपूर्ण है। उनकी प्रस्तावित पंजाब यात्रा इन परिवारों की न्याय की पुकार को देश की आंतरिक सुरक्षा का दायित्व संभाल रहे नेतृत्व तक सीधे पहुंचाने का अवसर है। इससे नशे के विरुद्ध संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर की शक्ति, बेहतर समन्वय और स्पष्ट दिशा मिलने की आशा जगी है। पंजाब को आज ऐसी ही पहल की आवश्यकता है, जो नागरिकों के साहस को संस्थागत सुरक्षा दे और तस्करी के संगठित तंत्र पर लगातार प्रहार कर सके।
अमित शाह की इस पहल से जुड़ी अपेक्षाओं के पीछे उनके पिछले कार्यों का आधार भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधान हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया में उनकी केंद्रीय भूमिका रही। नक्सलवाद के विरुद्ध अभियान में सुरक्षा कार्रवाई, राज्यों के बीच समन्वय और विकास को साथ आगे बढ़ाया गया। अक्तूबर 2025 की सरकारी जानकारी के अनुसार नक्सल प्रभावित ज़िलों की संख्या घटकर 11 रह गई थी। यह अनुभव बताता है कि लंबे समय से जड़ें जमा, संकटों का दायरा भी दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और निरंतर कार्रवाई से सीमित किया जा सकता है। पंजाब की नशा विरोधी मुहिम को इसी दृढ़ता और निरंतरता की आवश्यकता है।
परविन्दर सिंह झोटा की हत्या जैसी घटनाएं इसी बेखौफ आपराधिक मानसिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। नशे के विरुद्ध बोलने वाले व्यक्ति पर हमला समाज के साहस को भी चोट पहुंचाता है। इससे दूसरे शिकायतकर्ताओं और गवाहों के मन में भय पैदा होता है। इस भय को दूर करना शासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। शिकायत दर्ज कराने से लेकर जांच और अदालत में गवाही तक नागरिक को सुरक्षा का भरोसा मिलना चाहिए। जहां पहले दी गई शिकायतों पर कार्रवाई में लापरवाही हुई होए उसकी जिम्मेदारी भी तय हो।
आम आदमी पार्टी की सरकार इस जवाबदेही से बच नहीं सकती। नशे के खात्मे का भरोसा देकर सत्ता में आई सरकार से पंजाब के लोग अपने बच्चों की सुरक्षा का हिसाब मांग रहे हैं। सरकार बताए कि नशे के विरुद्ध शिकायत करने वालों की रक्षा के लिए उसके पास कौन सी प्रभावी व्यवस्था है। गंभीर शिकायतों पर कार्रवाई की समय सीमा क्या है और लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है? नागरिकों का विश्वास इन प्रश्नों के ठोस उत्तर और उनके अनुरूप कार्रवाई से बहाल होगा।
इस पूरे संघर्ष को सबसे गहरा नैतिक बल पूर्व सैनिक भीम सिंह जी के धैर्य से मिल रहा है। जिस पिता के बेटे का अंतिम संस्कार तक न हुआ हो, जिसके बेटे का शव मोर्चरी में रखा हो, उसके भीतर बीत रहे समय का बोझ शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। बेटे को अंतिम विदाई देने की घड़ी भी न्याय की प्रतीक्षा में ठहरी हुई है। ऐसी असहनीय पीड़ा में भी समाज को संयम और एकजुटता का संदेश देना असाधारण आत्मबल का परिचय है।
श्री अमित शाह की प्रस्तावित यात्रा से भीम सिंह जी ने न्याय मिलने की उम्मीद व्यक्त की है। पीड़ित पिता की इस आशा को महत्व मिलना चाहिए। 
इसके साथ ही पंजाब को सजग रहना होगा। साझा संघर्ष को गुटों में बांटने, परिवारों की पीड़ा को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में उलझाने अथवा जन एकजुटता को कमजोर करने की किसी भी कोशिश से बचना आवश्यक है। उचित प्रश्न पूछना और जवाबदेही मांगना इस मुहिम को मजबूत करता है लेकिन किसी दल या संगठन का राजनीतिक लाभ पीड़ित परिवारों के न्याय और पंजाब की नशामुक्ति से बड़ा नहीं हो सकता। इस संघर्ष की दिशा तय करते समय परिवारों की गरिमा और उनके उद्देश्य को केंद्र में रखना होगा। पंजाब के सामने आज अपने साझा दुख को साझा संकल्प में बदलने का अवसर है। भीम सिंह जी का धैर्य और एकजुटता का आह्वान इस संकल्प को नैतिक आधार देते हैं। अमित शाह की पहल इसे राष्ट्रीय स्तर की कार्रवाई से जोड़ने की आशा जगाती है। इस अवसर को निरंतर, जवाबदेह और परिणाम देने वाले अभियान में बदलना होगा। परविंदर सिंह झोटा, बिक्रमजीत सिंह और गुलजार सिंह के परिवारों को न्याय मिले तथा दूसरे परिवार ऐसी पीड़ा से बच सकें। निर्णायक दौर की वास्तविक पहचान तभी बनेगी, जब नशे का कारोबार करने वाला कानून से डरे और उसके विरुद्ध आवाज उठाने वाला नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस करे।

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