बड़े संकट का संकेत है हिमपात में लगातार आ रही गिरावट
कोई 75 दिन बीत गए हैं, कश्मीर से लेकर उत्तरखंड तक पर्याप्त हिमपात नहीं हुआ। दिल्ली से ले कर समूचे मैदानी इलाके में पूरी तरह बारिश नहीं हुई। सूखी सर्दी ने जनजीवन, कृषि और पर्यावरण पर जो चोट पहुंचाई है, उसका असर दूरगामी होगा। सबसे बड़ी बात जब प्रत्येक वर्ष गर्मी के दिन और तापमान बढ़ रहा है, भारत की जीवन रेखा कहे जाने वाले हिमालय के पहाड़ हिमपात न होने से काले दिखई दे रहे हैं। हिमाचल में इस साल बर्फ के सूखे (स्नो-ड्राउट) के हालात हैं। उत्तर-पश्चिमी हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर) में 2025-26 की सर्दियों में हिमपात सामान्य से 45 से 75 फीसदी कम रहा, खासकर नवम्बर-दिसम्बर में। उत्तराखंड में दिसम्बर 2025 में 100 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई, और जनवरी 2026 तक ऊंचे इलाकों में पर्याप्त हिमपात नहीं हुआ। बढ़ते तापमान, कमज़ोर पश्चिमी विक्षोभ और वैश्विक तपिश से बर्फ तेज़ी से पिघल रही है। बीते पांच जाड़ों के मौसम में हिमपात में 25 फीसदी की गिरावट आई है, जो 1980-2020 के औसत से बहुत कम है।
कश्मीर का चिल्लई कलां क्षेत्र, जो अधिक हिमपात और जमा देने वाली रातों के लिए जाना जाता है, इस बार वीरान है। ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि इस साल दिसम्बर और जनवरी के मध्य तक कश्मीर घाटी में हिमपात में 75 से 80 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। गुलमर्ग और पहलगाम जैसे पर्यटन स्थल, जो इस समय तक चांदी जैसी बर्फ से ढके रहते थे, वहां केवल सूखी घास और नग्न पहाड़ दिखाई दे रहे हैं। यह स्थिति केवल पर्यटन को आर्थिक चोट नहीं पहुंचा रही, बल्कि ग्लेशियरों के पुनर्भरण की प्रक्रिया को भी बाधित कर रही है। यदि हिमपात का यह अकाल जारी रहा तो गर्मियों में झेलम और सिंधु जैसी नदियों का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर तक गिर सकता है, जिससे न केवल पीने के पानी का संकट पैदा होगा बल्कि जलविद्युत परियोजनाओं पर भी ताला लग सकता है।
उत्तराखंड में शून्य बरसात के कारण राज्य के अधिकांश ज़िलों में सूखे की स्थिति है। हिमाचल प्रदेश में भी सामान्य से 97 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। गेहूं, सरसों और चना जैसी रबी की फसलें अक्तूबर से दिसम्बर तक बोई जाती हैं। इन फसलों को अच्छी पैदावार के लिए बढ़ने और पकने के समय ठंडे मौसम की ज़रूरत होती है। बारिश न होने से रबी की फसलों खासकर गेहूं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। असल में सर्दियों की बारिश केवल पानी की ज़रूरत पूरा नहीं करती, बल्कि खेतों के लिए खाद का काम भी करती है। जिससे पौधों को नाइट्रोजन, फास्फोरस और दूसरे पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से मिलते हैं। इसकी पूर्ति सिंचाई करने से नहीं की जा सकती है। उधर अक्तूबर-नवम्बर के गर्म रहने से आलू का अंकुरण कम हुआ है। बहुत-सी जगह बोए हुए आलू के बीज पौधा बनने की जगह गर्मी से गल गए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ने की मिठास नवम्बर की गर्मी ने सोख ली। ऊंचे पहाड़ों पर खेतों में बर्फ का आवरण आमतौर पर एक इन्सुलेशन कम्बल के रूप में कार्य करता है। बर्फ की परत से फसलों की रक्षा होती है, कंद-मूल जैसे उत्पादों में वृद्धि होती है। साथ ही बर्फ से मिट्टी का कटाव भी रुकता है। पूरे हिमालय क्षेत्र में कम हिमपात और अनियमित बारिश से क्षेत्र में पानी और कृषि वानिकी सहित प्रतिकूल पारिस्थितिक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
कम हिमपात के कारण अगर तापमान जल्दी ही बढ़ जाता है तो देर से होने वाला हिमपात और भी नुकसानदेह होगा। इससे हिमनद झील के फटने से आने वाली बाढ़ अचानक आ जाएगी। गर्मी से यदि ग्लेशियर अधिक पिघले तो आने वाले दिनों में पहाड़ी राज्यों में स्थापित सैंकड़ों मेगा वाट की जल विद्धुत परियोजनाओं पर भी संकट आ सकता है। हालांकि यह भी कड़वा सच है कि पहाड़ों के मिज़ाज को बिगाड़ने में इन जल विधयुत परियोजनाओं की भूमिका कम नहीं हैं। पहाड़ों पर बर्फ का असर पंजाब की नदियों पर होता है। लंबे समय तक सूखे के कारण झेलम और अन्य नदियों का जल स्तर अभी से निचले स्तर पर है।
उत्तराखंड के पौड़ी ज़िले में भले ही अधिक ठंड हो जाए, लेकिन बीते चार महीनों से पर्याप्त हिमपात और बारिश न होने के कारण यहां के पर्यावरण पर अलग किस्म का खतरा मंडरा रहा है। लगातार सूखे से जमीन की नमी समाप्त हो गई है। यदि हालात नहीं सुधरे तो यहां जंगलों में आग का खतरा बढ़ जाएगा। बारिश और हिमपात की कमी का असर केवल कृषि तक सीमित नहीं है। यह पूरे पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है। हिमालयी ग्लेशियरों को पर्याप्त हिमपात नहीं होने से नदियों और जल स्रोतों का जलस्तर घट रहा है, जिससे पेयजल और सिंचाई के लिए संकट खड़ा हो सकता है। जलवायु परिवर्तन का यह प्रभाव भविष्य में और भी गंभीर हो सकता है, अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए।
हिमाचल ले लाहौल स्पीति से ले कर उत्तराखंड के उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, चमोली, पिथौरागढ़ और बागेश्वर में दुर्लभ हो चुके हिम तेंदुओं का बगैर बर्फ के जीना मुश्किल हो रहा है।
यह दुखद है कि व्यावसायिक हितों से जुड़े लोग धरती के इस तरह हो रहे नुकसान को जलवायु परिवर्तन के वैश्विक असर या फिर पश्चिमी विक्षोभ के कमज़ोर होने की बात करके ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। जबकि अत्यधिक पर्यटन, पक्के निर्माण, पहाड़ों पर तोड़फोड़, हरियाली कवच का कम होना जैसे मानवजनित कारण हैं जिन्होंने हिमालय पहाड़ की गोद में बसे लोगों को संकट में डाल दिया है। आदि कैलाश के नजदीक विश्व प्रसिद्ध पंचाचूली की हिमालयी शृंखलाओं पर अब बर्फ नहीं दिखती। हिमालय के नजदीक बेशुमार वाहन पहुंचने, इनसे निकलने वाले कार्बन और बढ़ते मानवीय दखल से तापमान में बढ़ोतरी के साथ दूषित हो रहे पर्यावरण के कारण कभी चांदी से दमकती चोटियां अब काली दिखने लगी हैं। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयन पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा के निदेशक प्रो. सुनील नौटियाल ने अब तक हुए शोधों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 1985 से 2000 तक हिमालय और ग्लेशियरों में बर्फ पिघलने की रफ्तार दो से तीन गुना बढ़ी है। बताया कि 40 साल में हिमालयी क्षेत्रों में 440 अरब टन बर्फ पिघल चुकी है जो वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रही है।



