संसद से सड़क तक कैसे धड़कता है लोकतंत्र

लोकतंत्र भी धड़कता है, क्योंकि यह एक धड़कन है, कोई इमारत नहीं। यह धड़कन संसद के भीतर कानून बनाते समय तथा उनके लागू होते समय सड़क पर भी सुनाई देती है। यही कारण है कि एक जीवंत लोकतंत्र को समझने के लिए केवल संसद की कार्यवाई देखना पर्याप्त नहीं होता। किसी जीवंत लोकतंत्र को देखना हो, तो देखें कि वह जनजीवन में कैसे उतरता है और जनता उसे कैसे जीती है। भारत का लोकतंत्र आकार में विशाल है, विविधता में अद्वितीय है और चुनौतियों में जटिल है। यहां लोकतंत्र सिर्फ  मतदान करने का नाम नहीं बल्कि विचार, असहमति, सेवा, जवाबदेही और अधिकारों की संयुक्त प्रक्रिया है। जीवंत लोकतंत्र वह है जिसमें सत्ता केंद्रित नहीं रहती बल्कि जनता के जीवन कीज़रूरतों से जुड़ी रहती है यानी संसद से सड़क तक लोकतंत्र एक निरंतर प्रवाह की तरह चलता है। कभी तेज़, कभी धीमा, पर जीवित होता है।
सामूहिक इच्छाओं का घर
संसद लोकतंत्र की वह संस्था है, जहां लोकतंत्र फलता-फूलता और प्रौढ़ होता है। यह देश की सामूहिक इच्छाओं का घर है। यहां कानून और नीतियां रूप लेते हैं, क्योंकि यह वह स्थान है जहां बजट तय होता है। यह वह स्थान है जहां सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, नीतियों पर बहस होती है, कानून बनए जाते हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं की दिशा तय होती है। 
कागजों पर यह प्रक्रिया चाहे शुद्ध और आकर्षक लगती हो, लेकिन लोकतंत्र केवल कानून बनाने से नहीं बचता। वह तभी बचता है जब कानून न्यायपूर्ण और उपयोगी होते हों। जब ज़िम्मेदार लोगों में उन्हें लागू करने की इच्छा और क्षमता हो। संसद निर्णय लेने वाला केंद्र है, पर लोकतंत्र की असली परीक्षा बाहर गांव तथा शहर की गलियों में होती है। 
लोकतंत्र का सच्चा सम्पर्क
लोकतंत्र की पहली सांस लोकहित में घुली-मिली होती है। संसद में किये गये निर्णय यदि जनता की वास्तविक परेशानियों से जुड़े नहीं होते तो लोकतंत्र एक अनौपचारिक रस्म बनकर रह जाता है। जीवंत लोकतंत्र की निशानी यह है कि ऐसे समाज में हमेशा चर्चा का माहौल होता है। क्या लोकतंत्र सही ढंग चल रहा है, इस पर लगातार चर्चा होती है। क्या स्कूल समय पर खुल रहे हैं, क्ला लोगों को बिजली-पानी मिल रहे हैं या नहीं, इसकी चिंता होती है। 
सड़कें और बसें सुरक्षित हैं या नहीं, इसकी ज़िम्मेदारी की भावना का एहसास होता है। महिलाओं की सुरक्षा की निरन्तर समीक्षा होती है। जब तक लोकतंत्र इन गतिविधियों और कसौटियों पर खरा उतरता रहता है, यह  राजनीति नहीं, वह जनता का दैनिक जीवन बन जाता है। 
लोकतंत्र की धड़कन
सड़क (समाज) लोकतंत्र की सबसे सच्ची प्रयोगशाला है, क्योंकि इसी सड़क में वोटर होते हैं, तो इसी सड़क में करदाता भी होते हैं। यह सड़क श्रमिकों और छात्रों को इनकी मंजिल तक पहुंचाती है। महिलाएं, बुजुर्ग, अधिकारी और व्यवस्था के सबसे कमज़ोर लोग भी इसका हिस्सा हैं, अर्थात् सड़क लोकतंत्र का सबसे सच्चा और जीवंत घर है। एक जीवंत लोकतंत्र कागज़ों या किताबों में नहीं, अपितु जीवन में दिखाई देता है। जब लोगों को कतार में खड़े होना अपना आदर्श और धर्म लगे, वह अनुशासन को अपनी जीवनशैली का हिस्सा समझते हुए ट्रैफिक नियमों का पालन करने लगते हैं। वे सार्वजनिक संपत्तियों को बचाते हैं, उनका नुकसान नहीं करते। ये गणतांत्रिक नैतिक मूल्य कोई ढोल बजा कर नहीं आते, क्योंकि ये तो आपके अंदर ही होते हैं। 
जवाबदेही की भावना
लोकतंत्र जवाबदेही की आत्मा है। अगर नागरिकों को राशन, पेंशन, समय पर मिल रही है तो वे बिजली का तथा अन्य बिल अंतिम तारीख आने से पहले ही जमा कर देते हैं। यदि अस्पताल में डॉक्टर अपनी ड्यूटी मौजूद हैं और स्कूलों में शिक्षक विद्यार्थियों की प्रतीक्षा कर रहे हों, तो यह जीवंत लोकतंत्र है। जब संसद में जनता के प्रतिनिधि (सांसद) जनता की आवाज़ बनते हैं तो यह लोकतंत्र की जीवंत निशानी है। जब चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक लोग स्थानीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं, तो लोकतंत्र की चेतना जागृत और विकसित होती है। हर गुज़रते दिन के साथ लोकतंत्र सिर्फ  सभ्यक ही नहीं होता, बल्कि मज़बूत भी होता जाता है। 
मीडिया और नागरिक चेतना
मीडिया यूं ही गणतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं है। अगर मीडिया ज़िम्मेदार और जवाबदेह है तो लोकतंत्र की रक्षा करता है और लोकतंत्र उसे दुश्मन नहीं, एक शुभचिंतक और संरक्षक मानता है। मीडिया जब भी लोकतंत्र पर सवाल उठाता है तो वह कमज़ोर नहीं मज़बूत होता है। जब भी मीडिया लोकतंत्र की तह तक जाकर नागरिकों के अधिकारों की पड़ताल करता है, वह लोकतंत्र और मज़बूत जीवन से भरपूर होता है। तब लोकतंत्र अनावश्यक बहस के लिए जंग का मैदान या संसद शोर-शराबे की जगह नहीं होती। इसलिए जीवंत लोकतंत्र को शब्दों की बजाय गणतांत्रिक चेतना में देखा जाना चाहिए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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