खतरनाक है कला में धार्मिक जुनून

यदि लेखक, कलाकार अथवा किसी भी रचनात्मक विधा से जुड़ा व्यक्ति कहे कि उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है और उसे काम मिलने से पहले इस बात की पड़ताल की जाती है कि वह किस धर्म, सम्प्रदाय, जाति से आता है तो यह संकेत है कि कुछ लोगों द्वारा समाज को अस्थिर करने की कोशिश हो रही है। 
रचना-धर्म स्वतंत्र है : साहित्य, संगीत, फिल्म निर्माण जैसे कलाक्षेत्र मूलरूप से मानवीय संवेदनाओं, विविधता और सामाजिक सरोकारों का आईना हैं, जिन्हें सकारात्मक आलोचना से बढ़ावा मिलता है। यदि कुछ इसके विपरीत हो, जिससे धार्मिक उन्माद, सांप्रदायिक तनाव और एक-दूसरे के प्रति घृणा का भाव पैदा हो तो समाज विभाजन और हिंसा का शिकार हो जाता है। जब कोई रचना उसके रचनाकार की व्यक्तिगत कुंठा और द्वेष का परिचय दे, तो पाठक और दर्शक वर्ग को सचेत हो जाना चाहिए कि कहीं इसके पीछे कोई विकृत एजेंडा या पूर्वाग्रह तो नहीं है। भावनाओं को भड़का कर स्थायी रूप से आपसी मेल-जोल, सद्भाव और सहयोग को समाप्त करना तो नहीं है।
यह स्थिति इतनी खतरनाक है कि इसके शुरू होते ही इस पर अंकुश लगाने के लिए सामान्य नागरिक से लेकर शासन, प्रशासन और सरकार तक को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। उदाहरण के लिए जब कोई लेखक या कला धर्मी यह कहे कि उसे एक धर्म विशेष का होने से भारत में डर लगता है, उसे काम नहीं मिलता और वह असुरक्षित महसूस करता है तो फिर तुरंत जनता को यह जांच-पड़ताल करनी चाहिए कि उसकी बात में सच्चाई है या नहीं।
सामान्य तौर पर पाठक या दर्शक हर उस कृति की, चाहे पुस्तक हो या फिल्म, नृत्य प्रस्तुति हो या थिएटर में नाटक, की प्रशंसा करते हैं जो उनके दिल को छू जाए, दिमाग को झकझोर दे और उसके साथ उनका लगाव होने लगे। इसके साथ ही यदि कोई प्रस्तुति किसी प्रकार का स्पंदन या उसके साथ जुड़ाव पैदा करने में विफल रहती है, तो वह पाठ्य या सिनेमा जगत में चारों खाने चित्त हो जाती है, जिस पर कोई भी अपना समय और धन खर्च करना नहीं चाहेगा। यदि कुछ ऐसा है, जो वास्तव में श्रेष्ठ है, तो चाहे शुरू में उसे अपने प्रशंसक न मिले, लेकिन वह अपनी गुणवत्ता के कारण एक मुंह से दूसरे मुंह तक अपना उचित स्थान प्राप्त कर लेती हैं। कोई जानने की कोशिश भी नहीं करता कि इसमें किस धर्म या जाति के लेखकों या कलाकारों ने काम किया है, बस वह पसंद आनी चाहिए। कलाएं तो केवल दर्पण हैं जिन्हें हम जितना साफ, सुंदर, संवार कर पेश करेंगे, उन्हें उतना ही पसंद किया जाएगा। इसमें न धर्म आता है, न जाति या कुछ और, केवल सत्य के दर्शन होते हैं। कालजयी होना यही है। 
क्या गलत है : किसी धार्मिक घटना और ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मोड़ कर दिखाया जाना आक्रोश से लेकर हिंसा तक का माहौल बना सकता है। इससे समाज को अस्थिर करने वाले कामयाब हो जाते हैं। इसे किसी भी नज़रिए से सही नहीं ठहराया जा सकता। धार्मिक सांप्रदायिक उन्माद जब विभिन्न कलाओं के माध्यम से उभर कर आता है तो उसके परिणाम विनाशकारी ही हो सकते हैं।
लेखकों या निर्माताओं को धमकियां, पुस्तक, नाटक, प्रदर्शनी या फिल्म पर प्रतिबंध और फिर पुरस्कार वापसी जैसी स्थितियों से बचा जा सकता है, बशर्ते कि बिना समय गंवाए समुचित उपाय और सख्त कार्रवाई हो जाए। ऐसे प्रचार-प्रसार पर रोक लगना तो समझ में आता है जो विविधता को चुनौती देता हो, असहिष्णुता को बढ़ावा और रचनाकार की स्वतंत्रता पर हमलावर हो, लेकिन जब ऐसी कृतियों पर पाबंदी लगाई जाए जो धार्मिक पाखंड को उजागर करती हों, सामाजिक विकृतियों का खुलासा करती हों और किसी भी स्तर पर हुए अत्याचार का विरोध करती हों, उन्हें प्रकाशित और प्रसारित करने पर गैर-कानूनी तरीके से प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है। 
परिवर्तन ही नियम है : हमारे देश की प्रत्येक भाषा इस दृष्टि से समृद्ध रही है कि उन सभी में एक या अधिक रचनाकार ऐसे हुए हैं और हैं, जो अपनी कृतियों से लेखन से सिनेमा तक को न केवल प्रभावित करते रहे हैं, बल्कि विरासत के रूप में जानी जाती हैं। विभिन्न देसी और विदेशी भाषाओं में रूपांतरण होना श्रेष्ठता का प्रमाण है। अब क्योंकि परिवर्तन संसार का नियम है, ज़िन्दगी का बहाव बिना रुके या थमे चलता रहता है, इसलिए कोई रुकावट उसकी गति को न तो नियंत्रित कर सकती है और न ही रोक या बंदिश लगा सकती है। इसका उदाहरण यह है कि जो आधुनिक टेक्नोलॉजी या नए साधनों का उपयोग करने से हिचकिचाता है, उसे अपनाता नहीं और अपनी पुरानी सोच पर ही कायम रहता है, वह बहुत जल्दी भुला दिया जाता है, चाहे उसने जीवन में कितने ही कीर्तिमान हासिल किए हों। रचनाकार अपनी पुरानी सोच के भरोसे बैठा रहा तो पिछड़ा ही कहलाएगा। 

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