ब्लैक ब्लॉक की आग में क्यों जल रहा है फ्रांस ?
फ्रांस में अक्तूबर 2026 में बढ़ती महंगाई, जीवनयापन की उच्च लागत और गिरती सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ देशव्यापी हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने हाल के वर्षों की सबसे भीषण अशांति का रूप ले लिया है। हालांकि सबसे अशांत दिन 17 अक्तूबर 2026 का रहा जब लिमोगेस के ऐतिहासिक टाउन हॉल को आग लगा दी गई, दुकानों को लूटा व नुकसान पहुंचाया गया बिल्डिंगों को नारों से पोत दिया गया और जगह-जगह पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें आज भी जारी हैं। पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ रही है। लाखों लोग सड़कों पर हैं। एक प्रदर्शनकारी की दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई है, 2,400 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है, जबकि 600 से ज्यादा अधिकारी घायल हुए हैं। चश्मदीद गवाहों को स्थिति ‘युद्ध भूमि’ जैसी प्रतीत हो रही है। साथ ही चिंताजनक यह भी है कि फ्रांस की आग यूरोप के अन्य देशों में भी फैलने लगी है। मिलान व इटली के कई शहरों में दुकानों में लूट, पत्थरबाज़ी और प्रदर्शनकारियों व पुलिस के बीच हिंसक झड़पें रिपोर्ट हुई हैं। पुर्तगाल में लिस्बन के रोसियो स्क्वायर पर सैंकड़ों लोग एकत्र हैं और वे अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन करने की धमकी दे रहे हैं। ध्यान रहे कि एक सप्ताह पहले लिस्बन में पुलिस ने एक हाउसिंग प्रोटेस्ट कैंप से प्रदर्शनकारियों को जबरन हटाया था, जिसमें लगभग 40 व्यक्ति चोटिल हो गये थे। इस घटना के बाद से प्रदर्शन देशव्यापी हो गया है, महंगे किराये, कम वेतन और बढ़ते फूड व फ्यूल के कारण।
बहरहाल, फ्रांस में देशव्यापी आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ बल्कि इसके पीछे अनेक मुख्य कारण हैं। इस संकट की शुरुआत सितम्बर 2026 के मध्य में पेरिस के उपनगरों से स्कूली छात्रों और शिक्षकों के स्थानीय प्रदर्शन से हुई थी। प्रदर्शनकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी, कक्षाओं में अत्यधिक भीड़, जर्जर बुनियादी ढांचे और भीषण गर्मी (यूरोपीय हीट वेव) के दौरान खराब स्थितियों का विरोध कर रहे थे। बाद में इस छात्र आंदोलन में ट्रेड यूनियन, पूर्व ‘येलो वेस्ट’ आंदोलनकारी और आम नागरिक भी शामिल हो गये। लोग ईंधन की आसमान छूती कीमतों, बढ़ती महंगाई और जीवनयापन की भारी लागत से बेहद नाराज़ हैं। दरअसल, नागरिक सरकार द्वारा सार्वजनिक सेवाओं की अनदेखी और केवल अमीरों को फायदा पहुंचाने वाली नीतियों के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। नाराज़गी व गुस्से के ये कारण आपको सुने सुने से लग रहे होंगे। संसार के अधिकतर देशों में यही समस्याएं हैं और इन्हीं कारणों से छात्र व आम नागरिक सड़कों पर हैं। अत्यधिक पूंजीवाद ने सरकारों की मदद से चंद लोगों को तो करूं का खज़ाना दे दिया है और अधिकतर नागरिक रोटी-रोज़ी के लिए दर-दर भटकने के लिए मजबूर हैं।
लेकिन समस्याओं का समाधान करने की बजाय फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों, प्रदर्शनकारियों को ‘भारी कीमत चुकाने’ की धमकी दे रहे हैं और उन्होंने स्थानीय मेयरों व अधिकारियों को ज़रूरत पड़ने पर प्रदर्शनों को प्रतिबंधित करने के अधिकार दिये हैं। मैक्रों दस वर्ष सत्ता में रहने के बाद 2027 में अपने ऑफिस को छोड़ देंगे। उनका कार्यकाल सामाजिक बेचैनी, कमज़ोर अर्थव्यवस्था और निरंतर बढ़ते कज़र् से परिभाषित किया जा रहा है। फ्रांस में 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव से पहले इस संकट ने मैक्रों सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बना दिया है।
फ्रांस में सरकारी खर्च का लगभग एक चैथाई पेंशन अदा करने में चला जाता है। वैसे इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि फ्रांस ने हर चंद वर्षों के बाद भीषण प्रदर्शन करने की आदत सी बना ली है। इसलिए वर्तमान अशांति, आगज़नी व अव्यवस्था को अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। इन प्रदर्शनों में एक निश्चित पैटर्न देखने को मिलता है। सिर से पांव तक काले कपड़े पहनकर लोग ब्लैक ब्लाक एजेंडा के लोग एक खास शैली में प्रदर्शन करते हैं- तेज़ी से आना और तोड़फोड़ करके फरार हो जाना। इस अल्पकालीन रणनीति से फ्रांस की त्वरित ज़रूरतें- गहरा राजनीतिक विभाजन, अत्यधिक कज़र् व युवाओं में बेचैनी, तो संबोधित नहीं होती हैं बल्कि तनाव व अशांति व्याप्त हो जाती है। ऊपर बताया जा चुका है कि प्रदर्शनों का वर्तमान चक्र छात्रों की मांगों से आरंभ हुआ, लेकिन अब रिकॉर्ड कज़र् और अतिवादियों के बीच भयंकर विभाजन ने संकट को भंवर में परिवर्तित कर दिया है। मार्सैय के मेयर के अनुसार, ‘छात्रों व अन्यों की मांगें जायज़ हैं, लेकिन अब उन्हें कोई सुन नहीं रहा है क्योंकि इडीयट्स (ब्लैक ब्लाक) हर जगह तोड़फोड़ कर रहे हैं।’ यह बात सही प्रतीत होती है।
दार्शनिकों का देश फ्रांस अपने आपसे ही अर्थपूर्ण वार्ता नहीं कर पा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक एलेग्जेंडर कौचनर के मुताबिक, ‘फ्रांस राजनीतिक बहस नहीं कर पा रहा है कि वह कहां खड़ा है और अब उसे कहां जाना है।’ दरअसल, फ्रांस व यूरोप के अन्य विकसित देश, जो संसार के जीवनशैली सुपरपॉवर हैं, को लम्बे समय से नये सामाजिक संतुलन की आवश्यकता है जो उपनिवेशवाद से मुक्त संसार में पीढ़ियों व वर्गों के बीच की उम्मीदों का प्रबंधन कर सके यानी पैसे का वितरण इस तरह से हो कि युवा व बुज़ुर्ग और अमीर व गरीब किसी हद तक संतुष्ट हो सकें। वैसे नये आर्थिक संतुलन की ज़रूरत तो सिर्फ फ्रांस को ही नहीं बल्कि स्पेन, इटली आदि अन्य यूरोपीय देशों के साथ एशिया व अफ्रीका के देशों को भी है जहां युवा सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



