क्या दुनिया में लौट आया है जंगलराज ?

ग्रीनलैंड पर ट्रम्प की ‘मनमज़र्ी’

पिछले कुछ हफ्तों में डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस भाषा में नाटो सहयोगियों से बात की है, साथ ही जिस तरह से उन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर ‘पीछे न हटने’ तथा ताकत के इस्तेमाल तक की धमकी दी है, उससे एक बुनियादी डर पैदा हो गया  है और वह यह है कि क्या 21वीं सदी की दुनिया नियमों से चलने वाली व्यवस्था बनी रह सकेगी या फिर ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली व्यवस्था में लौट रही है? दरअसल यह सवाल सिर्फ  नैतिकता या कूटनीति भर का नहीं है। यह अंतर्राष्ट्रीय कानून, गठबंधनों की विश्वसनीयता, छोटे देशों की सुरक्षा और वैश्विक व्यापार संबंधी सभी तरह के मसलों से जुड़ा हुआ है।
आजकल अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं, विशेषकर ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क और यूरोप के लिए, उससे यह सवाल पैदा होता है कि आखिर नाटो क्यों बना था? साथ ही यह भी कि क्या ट्रम्प नाटो की ज़रूरत को खारिज कर रहे हैं? गौरतलब है कि द्वितीय युद्ध के बाद नाटो तथाकथित सोवियत विस्तारवाद के खतरे से निपटने के लिए बना था। तत्कालीन उद्देश्य यह था कि  यूरोप और अमरीका मिलकर एक सामूहिक सुरक्षा छाता तैयार करें। इसका मूल मंत्र इसके संविधान का अनुच्छेद  5 है, जिसका मूल कथ्य है, ‘एक सदस्य पर हमला, सब पर हमला।’ याद रखिये यह सिर्फ एक सैन्य वाक्य नहीं, यह भरोसे का वाक्य है। इसी भरोसे ने यूरोप में दशकों तक युद्ध की आग को भड़कने से बचाए रखा, लेकिन अमरीका के मौजूदा राष्ट्रपति ट्रम्प का नज़रिया हमेशा ‘लेन-देन’ रहा है, वह सुरक्षा को भी बिजनेस डील की तरह देखते हैं। साल 2025 में भी उनकी मांग रही कि नाटो सदस्य रक्षा खर्च को 2 प्रतिशत से बढ़ाकर अपने जीडीपी का 5 प्रतिशत करें। यही नहीं ऐसा न करने पर उनका साफ इशारा था कि जो देश लक्ष्य पूरा नहीं करते उन्हें बचाने पर सवाल उठ सकता है।
ट्रम्प का राजनीतिक स्टाइल ही है—दबाव बनाना, धमकी से सौदा करना और ‘पहले अमरीका’ की शर्तों पर रिश्ते तय करना, लेकिन जब यही स्टाइल अंतर्राष्ट्रीय मंच पर, खासकर संप्रभुता के मुद्दों पर इस्तेमाल होता है, तो दुनिया को संदेश जाता है—नियम नहीं, ताकत निर्णायक है। इसीलिए ग्रीनलैंड की बात वैश्विक व्यवस्था के लिए विस्फोटक है, क्योंकि वह नाटो के भीतर का मामला है। ऐसे में एक सबसे पहला सवाल यह पैदा होता है कि ग्रीनलैंड पर अगर ट्रम्प ‘ताकत’ से कब्जा कर लेते है तो क्या होगा? ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। डेनमार्क नाटो का सदस्य है। इसलिए ऐसा करने पर नाटो के यूरोपीय सहयोगियों में भारी चिंता और नाराज़गी पैदा होगी तथा इसके परिणाम बहुस्तरीय होंगे। इससे नाटो के अंदर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। अमरीका का यह कदम इस मायने में भी अभूतपूर्व होगा कि एक नाटो देश दूसरे नाटो देश के इलाके पर कब्ज़ा करे। इससे नाटो का केंद्रीय विचार ही खत्म हो जाएगा, क्योंकि नाटो बाहरी दुश्मन से सुरक्षा के लिए है, भीतरी शक्ति-प्रयोग को वैध बनाने के लिए नहीं।
यूरोप अमरीका के इस कदम पर जवाबी प्रतिक्रिया भी कर सकता है जो कि आर्थिक और राजनीतिक ‘जवाबी कार्रवाई’ के रूप में हो सकती है। जानकारों के अनुसार यूरोपीय संघ ऐसी स्थिति में कड़े प्रतिरोधी कदम (टैरिफ  आदि) के साथ साथ जोर-जबरदस्ती वाले उपायों पर भी जा सकता है। मतलब कि यह सिर्फ  सैनिक संकट नहीं, व्यापार युद्ध भी बन सकता है। साथ ही कूटनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक रूस और चीन द्वारा इस तनाव को भुनाने की कोशिश भी हो सकती है। विशेषकर चीन ऐसे मौके पर यही निष्कर्ष निकालेगा कि जब पश्चिम खुद नियम तोड़ सकता है, तो वह क्यों नहीं। ऐसी स्थिति में एक सवाल यह भी पैदा हो सकता है कि क्या इसके बाद भी विश्व व्यवस्था कायम रह सकती है? रहेगी भी तो ऐसी नहीं जैसी 1990 के बाद रही हैं, क्योंकि अब तक दुनिया की व्यवस्था तीन चीज़ों पर टिकी रही है—पहली यह कि सीमाओं की पवित्रता बरकार रहे, दूसरी इस बात पर कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन हो और तीसरी इस बात पर कि गठबंधनों की विश्वसनीयता बरकरार रहे। 
अगर ग्रीनलैंड जैसे मामले में ‘दबाव या ताकत’ का इस्तेमाल सफल होता है, तो यह दुनिया भर के शक्तिशाली देशों के लिए मनमर्जी करना आसान हो जाएगा और फिर व्यवस्था ‘नियमों’ से नहीं, डर, हथियार और धमकी से चलेगी। यही वह ‘ताकत का कानून’ है जिसकी ओर विद्वान इशारा कर रहे हैं, और वह डर वास्तविक है। यह और इसका प्रभाव सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा इसका भारत पर भी प्रभाव पड़ेगा। यूरोप रक्षा खर्च बढ़ाएगा। फ्रांस, जर्मनी जैसे देश नाटो के समानांतर यूरोपीय सुरक्षा ढांचे पर ज़ोर देंगे जबकि भारत के लिए यह स्थिति ‘अवसर तथा जोखिम’ दोनों लाएगी। अवसर यह होगा कि यूरोप भारत को ज्यादा महत्वपूर्ण साझेदार मानेगा, जोखिम यह होगा कि अगर पश्चिमी एकता कमज़ोर हुई तो वैश्विक व्यापार और सुरक्षा अनिश्चित होगी, जिसका असर ऊर्जा कीमतों, सप्लाई चेन और निवेश पर पड़ेगा। लब्बोलुआब यह कि ट्रम्प की हरकतों से नाटो टूटे या न टूटे, खतरा विश्वास टूटने का ज़रूर है। ऐसा माहौल अंतत: दुनिया को ज्यादा अस्थिर बनाएगा और छोटे देश असुरक्षित हो जायेंगे। वास्तव में अगर ग्रीनलैंड अगर ‘ताकत के इस्तेमाल’ के प्रतीक की तरह उभरता है, तो वह सिर्फ  उत्तरी ध्रुव का द्वीप नहीं रहेगा, वह 21वीं सदी की विश्व व्यवस्था की परीक्षा बन जाएगा।    

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