चार दशकों की पीड़ा
दिल्ली के कांग्रेसी नेता और लोकसभा के सदस्य रहे सज्जन कुमार को वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के एक मामले में बरी कर दिए जाने की घोषणा ने एक बार फिर स्वतंत्र भारत के इतिहास के इन काले पृष्ठों की याद दिला दी है। देश की राजधानी में ही दंगाइयों द्वारा हज़ारों सिखों की दिन-दहाड़े हत्या कर देने ने जहां भारतीय लोकतंत्र पर एक न मिटने वाला धब्बा लगा दिया था, वहीं कानूनी जटिलताओं और इसकी कमज़ोरियों को भी एक बार फिर जग-ज़ाहिर कर दिया है। चाहे इन दंगों में शामिल लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद कुछ व्यक्तियों को सज़ाएं दिलाई जा सकी हैं, परन्तु इतने बड़े अपराध के सामने सज़ाएं बौनी दिखाई देती हैं।
इसका एक कारण यह भी है कि समय की कांग्रेस की सरकार ने किए गए इन अत्याचारों पर लगातार पर्दा डालने का पूरा यत्न किया है। ऊपर के इशारों पर हज़ारों घटनाओं को प्रभावित लोगों के यत्नों के बावजूद पुलिस थानों में दर्ज तक नहीं किया गया। जो मामले दर्ज भी किए गए, उन्हें इस तरह आधा-अधूरा कर दिया गया ताकि उनके सही सबूत ही न मिल सकें। उस समय कुछ सुचेत और न्याय को समर्पित संगठनों ने इस नरसंहार संबंधी विस्तारपूर्वक रिपोर्टें भी प्रकाशित की थीं और उनमें आरोपियों के नाम भी दर्ज किए गए थे। सज्जन कुमार तो इन रिपोर्टों के आधार पर सामने आई आरोपियों की लम्बी सूची में एक नाम ही है, बाद में हर तरफ से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दबाव पड़ने से सरकार ने रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाया था और उसके बाद जस्टिस जैन अग्रवाल आयोग बनाया गया था, परन्तु दिल्ली पुलिस और अफसरशाही द्वारा इन आयोगों को पूरा सहयोग नहीं दिया गया था और घटनाओं संबंधी शिकायतों की ज्यादातर फाइलें ही गायब कर दी गई थीं। वर्ष 2014 में मोदी सरकार द्वारा एक बार फिर हिम्मत करके जस्टिस माथुर समिति बनाई गई थी, जिसने पुराने रिकार्डों को खंगाल कर फिर से जांच शुरू की थी। इनके आधार पर ही वर्ष 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को पालम कालोनी में 5 सिखों की हत्या करने का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। इसी तरह वर्ष 2023 में फरवरी महीने उसे सरस्वती विहार में एक दोहरी हत्या के मामले में भी उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई थी।
इन दंगों से ही संबंधित जनकपुरी हिंसा के एक मामले में विगत दिवस उसे बरी कर दिया गया है। अदालत के इस फैसले के विरुद्ध व्यापक स्तर पर प्रतिक्रियाएं आई हैं। प्रभावित परिवारों द्वारा इस फैसले को अन्यायपूर्ण करार दिया गया है। चाहे इस व्यक्ति को तो जेल में ही रहना पड़ेगा परन्तु अन्य मामलों में सबूत मिटा देने के कारण न्यायिक प्रक्रिया के अधूरा रहने से जहां न्यायिक प्रणाली पर प्रश्न-चिन्ह लगा है, वहीं बड़ी संख्या में लोगों के मन पर इस कारण लगे गहरे ज़ख्मों को भरना बेहद कठिन होगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

