हकीकत राय के बलिदान का दिवस बसंत पंचमी

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शीत ऋतु के धुंध/कोहरे और कड़ाके की सर्दी से त्रस्त, ग्रस्त प्रकृति मानो एक बार फि अंगड़ाई लेकर खिल पड़ती है। रंग बिरंगे फूलों से सज जाती है। वैसे बसंत ऋतु बलिदानों का त्यौहार है। इस मौसम में देश की स्वतंत्रता के कितने ही दीवाने फांसी पर चढ़े। शहीद चंद्रशेखर आज़ाद, शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु भी बसंत की बांसती ऋतु में ही भारत माता के लिए बलिवेदी पर अर्पित हुए। 
बसंत ऋतु के साथ ही उस बलिदानी की अमिट गाथा भी जुड़ी है जिसे मुगलों ने लाहौर के भरे दरबार में शहीद कर दिया। यह शहादत की गाथा वीर हकीकत राय की है, जो सन् 1719 में पैदा हुआ और 1734 की बसंत पंचमी के दिन उसने अपने पवित्र रक्त से हिंदुत्व को मानो श्रद्धांजलि दी। देश के विभाजन से पहले पंजाब के हर हिंदू और सिख परिवार में वीर हकीकत राय एक जाना-पहचाना नाम था। बसंत पंचमी हकीकत राय के बलिदान दिवस के रूप में मनाई जाती थी। लाहौर में जहां हकीकत राय की समाधि बनाई गई वहां बसंत के दिन बहुत बड़ा मेला लगता था। हज़ारों लोग इकट्ठे होकर इस वीर बालक को अपने श्रद्धासुमन अर्पित भेंट करते थे। 
देश विभाजन के पश्चात भी बसंत पंचमी का त्यौहार भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है और उसमें वीर हकीकत के बलिदान को भी याद किया जाता था। स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में विद्यार्थियों को हकीकत की जीवनी पढ़ाई जाती थी, किंतु धीरे-धीरे वीर हकीकत राय तथा अन्य वीरों की बलिदान गाथा को स्वतंत्र भारत की सरकारों ने पाठ्यक्रम से निकाल दिया।
हकीकत के पिता भागमल व्यापारी थे।  इनकी माता का नाम गौरां था। हकीकत बहुत कुशाग्र बुद्धि था। उसके पिता ने उसकी प्रतिभा को परखते हुए उसे फारसी पढ़ने के लिए मदरसे में भेजा। एक दिन अनवर और रशीद नामक दो सहपाठियों ने हकीकत के साथ झगड़ा किया। 
दोनों ने दावा किया कि वीर हकीकत ने इस्लाम के विरुद्ध अपशब्द कहे हैं। काजी ने तब एक ही बात कही—इस्लाम स्वीकार करे हकीकत या मौत के लिए तैयार रहे। बेबस भागमल और मां गौरां ने हकीकत को समझाया कि वह मुसलमान बन जाए, ज़िंदा तो रहेगा, परन्तु हकीकत अडिग रहा।
आखिर बसंत के दिन 1734 में हकीकत को शहीद कर दिया गया। जल्लाद ने उसका सिर काटा। गुलामी के राज की विडम्बना देखिए कि पूरे लाहौर के हिंदू इकट्ठे होकर निजाम के पास आज्ञा मांगने गए। तब जाकर हकीकत का धर्म अनुसार अंतिम संस्कार करने की आज्ञा मिली। लाहौर का हिंदू-सिख समाज उमड़ पड़ा। चंदन, गुलाब, तुलसी आदि की चिता बनाई गई। उन सारे रास्तों पर जहां से वीर हकीकत का शरीर जा रहा था, वहां फूलों की वर्षा होती रही। 
हकीकत राय के बलिदान का समाचार जैसे ही उसकी पत्नी लक्ष्मी को पंजाब के बटाला में मिला, उसने अग्नि में प्रवेश कर सती होकर प्राण त्याग दिए। हकीकत के माता-पिता ने भी पुत्र के वियोग में रोते-रोते प्राण दे दिए। देश के लोगों के लिए यह सोचने का विषय है कि हकीकत तो अपना धर्म निभा गया, किन्तु केवल पीली पतंगें, पीला हलवा, पीली पगड़ी या दुपट्टा और गीत-भंगड़े, क्या यही बसंत है। बसंत के महत्व को बनाए रखने के लिए बसंत के बलिदानियों को याद करना ही होगा।

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