10 साल में सैकड़ों सांसदों की सम्पत्ति में भारी वृद्धि
लोकसभा या राज्य विधानसभाओं का चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को भारतीय चुनाव आयोग के पास एक हलफनामा देना ज़रूरी है, जिसमें उन्हें अपनी चल और अचल सम्पत्ति का पूरा विवरण देना होता है। सांसदों द्वारा भारतीय चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामों से खुलासा हुआ है कि देश की संसद के लिए दोबारा चुने गए 102 सांसदों की सम्पत्ति में विगत 10 वर्षों में 110 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सम्पत्ति में 82 प्रतिशत और विपक्ष के नेता राहुल गांधी की सम्पत्ति में 117 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। पंजाब के अमृतसर से लोकसभा सदस्य गुरजीत सिंह औजला की सम्पत्ति में 64 प्रतिशत वृद्धि हुई है। 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की औसत सम्पत्ति 15.76 करोड़ रुपये थी, जो 2019 में बढ़कर 24.1 करोड़ और 2024 में 33.13 करोड़ रुपये हो गई है। इस हिसाब से 2014 से लेकर 2024 तक अर्थात 10 वर्षों के दौरान इन उम्मीदवारों की सम्पत्ति में औसतन 110 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
उम्मीदवारों द्वारा दिए गए हलफनामों के आधार पर एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार लोकसभा के 10 सबसे अमीर सदस्यों में से 5 भाजपा से, 1-1 सदस्य शिवसेना, वाईएसआरसीपी, टीएमसी, एनसीपी तथा शिरोमणि अकाली दल से संबंधित हैं। इन 10 लोकसभा सांसदों में भाजपा से संबंधित सांसदों में प्रसिद्ध अभिनेत्री हेमा मालिनी, टीएमसी के शत्रुघ्न सिन्हा, शिरोमणि अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल, एनसीपी की सुप्रिया सुले के नाम शामिल हैं। संसद के लिए दोबारा चुने गए सदस्यों में सबसे ज़्यादा सम्पत्ति भाजपा के उत्तर प्रदेश के यू.पी. एस. भोंसले की बढ़ी है, जो 2014 में 60.6 करोड़ रुपये से बढ़कर अब 223.12 करोड़ रुपये हो गई है। भाजपा की जामनगर लोकसभा सदस्य पी. माडम की सम्पत्ति पिछले 10 सालों में 17.43 करोड़ रुपये से बढ़कर अब 147.70 करोड़ रुपये हो गई है, जो 2019 के चुनावों के समय 130 करोड़ रुपये बताई गई थी। 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ते समय वाईएसआरसीपी के एम. रेड्डी की सम्पत्ति 22.59 करोड़ थी, जो 10 साल में 124 करोड़ रुपये बढ़कर 2024 में 146.85 करोड़ रुपये हो गई थी। इस सूची में हेमा मालिनी चौथे नंबर पर हैं, जिन्होंने 2014 के चुनावों के समय अपनी सम्पत्ति 178 करोड़ रुपये बताई थी, जो पिछले 10 सालों में बढ़कर 278 करोड़ रुपये हो गई है। भाजपा के गुड़गांव से सांसद राव इंद्रजीत सिंह की सम्पत्ति 10 साल पहले 25 करोड़ थी, जो एक दशक में 96 करोड़ बढ़कर 121 करोड़ रुपये हो गई है।
शिरोमणि अकाली दल की बठिंडा से सांसद हरसिमरत कौर बादल ने 2014 में अपनी सम्पत्ति 108 करोड़ बताई थी, जो अब बढ़कर 198 करोड़ रुपये हो गई है। इसी तरह शत्रुघ्न सिन्हा की सम्पत्ति 10 साल में 78 करोड़ और सुप्रिया सुले की सम्पत्ति 52 करोड़ रुपये बढ़ी है।
महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत की सम्पत्ति में भी भारी वृद्धि हुई हुई है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भवानी से भाजपा सांसद धर्मवीर सिंह की सम्पत्ति 2014 में 14 लाख थी, जो 2024 के लोकसभा चुनाव तक बढ़कर 11 करोड़ रुपये हो चुकी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपनी सम्पत्ति 1 करोड़ बताई थी, जो 2024 में बढ़कर 3 करोड़ रुपये हो गई थी। इसी तरह लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की सम्पत्ति में भारी वृद्धि हुई है। पिछले 10 सालों में उनकी सम्पत्ति में 8 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के में अपनी 9 करोड़ रुपये की संपत्ति बताई थी, जो पिछले चुनाव तक 20 करोड़ रुपये हो गई थी। जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल इकलौते ऐसे सांसद हैं, जिनकी सम्पत्ति पिछले 10 सालों में 74 करोड़ से घटकर 39 करोड़ रुपये रह गई है।
अगर पार्टियों की बात करें तो पिछले 10 वर्षों में भाजपा के चंदे में 108 प्रतिशत और कांग्रेस के चंदे में 135 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। शिरोमणि अकाली दल का चंदा 84 प्रतिशत बढ़ा है। शिरोमणि अकाली दल के पास 2014 में 108 करोड़ रुपये थे, जो अब बढ़कर 198 करोड़ रुपये हो चुके हैं। भारतीय सांसदों या राज्यों के विधायकों की सम्पत्ति हमेशा कई गुना बढ़ जाती है। आम लोगों की तुलना में नेताओं के लिए सम्पत्ति खरीदना-बेचना हमेशा फायदे का सौदे रहा है। शायद नेताओं ने प्रॉपर्टी बेचने-खरीदने के नाम पर अपने काले धन को सफेद करने का एक बेहतर तरीका ढूंढ लिया है। भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसने वाले नेताओं और नौकरशाहों के लिए विरासत में मिली सम्पत्ति हिसाब-किताब सही दिखाने में हमेशा लाभकारी सिद्ध होती रही है।
भारतीय चुनाव आयोग देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने में कारगर सिद्ध हो सकता है। चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपने खिलाफ चल रहे सभी तरह के आपराधिक मामलों की जानकारी हल्फिया बयान में लाज़िमी तौर पर देने का निर्देश दिया है। अभी भी उस दिन का इंतज़ार है, जब आपराधिक मामलों में फंसे नेताओं के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लग जाएगी। भारत की सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हाथ खड़े कर चुकी है। हालांकि चुनाव आयोग ने यह गेंद सरकार के पाले में डाल दी है, परन्तु सोचने वाली बात यह है कि देश की संसद ऐसे किसी कानून का फंदा अपने सदस्यों के गले में क्यों डालेगी?
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