किसानों की आय में वृद्धि कैसे हो ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सन् 2022 तक किसानों की आय दोगुणा करने का लक्ष्य खटाई में पड़ गया लगता है। किसानों को उनके उत्पादन का लाभदायक मूल्य मिले इस लिए निर्यात बढ़ने की आवश्यकता है, उत्पादकता में वृद्धि और लाभदायक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) भी आवश्यक है। किसानों, सरकार और कृषि विशेषज्ञों का ध्यान अधिकतर किसानों द्वारा कृषि कानून रद्द करवाने संबंधी चल रहे संघर्ष की ओर है। दिल्ली सीमा पर किसानों द्वारा किसान आन्दोलन में भारी संख्या में शमूलियत का प्रभाव फसलों की देख-रेख पर पड़ना स्वाभाविक है। चाहे पीछे उनके परिवार के अन्य सदस्य जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, फसलों की देख-रेख में सहायक हो रहे हैं। 
रेलगाड़ियां बंद होने का कारण यूरिया का समय पर किसानों को उपलब्ध न होना और कृषि सामग्री की उपलब्धता में इसी तरह की अन्य रुकावटें पैदा होने से भी उत्पादकता प्रभावित होना संभावित है। उत्पादकता प्रभावित होने से किसानों की आय कम होगी और उन्हें जो अब कृषि मज़दूर लगा कर कृषि कार्य करवाने पड़ रहे हैं, उनसे फसल पर लागत बढ़ेगी, जिस के बाद उनकी वास्तविक आय प्रभावित होगी। 
सन् 2019-20 में चावलों का उत्पादन 118.43 मिलीयन टन और गेहूं का 107.59 मिलीयन टन रिकार्ड हुआ। घरेलू खपत कम होने से निर्यात के लिए अधिक मात्रा में दोनों मुख्य फसलें उपलब्ध हो रही हैं, जिसके लिए विदेशी मंडी देखनी पड़ेगी। अब बंगलादेश जैसे देश भी भारत से गेहूं खरीदने के लिए आगे आ रहे हैं। भारत में गेहूं की एम.एस.पी.आस्ट्रेलिया, फ्रांस, अमरीका, रूस और कैनेडा जैसे देशों से अधिक होने के कारण निर्यात हेतु कड़े प्रयास करने पड़ेंगे। भारत की एम.एस.पी. 25 डालर प्रति टन के लगभग इन देशों की कीमत से अधिक है। 
अर्थशास्त्र विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहां पूर्णत: सरकारी खरीद नहीं, उन स्थानों से गेहूं 1700-1800 रुपये प्रति क्ंिवटल उपलब्ध हो जाती है, जबकि पंजाब, हरियाणा में 1975 रुपये एम.एस.पी. पर ही मिलती है। चावलों के क्षेत्र में वियतनाम और थाईलैंड जैसे देश भारत के मुकाबले में हैं। अमरीका 14 मिलीयन टन चावल इस वर्ष भारत से खरीदना चाहता है। किसानों की मुख्य मांग लाभदायक एम.एस.पी. को उनका कानूनी अधिकार बनाने संबंधी है। भारत के किसानों (पंजाब, हरियाणा सहित) को दूसरे देशों के मुकाबले उनकी उपज से लाभ कहीं कम हो रहा है, क्योंकि उन देशों में कृषि पर सबसिडी अधिक है। 
भारत में कृषि योग्य रकबा कम होता जा रहा है। औसत खेत का आकार 1.2 हैक्टेयर से कम होकर 1.08 हैक्टेयर पर रह गया है। कृषि क्षेत्र 45 प्रतिशत जनसंख्या को रोज़गार उपलब्ध करता है। करियाना की 120 लाख के करीब दुकानें और उद्योग क्षेत्र का विकास भी कृषि पर ही आधारित है। चाहे डीजीपी में कृषि का योगदान कम होकर 16 प्रतिशत पर आ गया है परन्तु कृषि क्षेत्र आज भी आर्थिकता का केन्द्र है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए उत्पादकता, निर्यात पर एम.एस.पी. बढ़ने के अतिरिक्त कृषि पदार्थों का मांग बढ़ाने की आवश्यकता है।
 किसानों की आय कम होने का कारण यह भी है कि भारत में कृषि पदार्थों की कीमत विश्व के दूसरे देशों के मुकाबले बहुत कम है। यदि किसानों की आय बढ़नी है तो कृषि पदार्थों के निर्यात और कृषि उपज की मांग को बढ़ाना होगा। भारत कपास, नरमे का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक है (जिस में गेहूं एवं धान की तरह पंजाब का बड़ा योगदान है)। चीन को छोड़ कर सब्ज़ियों एवं फलों में भारत का विश्व में सबसे बड़ा स्थान है परन्तु कृषि पदार्थों के निर्यात में भारत को शीर्ष दर्जा हासिल नहीं है। इसलिए निर्यात को बढ़ाने की आवश्यकता है। किसानों की आय को बढ़ाने में अनाज उत्पादन एवं फलों, सब्ज़ियों आदि का सुरक्षित भंडारण भी अहम भूमिका अदा करते हैं। 
जनसंख्या तेज़ी से बढ़ने के बावजूद कृषि पदार्थों में बहुतायत की समस्या दरपेश है। इस समय सब्ज़ियों एवं फलों का उत्पादन अनाज उत्पादन से भी अधिक है। लोगों के खाने-पीने में आ रहा परिवर्तन अनाज की खपत कम करने में हावी होगा। इसलिए भविष्य में फसलों की काश्त में विभिन्नता लाने की आवश्यकता है। पंजाब, हरियाणा के पास बासमती का जी आई टैग है। इन राज्यों को बासमती की काश्त अधिक लाभदायक रहेगी। सरकार द्वारा भी इनका निर्यात बढ़ाने के लिए योग्य प्रयास किये जाने चाहिएं। अपेडा को भी निर्यात बढ़ाने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। भारत आमों का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक देश है परन्तु भारत के मुकाबले पाकिस्तान विदेशों को अधिक आम भेज रहा है। सरकार को ऐसी नीति अपनानी चाहिए, जिससे किसानों की आय बढ़ सके।