जो गुरु की शरण में आता है, उसे माफी मिलती है

जो सरणि आवै तिसु कंठि लावै
इहु बिरदु सुआमी संदा (अंग 544)
साहिब श्री गुरु अर्जुन देव जी का कथन है कि मालक-प्रभु का मौलिक स्वभाव है कि जो जीव उसकी शरण में आता है, उसे वह अपने गले से लगा लेता है। गुरबाणी की उक्त पंक्ति उस समय की बार-बार मेरे दिमाग में दस्तक दे रही है, जब से विपक्ष के नेता राहुल गांधी दो दिवसीय दौरे पर श्री दरबार साहिब के दर्शनों के लिए आए हुए थे। वह बिना किसी राजनीतिक दिखावे तथा बिना अपनी पार्टी के लाव-लश्कर के श्री दरबार साहिब में सेवा करते तथा कथा कीर्तन करते दिखाई दिये, परन्तु कुछ अकाली नेताओं द्वारा उन्हें उनकी दादी के कर्मों की माफी मांगने के लिए कहा जा रहा है। 
हम समझते हैं कि जब कोई चल कर गुरु साहिब के चरणों में झुकने के लिए आ गया है तो वह अपने मन में माफी मांग कर ही आया होगा। राहुल गांधी इस समय भारतीय राजनीति का एक केन्द्र हैं। नि:संदेह वह ‘इंडिया’ गठबंधन द्वारा अभी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, परन्तु वास्तविकता यही है कि यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सत्तारूढ़ पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं तो विपक्ष के सबसे बड़े नेता इस सयम राहुल गांधी ही हैं। 
माफ करना, मैं राहुल गांधी की साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के साहिबज़ादों के साथ तुलना करने की हिमाकत या जुर्रअत नहीं कर रहा, अपितु सिद्धांत की बात कर रहा हूं। गुरु साहिब के दो छोटे मासूम साहिबज़ादों को सूबा सरहिंद ने सिर्फ इसलिए नींवों में चिनवा कर शहीद कर दिया था कि वे साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के बेटे थे। आज तक इतिहास म़ुगल साम्राज्य तथा सूबा सरहिंद को इस गुनाह-ए-अज़ीम के लिए लाहनतें देता है। यहां सैद्धांतिक बात उभरती है कि हुकूमत से टक्कर तो साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह की थी, उनके मासूम साहिबज़ादों का क्या दोष था जो उन्हें दर्दनाक सज़ा-ए-मौत दी गई। इस सैद्धांतिक बात के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए कि 1984 के दरबार साहिब पर हमले तथा सिख कत्लेआम के समय 14 वर्ष के राहुल तथा 12 वर्ष की प्रियंका गांधी की तो कोई भूमिका नहीं थी। इसलिए उनकी दादी इंदिरा गांधी या पिता राजीव गांधी के ज़ुल्मों के लिए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। परन्तु चलो, चाहे हम उन्हें सिख विरोधी परिवार में से मान कर उनका विरोध जारी भी रखें, परन्तु जब वह गुरु घर के दर पर आये हैं, वहां झुके हैं, उन्होंने वहीं सेवा की है तो यह समझ लेना चाहिए कि उन्होंने अपने अन्तर्मन में कुछ तो महसूस किया ही होगा। 
हमारी जानकारी के अनुसार राहुल गांधी चाहे सार्वजनिक तौर पर तो दो-तीन बार ही श्री दरबार साहिब में आएं हैं, परन्तु कुछेक बार वह पूरी तरह गुप्त रूप में भी यहां सिर झुका कर गए हैं। हमें तो यह भी बताया गया है कि प्रियंका गांधी भी तीन-चार बार श्री दरबार साहिब में चुप-चाप गुप्त रूप में सिर झुका कर गई हैं। राहुल गांधी ने अपनी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान बेशक रास्ते में आए कुछ मंदिरों तथा मस्जिदों में सिर झुकाया, परन्तु वह इस दौरान विशेष तौर पर कहीं नहीं रुके, कहीं भी उन्होंने अपनी यात्रा नहीं रोकी, परन्तु इस दौरान भी वह अपनी यात्रा बीच में रोक कर विशेष तौर पर श्री दरबार साहिब में सिर झुकाने के लिए पहुंचे थे। 
वैसे राहुल गांधी शायद एक से अधिक बार 1984 की घटनाओं के लिए दुख व्यक्त कर चुके हैं और माफी भी मांग चुके हैं। यह अलग बात है कि उन्होंने श्री अकाल तख्त साहिब तथा जत्थेदार साहिब के सामने या प्रैस के सामने माफी नहीं मांगी। अभी कुछ महीने पहले की ही बात है कि राहुल गांधी इंडियन ओवरसीज़ कांग्रेस की रैली में शामिल होने के लिए न्यूयॉर्क गए थे। उस वक्त उन्हें मिलने वाले एक सिख प्रतिनिधिमंडल के सामने भी एक सवाल उठाए जाने पर उन्होंने इसके लिए माफी मांगी थी। चाहे उनके दौरे का प्रबंध कर रहे लोगों ने राजनीतिक कारणों से इसे प्रैस में देने से संकोच किया था। 
पुराने वक्तों के कुछ लोग अब भी कहते हैं,
बड़ा वही है जो दुश्मन को भी म़ाफ करे। 
            (अ़ख्तर शाहजहांपुरी)
अकाली दल ने एक अवसर गंवाया
हालांकि शिरोमणि कमेटी ने समूचे तौर पर राहुल गांधी के दरबार साहिब में सेवा करने तथा सिर झुकाने में कोई बाधा न डाल कर समझदारी ही की है और इसके लिए उसकी प्रशंसा करनी बनती है, परन्तु अकाली दल ने सिखों के लिए राजनीतिक लाभ जो सिखों तथा अकाली दल को राजनीति के तराजू में एक तवाज़न या पास्कू बनने का अवसर दे सकता था, गंवा लिया है। 
पहले ज़रा सिख इतिहास की ओर दृष्टिपात कर लें। 5वें गुरु साहिब श्री गुरु अर्जुन देव जी की शहादत, जिसके लिए तत्कालीन बादशाह जहांगीर को मुख्य ज़िम्मेदार समझा जाता है, के बाद 6वें गुरु साहिब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के ग्वालियर के किले से रिहाई के बाद जहांगीर के साथ अच्छे संबंध रहे। बादशाह औरंगज़ेब के असहनीय तथा अकथनीय अत्याचार के बाद 10वें पातशाह साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के औरंगज़ेब के पुत्र बहादुर शाह के साथ अच्छे संबंध रहे। फिर सिखों के बड़े खूंखार दुश्मन ज़करिया खान के कहने पर म़ुगल सल्तनत ने सिखों के नेता को नवाबी की पेशकश की। तत्कालीन सिख नेताओं ने वक्त की हकीकत तथा राजनीति को समझते हुए अपनी ताकत बढ़ाने हेतु समय लेने के लिए म़ुगलों तथा ज़करिया खान जैसे ज़ालिम विरोधी की ओर से भेजी गई नवाबी की ़िखलअत स्वीकार कर ली और स. कपूर सिंह को नवाब कपूर सिंह बना लिया। इतिहास में अन्य बहुत उदाहरण हैं, परन्तु 1984 के बाद दिल्ली में परमजीत सिंह सरना कांग्रेस की मदद से ही दिल्ली गुरुद्वारा सिख प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष बने। कोई माने या न माने, वह स्वर्गीय जत्थेदार गुरचरण सिंह टौहरा के खास थे तथा जत्थेदार टौहरा की सहमति से ही वह कांग्रेस के निकट गए थे। वह तो जत्थेदार टौहरा की मज़र्ी के बिना एक कदम भी नहीं उठाते थे। फिर 1984 के बाद पंजाब में बनने वाली तीन कांग्रेस सरकारों में से बेअंत सिंह की सरकार को छोड़ कर कैप्टन अमरेन्द्र सिंह की दोनों सरकारें सिख वोटों के समर्थन से ही बनी थीं, क्योंकि कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को एक समय स. बादल से अच्छा सिख माना जाने लगा था। 
अत: मैं समझता हूं कि यदि अकाली दल इस अवसर को राहुल गांधी का विरोध करने की बजाय इस भावना से लेता कि यह उनकी माफी ही है कि वह ऐसा करके एक ओर गुरु की शरण में आने के सिद्धांत पर पहरा देता, और दूसरे, वह सिखों तथा पंजाब के हितों की रक्षा के लिए ‘इंडिया’ या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) किसी भी गठबंधन में जाने के समर्थ होता। इससे वह अपनी शर्तों पर फैसला करने में भी समर्थ हो जाता कि वह दोनों में से उस पक्ष के साथ जाएगा जो कम से कम पंजाब तथा सिखों की कुछ ज़रूरी मांगों को मानने का आश्वासन दे। 
अन्यथा अब हालत यह है कि अकाली दल कांग्रेस के कारण ‘इंडिया’ गठबंधन में जा नहीं सकता और भाजपा अभी तो उसे दुत्कार ही रही है, परन्तु यदि चुनावों के निकट समझौता करेगी भी तो नि:संदेह अपनी शर्तों पर  करेगी, पंजाबियों या सिखों या अकाली दल की शर्तों पर नहीं। वैसे भी यदि ‘इंडिया’ गठबंधन के पास पंजाब में अकाली दल को साथ लेने का विकल्प खुल जाए तो उसकी आम आदमी पार्टी पर निर्भरता भी खत्म हो जाती है, क्योंकि दिल्ली तथा पंजाब के अधिकतर कांग्रेस नेता ‘आप’ के साथ समझौते के पक्ष में ही नहीं। वैसे भी, कभी-कभी बदला लेने की अपेक्षा माफ करने का मतलब और भी गहरा होता है। फैसल आज़मी के ल़फ्ज़ों में : 
मैं ज़ख्म खा कर गिरा था कि उसने थाम लिया,
म़ाफ करके मुझे उसने इन्तकाम लिया।।
धारा 78, 79 तथा 80 का खात्मा ही एकमात्र विकल्प 
अभी पिछले सप्ताह ही इन कालमों में पंजाब के पानी के साथ अन्याय की दास्तान मैंने पाठकों के सामने रखी थी, परन्तु अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा पंजाब सरकार को एस.वाई.एल. नहर के निर्माण को लेकर लगाई गई फटकार तथा सुप्रीम कोर्ट के साफ दिखते इरादे पंजाब के पानी के लिए चिन्ता का कारण बने हैं। अब पूरी दास्तां तो दोबारा लिखना ठीक नहीं परन्तु यह दोहराना आवश्यक है कि आंखों पर पट्टी बांध कर रखती न्याय की देवी को इससे कोई मतलब नहीं कि रिपेरियन कानून के अनुसार पंजाब के पानी की एक बूंद पर भी हरियाणा का कोई अधिकार नहीं बनता अपितु अदालत के लिए यही ज़रूरी प्रतीत होता है कि नहर बनाना आवश्यक है। हम समझते हैं कि पंजाब ने यदि इस कानूनी अन्याय से बचना है तो ज़ुबानी जमा खर्र्च से कुछ नहीं होगा। इस केस में हमारे अच्छे से अच्छे वकील भी जीत नहीं सकेंगे। पंजाब को बचने के लिए पंजाब पुनर्गठन एक्ट की पानी से संबंधित असंगत तथा गैर-कानूनी धाराओं 78, 79 तथा 80 समाप्त करवाने की लड़ाई भी लड़नी चाहिए, क्योंकि इन धाराओं के कारण ही केन्द्र सरकार पंजाब तथा हरियाणा के मामले में हस्तक्षेप करने की हकदार बनी हुई है जो कि सरासर अन्याय है और संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है। नहीं तो पानी के मामले में केन्द्र सरकार तो क्या, अदालत भी रिपेरियन राज्य का अधिकार छीनने के समर्थ नहीं। 
मुन्सिफ तेरे इन्साफ से वाक़िफ हूं तभी तो,
ना-करदा गुनाहों की सज़ा ढूंढ रहा हूं।
-मो. 92168-60000