क्या पंजाब नेतृत्व के संकट का सामना कर रहा है ?

कभी ईमान की बातें, कभी किरदार की बातें,
चलो छोड़ो, हटो, करने लगे बेकार की बातें।
शायर राकेश तूफान का यह शे’अर इसलिए याद आ गया, क्योंकि आज मैं यह कालम लिखते समय सोच रहा था कि सिख कौम इस समय नेता-रहित है, परन्तु सोचते-सोचते महसूस हुआ कि अकेले सिख ही नहीं, अपितु पूरा पंजाब ही उचित नेतृत्व की कमी महसूस कर रहा है। पंजाब की राजनीति इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां चरित्र या किरदार की बात बेकार प्रतीत हो रही है। चाहे वास्तव में यह बेकार की बात न ही हो, तो भी ऐसा माहौल बना दिया गया है जैसे पंजाब में कोई चरित्रवान नेता है ही नहीं। यह नहीं कि पहले वाले नेता गलतियां नहीं करते थे, या उनमें से अधिकतर निजी लाभ को प्राथमिकता नहीं देते थे, परन्तु उस समय नेताओं की किरदार-कुशी या चरित्र-घात इतने व्यापक स्तर पर नहीं किया जाता था। इस समय चाहे पंजाब के नेतृत्व का दावा करने वाली लगभग दर्जन राजनीतिक पार्टियां हैं, परन्तु हाल यह है कि पंजाब पूरी तरह से नेतृत्व-रहित हो गया प्रतीत होता है। पहली बात तो यह है कि कोई पार्टी या कोई नेता पंजाब के हितों के लिए लड़ाई शुरू करने का साहस करने के समर्थ ही नहीं दिखाई देता, परन्तु यदि कोई साहस कर भी ले तो उसके अपने साथी और हमराह भी उसके चरित्र पर विश्वास करके कुर्बानी देने के लिए तैयार नहीं होते। हां, दिखावा करना, ड्रामा करना या समाचार पत्रों व सोशल मीडिया पर बयानबाज़ी अवश्य दिखाई देती है। 
पंजाब विधानसभा-2027 के चुनाव सिर पर हैं, परन्तु राजनीतिक पार्टियों के आंतरिक विवादों तथा रानजीतिक पार्टियों के नेताओं द्वारा अपने ही वरिष्ठ नेताओं की किरदार-कुशी आम मतदाताओं में तो क्या, पार्टी कार्यकर्ताओं में भी निराशा पैदा कर रही है। हालत यह है कि : 
हमने किरदार को कपड़ों की तरह पहना है,
तुमने कपड़ों को ही किरदार समझ रखा है।
—हसीब गोश
सिख तथा अकाली नेताओं का चरित्र-घात
इस समय किरदार-कुशी का सबसे बड़ा शिकार तो अकाली नेता हैं। एक अकाली दल नहीं अपितु सभी अकाली दलों के नेताओं का चरित्र-घात इस प्रकार किया गया है कि पूरी सिख कौम ही नेता-रहित हो गई प्रतीत होती है, क्योंकि यह चरित्र-घात सिर्फ राजनीतिक नेताओं का ही नहीं हुआ, अपितु धार्मिक नेताओं की भी हुआ है। 
हां, यह बिल्कुल सच है कि यह धार्मिक या अकाली नेता दूध के धुले नहीं और इन पर लगते कई आरोप सच्चे भी हैं, परन्तु राजनीतिक विरोधी ‘खम्भां दीआं डारां’ बनाने के समर्थ हैं। इस समय लगभग आधा दर्जन अकाली दल हैं, परन्तु कौन-सा अकाली नेता है, जिसके किरदार पर विश्वास करके पूरी कौम उसे रहनुमा मान ले?
अकाली दल बादल जो अभी भी सबसे बड़ा अकाली दल है, के नेताओं द्वारा की गई राजनीतिक और धार्मिक गलतियों की सज़ा मिल जाने के बावजूद उनकी किरदारकुशी का अभियान दूसरे अकाली दलों तथा विपक्षी पार्टियों की ओर से बदस्तूर जारी है और वे अभी भी जवाबदेही में ही उलझे हुए हैं। नये बने पुनर-सुरजीत अकाली दल के नेताओं तथा अध्यक्ष के खिलाफ किरदार-कुशी का अभियान भी तेज़ी से जारी है। उन पर आरोप दर आरोप लगाए जा रहे हैं कि हालत यह हो गई है कि उनके अध्यक्ष ज्ञानी हरप्रीत सिंह अब शायद अध्यक्षता से तौबा करने की ओर बढ़ रहे हैं और शायद वह पार्टी की कमान किसी कार्यकारी अध्यक्ष या प्रीज़ीडियम को सौंप कर पीछे हट जाएं, वैसे पार्टी में उनके एक विरोधी माने जाते नेता द्वारा अकाली दल पुनर-सुरजीत जिसे चुनाव आयोग की ओर से कोई नया नाम जल्द ही मिल सकता है तथा अकाली दल वारिस पंजाब के साथ साझी कोर कमेटी बना कर कार्यकारी अध्यक्ष बनने के यत्न भी दिखाई दे रहे हैं। जहां कर अन्य अकाली दलों का संबंध है, उनमें से अकाली दल वारिस पंजाब दे के अध्यक्ष भाई अमृतपाल सिंह तथा उनके पारिवारिक सदस्यों की किरदार-कुशी का सच्चा-झूठा अभियान भी कम तेज़ नहीं है। अकाली दल अमृतसर के प्रमुख सिमरनजीत सिंह मान की पार्टी एक बार फिर दोफाड़ हो चुकी है और अलग होने वाले गुट ने भी उनकी किरदार-कुशी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी चाहे आरोप पुराने ही दोहराए गए। शेष अकाली दलों की हालत भी ऐसी ही है। रज़ी अख्तर शौक के शब्दों में इन नेताओं की हालत यह है कि :
हम रूह-ए-स़फर हैं, हमें नामों से ना पहचान,
कल और किसी नाम से आ जाएंगे हम लोग।
कांग्रेस की हालत
पंजाब कांग्रेस के नेतृत्व की हालत भी बहुत बुरी है। चाहे पंजाब कांग्रेस के पास नेताओं की भरमार है, परन्तु सबकी किरदार-कुशी इतनी की जा चुकी है कि इनमें से कोई भी पंजाब का नेतृत्व करने के योग्य नहीं प्रतीत होता। इस मामले में पार्टी ने नवजोत सिंह सिद्धू परिवार को तो फिलहाल मनफी ही कर दिया है, परन्तु अमरिन्द्र सिंह राजा वड़िंग, प्रताप सिंह बाजवा, चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिन्दर सिंह रंधावा तथा अन्यों के खिलाफ चरित्र-घात का नश्तर इतना तीव्र चला कि अंत में पार्टी को बिना मुख्यमंत्री चेहरे के 2027 के चुनाव लड़ने का फैसला लेना पड़ा है। इनके सहित पंजाब कांग्रेस में फिलहाल कोई नेता नहीं दिखाई देता जिसके पीछे पूरी पार्टी खड़ी हो जाए।   
मंज़िल-ओ-राह में कभी इतना तो फासला न था,
राहबरो, ़खता-मुआ़फ, यह कोई राहबरी नहीं।
—नज़ीर सद्दीकी
‘आप’ की हालत
हालांकि आम आदमी पार्टी में कोई फूट नहीं, किसी की मजाल ही नहीं कि किसी ‘बड़े’ नेता के खिलाफ बोल सके। यदि कोई बोले भी तो उसे ‘अंदर या बाहर’ का रास्ता दिखा दिया जाता है, परन्तु सोशल मीडिया पर किरदार-कुशी ‘आप’ के नेताओं की भी कम नहीं हो रही, अपितु कुछ अधिक ही की जा रही है। वैसे भी ऐसा नहीं है कि ‘आप’ के नेता गलतियां नहीं करते, अपितु वे तो यू-टर्न लेने का एक रिकार्ड ही स्थापित कर रहे हैं। 
भाजपा की हालत
भाजपा इस समय पंजाब में सत्ता हासिल करने के लिए सबसे अधिक उत्सुक होती दिखाई दे रही है। प्रभाव बनाया जा रहा है कि भाजपा अकेले ही पंजाब में सरकार बनाएगी। इसीलिए पहली बार भाजपा ने मकर संक्रांति पर कांफ्रैंस के बाद फरवरी में गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में मोगा में कांफ्रैंस का फैसला भी किया है, जहां कभी अकाली दल ने कांफ्रैंस करके जीत का आधार बनाया था। इस रैली में कई प्रमुख सिख नेताओं को भाजपा में शामिल करके भाजपा का सिख समर्थक चेहरा निखारा जाएगा और हो सकता है कि कुछ सिख तथा पंजाब की मांगें मानने की अचानक घोषणा भी कर दी जाए, परन्तु नोट करने वाली बात यह है कि भाजपा एक ओर सिखों की हमदर्द होने का हेज तो दिखाती है, परन्तु जब दूसरी ओर वह सिरसा साध जैसों को प्रत्येक तीसरे माह पैरोल देती है और पंजाब की संस्थाओं पर केन्द्रीय कब्ज़े के प्रयास करती है तो उसके हेज के प्रयास बेकार हो जाते हैं। चाहे भाजपा के पंजाब जीतने के अभियान के मुख्य सूत्रधार गृह मंत्री अमित शाह स्वयं ही हैं, परन्तु इसकी कमांड हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सम्भाली हुई है। चाहे भाजपा में भी ‘आप’ की भांति किसी का साहस नहीं कि अपने नेताओं के खिलाफ खुल कर बोल सके, परन्तु वास्तविकता यही है कि अभी भाजपा में पुराने टकसाली भाजपाइयों तथा बाहर से आए नेताओं के बीच एक-दूसरे की किरदार-कुशी का अभियान परोक्ष रूप से जारी है। वैसे यह तो समय ही बताएगा कि भाजपा पंजाबियों को सामूहिक रूप में भ्रमित कर सकेगी या नहीं, परन्तु एक चर्चा यह भी सुनाई दे रही है कि भाजपा इतनी मज़बूती से यह चुनाव जीतने के लिए नहीं, अपितु कांग्रेस को हराने तथा ‘आप’ की जीत का मार्ग प्रशस्त करने के लिए लड़ रही है ताकि गुजरात तथा अन्य स्थानों पर ‘आप’ कांग्रेस को हराने तथा भाजपा विरोधी वोट बांटने के समर्थ बनी रह सके। 
इसके अतिरिक्त पंजाब की अन्य पार्टियों जिनमें अकाली पंज प्रधानी, संयुक्त अकाली दल, दल खालसा, वामपंथी पार्टियां तथा बसपा के अतिरिक्त किसान संगठनों के नेताओं के चरित्र-घात का अभियान भी लगातार जारी ही है, तथा पंजाब को कोई रहनुमा खेवनहार नहीं दिखाई देता। भाजपा में लगातार शामिल होने वाले लोगों के लिए सैयद रहमानी का एक शे’अर हाज़िर है : 
अपने किरदार की पहचान बदल देते हैं,
ऐसे कुछ लोग हैं ईमान बदल देते हैं।  
सिखों के लिए अमरीका से एक अच्छा समाचार
हालांकि विगत लम्बे समय से अमरीका, कनाडा तथा आस्ट्रेलिया से सिखों के लिए बुरे समाचार ही आ रहे थे, परन्तु एक अच्छा समाचार भी है कि अमरीकी कांग्रेस की डेमोक्रेटिक तथा रिपब्लिकन पार्टियों के दो सदस्यों जोश गोटहाईमर तथा डेविड व्लाडाओ ने मिलकर ‘सिख अमेरिकन एंटी डिस्क्रिमीनेशन एक्ट’ नामक बिल 15 जनवरी को पेश कर दिया था, इस बिल के पारित होने के आसार अधिक हैं। यह बिल मांग करता है कि सिखों के खिलाफ नफरत तथा भेदभाव को प्रभावहीन किया जाए, इसकी निगाह-बानी जाए और रोका जाए। इस बिल के पास होने तथा प्रत्येक वर्ष अमरीका में सिखों के खिलाफ होने वाले नफरती क्रिया-कलापों तथा अंतर्राष्ट्रीय दमन के बारे में रिपोर्ट जारी किया जाना भी ज़रूरी हो जाएगा। 
-मो. 92168-60000    

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