शिक्षा को गतिविधियों पर आधारित बनाना समय की ज़रूरत

 

विश्व में जापान, जर्मनी, अमरीका, आस्ट्रेलिया तथा इंग्लैंड जैसे देशों से सम्पर्क बढ़ने के कारण हमारे शिक्षा क्षेत्र में भी बहुत तेज़ी से बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इन बदलावों के तहत अब बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षा को गतिविधियों पर आधारित बनाया जा रहा है। पढ़ने-पढ़ाने तथा सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को गतिविधियों पर आधारित कैसे बनाना है, इस बारे चर्चा करने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि गतिविधियों पर आधारित शिक्षा की बच्चों को ज़रूरत क्यों हैं? पाठ्यक्रम तथा विषयों में वृद्धि होने के कारण बच्चों पर पढ़ाई का बोझ बढ़ता जा रहा है। पढ़ाई का बोझ बढ़ने के कारण उनकी सेहत भी प्रभावित हो रही है। 
शिक्षा के नए अनुसंधानों के अनुसार बच्चों पर पढ़ाई का बोझ कम करने के लिए शिक्षा को गतिविधियों पर आधारित बनाने की ज़रूरत है। इन गतिविधियों के लागू होने से बच्चों को ‘रट्टा सिस्टम’ से मुक्ति मिलेगी और वे प्रत्येक विषय को आसानी से सीख सकेंगे। गणित, अंग्रेज़ी, विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान जैसे कठिन विषयों को पढ़ना तथा सीखना उनके लिए आसान हो जाएगा। उनकी सहायक पुस्तकों (गाइडों) पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी। अध्यापक अपने आस-पास, कमरे, स्कूल परिसर, प्रयोगशालाओं में तथा अन्य मौजूदा स्रोतों का इस्तेमाल करके बच्चों को गतिविधियों के माध्यम से पढ़ा कर शिक्षा को रोचक, प्रभावशाली तथा लाभदायक बना सकते हैं।
अब अलग-अलग विषयों को पढ़ाने के लिए गतिविधियों तथा स्रोतों के इस्तेमाल की बात करते हैं। यदि कोई विज्ञान का अध्यापक छोटी कक्षाओं के बच्चों को पेड़ के भाग तने, पत्ते, जड़, शाखाओं तथा फलों के बारे में जानकारी देना चाहता है तो अध्यापक बच्चों को एक पेड़ के पास ले जाकर बहुत अच्छी तरह समझा सकता है। अंग्रेज़ी का अध्यापक कक्षा में ही अपने सामने पड़े मेज़ को खींच कर तथा धक्का देकर ‘पुल’ तथा ‘पुश’ शब्दों की जानकारी दे सकता है। इसी प्रकार यदि कोई अंग्रेज़ी का अध्यापक बच्चों को अंग्रेज़ी की डिग्रियों के बारे में जानकारी देना चाहता है तो वह ‘टाल’ शब्द की डिग्रियां टाल, टालर तथा टालेस्ट बताने वाले तीन छोटे चॉक, पैंसिलों तथा बच्चों का उपयोग कर सकता है। इसी प्रकार कोई गणित का अध्यापक कोणों के बारे में पढ़ाते समय तीन बच्चों को खड़ा करके उनकी बाजुओं की स्थिति बना कर सभी कोणों की जानकारी दे सकता है। यदि एक भाषा अध्यापक बच्चों को भाषा का शुद्ध उच्चारण तथा अनुवाद बारे जानकारी देना चाहता है तो वह अध्यापक अपनी कक्षा के तीन बच्चों से अलग-अलग भाषाएं बुलवा कर उनका शुद्ध उच्चारण तथा एक भाषा से दूसरी दो भाषाओं में अनुवाद सिखा सकता है। सामाजिक विषय का अध्यापक बच्चों को अलग-अलग देशों की भौगोलिक स्थिति, मौसम, व्यापारिक संबंधों, सभ्यताओं, परिधानों, कर्क/मकर रेखा, सीमाओं, राजधानियों, खनिज पदार्थों तथा अन्य क्षेत्रों बारे जानकारी देने के लिए बच्चों के आपसी वार्तालाप तथा स्मार्ट रूमों में लगे स्मार्ट बोडऱ्ों का इस्तेमाल करके लाभदायक जानकारी दे सकता है।
शिक्षा विभाग सीनियर सैकेंडरी कक्षाओं की पढ़ाई प्रोजैक्ट आधारित बना रहा है। प्राइमरी स्तर की शिक्षा गतिविधियों पर आधारित हो चुकी है। अब बच्चों को एल.सी.डी. से भी नहीं पढ़ाया जाता। शारीरिक अंगों, रंगों, संख्या, जोड़-घटा, गुणा, भाग, भाषाएं अब रट्टा विधी से नहीं, अपितु खेल-खेल में गतिविधियों के ज़रिये सिखाई जाती हैं। यहां चर्चा करने वाली बात यह है कि गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाई में सब कुछ अध्यापक की कार्य कुशलता पर ही निर्भर करता है।
 अध्यापक स्वयं कुर्सी पर बैठ कर बच्चों को रट्टा लगाने के लिए नहीं कहता। ‘तू पढ़’ विधि की गतिविधियों पर आधारित शिक्षा में कोई जगह नहीं होती। नई अध्यापन विधियों में अध्यापक तथा विद्यार्थी दोनों की शमूलियत होती है। आज समय की ज़रूरत के अनुसार शिक्षा को प्रभावशाली, रोचक तथा लाभदायक बनाने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षा को गतिविधियों पर आधारित बनाया जाना चाहिए। अध्यापकों को भी चाहिए कि वे बच्चों को गतिविधियों के माध्यम से शिक्षा देने के अधिक से अधिक प्रयास करें।
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